Wednesday, April 29, 2020

जाते हुए मुझे एक सीख दे गए इरफ़ान..


कोई तीन साल पहले की बात है, मैं न्यूज़ रूम में बैठी खबरें बना रही थी. न्यूज चैनल के न्यूज रूम थोड़े बेरिंग ही होते हैं, खबरों में डूबे हुए पत्रकार और घड़ी भर की फुरसत नहीं, मेरा हाल भी कुछ ऐसा ही था.

उंगलियां कीबोर्ड पर चलती जा रही थीं, कि अचानक न्यूज़रूम में सुगबुगाहट महसूस हुई. इधर-उधर देखा तो हर किसी की निगाहें एक ही दिशा में टिकी हुई थीं. मैं समझ गई कि बॉलीवुड का कोई स्टार आया होगा, जिसे देखकर पत्रकारिता में आए नए बच्चे उत्साहित हो जाते हैं. हमारे फील्ड में किसी भी बड़े नेता
 या अभिनेता के पीछे दौड़ने, और उनके साथ सेल्फी लेने को अच्छा नहीं माना जाता. मैंने हमेशा इस बात का ध्यान रखा. बहुत से सितारों के इंटरव्यू किए, लेकिन सेल्फी नहीं ली.

बहरहाल, नजर उठा कर देखा तो आंखें खुली रह गईं. मेरे सामने इरफान खान थे. वो, जिन्हें मैंने तब से देखा जब वो राजा रानी की कहानी के किरदार होते थे. यानी 1994 में दूरदर्शन पर आने वाले सीरियल 'चंद्रकांता' से ही इरफान खान मेरे फेवरेट हो गए थे. तब से लेकर अब तक इरफान की कोई फिल्म छोड़ी नहीं गई. पर अफसोस इसी बात का रहा कि इतने सालों के करियर में मैं उनसे कभी मिल ही नहीं पाई.

इरफान स्टूडियो की तरफ बढ़े जा रहे थे और पीछे-पीछे उनकी पीआर टीम और मीडिया के फैन्स की भीड़ चल रही थी. ग्रे कलर का सूट जिसपर काले रंग की पाइपिन थी, इरफान ने बालों में छोटी सी चोटी भी बना रखी थी, जो उन्हें एक सामान्य व्यक्ति से स्टार बना रही थी. कद काठी ऐसी कि कोई भी आकर्षित हो जाए. वैसे भी कुछ ही सितारों  का ऑरा इतना स्ट्रॉन्ग होता है, कि उनके आसपास खड़े होने में झिझक होती है.

वो आगे बढ़ गए और स्टूडियो में बैठ गए. इधर मैं, ऐसी हो गई थी जैसे अभी अभी पत्रकारिता का कोर्स करके किसी चैनल में आई हूं. अपने फेवरेट सितारे को सामने देखकर शायद हर कोई ऐसे ही बावला हो जाता होगा. अब तो जैसे मेरे हाथों में ब्रेक लग गए, सारा ध्यान इरफान की तरफ, कि जैसे ही वो स्टूडियो से बाहर निकलें, मैं उनसे जाकर मिलूं. मैं ये बात भूल गई थी कि एक दिन पहले ही मैंने एक इन्टर्न को इसी बात के लिए ज्ञान दिया था कि मीडिया में कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए.. वगैरह...वगैरह.

थोड़ी ही देर में वो वापस आए और मेरे एक दूर लगी लिफ्ट की तरफ जाने लगे. स्टार लोगों के पास फालतू  का वक्त जरा भी नहीं होता, वो आए और गए समझो. इरफान लिफ्ट के खुलने का इंतजार कर रहे थे. उसी समय मुझे अपनी सीट से उठना था, और इरफान से मिलना था. वो मेरे से केवल एक कदम की दूरी पर ही खड़े थे, लेकिन मैं अभी तक इसी असमंजस में थी, कि उठूं या नहीं. समय जिस स्पीड से बीत रहा था लगा ही नहीं कि अब मिल पाना संभव होगा. लेकिन इससे पहले कि लिफ्ट के दरवाजे खुलते उन्होंने वॉशरूम जाने की इच्छा जताई. लिफ्ट के ठीक पीछे वॉशरूम था. वो लोग वहां और 10 मिनट रुके, मैं बस दूर से इरफान को देखे जा रही थी. वो कुछ देर वहां और ठहरे, लेकिन मेरे पैर जैसे जम गए हों. इसे मीडिया एथिक्स कहूं या मेरी झिझक, मैं उठ नहीं पाई.

इरफान की आंखों ने मुझे हमेशा की तरह फिर से बांध लिया था. वो फिर करीब आकर खड़े हुए और मैं उनके आगे मुस्कुराते हुए सिर्फ सिर झुका पाई, उन्होंने भी मुस्कुराहट का जवाब मुस्कुराहट से दिया. और तभी लिफ्ट के दरवाजे खुल गए, और वो चले गए. मेरे मन में बस एक ही बात आई, न मैं कहीं जा रही हूं और न वो, मुलाकात फिर कभी सही.

फिर कुछ ही महीनों के बाद, इरफान के बीमार होने की खबर आ गई. फैन्स ने उनके लिए दुआएं की और हिंदी मीडियम का ट्रेलर हमें देते वक्त इरफान ने एक बेहद इमोशनल मैसेज के जरिए कहा कि 'मेरा इंतजार करना'. दूसरी मुलाकात का इंतजार तो हम पहले से ही कर रहे थे. लेकिन उस मुलाकात से पहले ही एक और बुरी खबर आई, '..इरफान का स्टेशन आ गया था.' वो नहीं रहे.

वो न्यूरोएन्डोक्राइन कैंसर जैसी दुर्लभ बीमारी से लड़ रहे थे. एक दुर्लभ सितारे के साथ कुछ भी सामान्य कैसे हो सकता था, न सामान्य बीमारी, और न जाने का सामान्य वक्त. वो जाते-जाते भी मुझे एक सीख दे गए, 'जो मामले दिल से जुड़े हों, वहां हमें दिल की ही सुननी चाहिए.' उस दिन दिमाग की न सुनी होती तो इरफान से एक मुकम्मल मुलाकात होती. आज सिर्फ इसी बात का मलाल है, जो हमेशा रहेगा.

अलविदा इरफान...

Thursday, September 10, 2015

तुम


ख़्वाबों के समंदर में एक टुकड़ा उम्मीदों का
जब फेंकती हूँ शिद्दत से,
कुछ बूँदें आस की छलक आती हैं 
मेरे चेहरे पर भी...
तुम.. 
उन बूंदों की ठंडक हो,
ताज़गी भरते हो रगों में हर पल,
हर रोज़ नया करते हो जीवन..
हर रोज़ मुझमे माँ नई जगाते हो।

Sunday, July 26, 2015

वक़्त..


कोसती नहीं वक़्त को,
जानती हूँ इम्तिहान लेता है।
रोती नहीं वक़्त पर,
जानती हूँ जीना सिखा देता है।
वक़्त अपनी ताक़त का अंदाज़ा,
पल भर में करा देता है।
मैं आगे निकलना चाहती हूँ,
वो मुझको हरा देता है।
लड़ती नहीं हूं वक़्त से अब..
बस बाँध लेती हूँ कलाई पर,
और यही बात कहती हूँ..
तू मेरा साथ दे, न दे
मैं चलूंगी हर पल..
तेरे ही साथ-साथ।