Wednesday, July 8, 2015

सखी सी लगने लगी हो..

सुनो ..
तुम सखी सी लगने लगी हो।
हर पल पास बैठी रहती हो,
अपने आप में उलझाये रखती हो,
मुझे करने ही नहीं देती कुछ भी।

तुम इतने करीब क्यों आ जाती हो मेरे..
जानती भी हो..?
मैं तुम्हें पसंद नहीं करती।
कितनी झिड़कियां देती हूँ तुम्हें,
पर फिर भी..
नाराज़ नहीं होतीं तुम,
रूठकर जाती ही नहीं..
कब रुठोगी मुझसे...?
तुम उदासी हो..
पर सच..
तुम सखी सी लगने लगी हो!

13 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज बृहस्रपतिवार (09-07-2015) को "माय चॉइस-सखी सी लगने लगी हो.." (चर्चा अंक-2031) (चर्चा अंक- 2031) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. शुक्रिया आपका सर।

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    2. शुक्रिया आपका सर।

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  2. उदासी और यादें साथ रहती हैं हमेशा ... पर इन सखियों को दूर बी करना जरूरी होता है जीने के लिए ...

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    1. रहेंगी कुछ देर पास ...फिर तो चले जाना ही है इनको :)

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    2. रहेंगी कुछ देर पास ...फिर तो चले जाना ही है इनको :)

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  3. दूर होने पर कुछ ज्यादा ही याद आती हैं। …
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  4. सुनो
    तुम बेहतरीन लिखने लगी हो ............

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    1. धन्यवाद दादा :)

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    2. धन्यवाद दादा :)

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  5. बहुत पारदर्शी रचना ! मन के हर कोने को उजागर कर गयी ! बहुत सुन्दर !

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