Tuesday, May 5, 2015

साथ..


दो जोड़ी पलकों पर टिके एक ख़्वाब जैसा है,
जैसे चमकता है जुगनू.. वैसा है
मां की एक सिमटी सी उम्मीद जैसा ..
पापा की आंखों से छलकती खुशी जैसा है,
सन्नाटे के बाद बिखरी खिलखिलाहटों जैसा
जीवन संघर्ष के बाद चैन की एक सांस जैसा है,
बाज़ुओं की ताक़त..और मन के सुकून जैसा 
त्यौहार में चखी हो मिठास..वैसा है
हिम्मत.. हौसले..और गर्व का दूसरा नाम हो जैसे  
ये 'साथ' बेटियों का ..
बुझती प्यास जैसा है।


6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-05-2015) को बावरे लिखने से पहले कलम पत्थर पर घिसने चले जाते हैं; चर्चा मंच 1967 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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  2. बहुत सुन्दर

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  3. सुन्दर रचना

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  4. वाह ... भावपूर्ण रचना ...

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  5. क्या बात है बहुत ही अच्छी पंक्तिया लिखी है ....

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