Thursday, April 16, 2015

लौट आओ..


घर की दीवारें, 
खिड़कियां और दरवाज़े
आँगन, छत और सीढियां
करीने से सजे गमले..
फूल पत्तियां ..
वो छोटे पौधे..मिटटी..पानी
सब वैसा ही है
पर इतने रोज़ बीते
इतनी परवाह से इन्हें किसी ने न देखा..
इतने प्यार से न ही इनको सहलाया।
तुम न हो तो दीवारों के रंग फीके दिखते हैं.. 
खिड़की दरवाज़ों से ठण्डी हवाएं नहीं आती..
छत.. सीढियां.. आँगन.. गुमसुम
पत्तियां हवाओं के साथ हिलती नहीं,
फूलों को खिलने की इच्छा होती नहीं,
क्योंकि हंसी तुम्हारी.. 
अब फ़िज़ाओं में गूंजती नहीं,
लौट आओ कि तुम बिन 
सब सूना है..
लौट आओ की तुम ही
घर की जान हो..।

Get well soon papa..come home soon papa !