Monday, January 26, 2015

बिखर जाने दो..


बिखर जाने दो.. 
कि फूल हैं ये..
रिश्ते नहीं हैं..

रंग फूलों का भी वही है 
जो इस रिश्ते का है 
बसंती..खिलता भी बहुत है
पक्का भी है, बेहद
इसने बांधे रखा है 
तुझे~मुझे
एक डोर से...

खुशबू वो भी 
बेपनाह देता है,
महकाए ये भी रखता है..
पल पल को..
उससे रिश्ता खिलता है या
रिश्ते से वो..
पता नहीं...

पर खिल जाये तो 
निखर उठता है 
मेरे रिश्ते का एक नया रंग
तो बिखर जाने दो
कि फूल हैं ये..
रिश्ते नहीं हैं..



Sunday, January 4, 2015

सर्दी की धूप..


आज चाय की चुस्कियों के साथ 
अचानक वो घर आई..
कई साल पहले 
मुझसे रूठकर गई थी..
मिलकर लगा मानो 
कब से इसी की तलाश थी

मेरी ज़िन्दगी में 
फिर से तुम्हारा स्वागत है..
अब आई हो तो कुछ दिन साथ रहना..
सर्दी की धूप..