Thursday, April 16, 2015

लौट आओ..


घर की दीवारें, 
खिड़कियां और दरवाज़े
आँगन, छत और सीढियां
करीने से सजे गमले..
फूल पत्तियां ..
वो छोटे पौधे..मिटटी..पानी
सब वैसा ही है
पर इतने रोज़ बीते
इतनी परवाह से इन्हें किसी ने न देखा..
इतने प्यार से न ही इनको सहलाया।
तुम न हो तो दीवारों के रंग फीके दिखते हैं.. 
खिड़की दरवाज़ों से ठण्डी हवाएं नहीं आती..
छत.. सीढियां.. आँगन.. गुमसुम
पत्तियां हवाओं के साथ हिलती नहीं,
फूलों को खिलने की इच्छा होती नहीं,
क्योंकि हंसी तुम्हारी.. 
अब फ़िज़ाओं में गूंजती नहीं,
लौट आओ कि तुम बिन 
सब सूना है..
लौट आओ की तुम ही
घर की जान हो..।

Get well soon papa..come home soon papa !

5 comments:

  1. आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शनिवार (18-04-2015) को "कुछ फर्ज निभाना बाकी है" (चर्चा - 1949) पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ईश्वर आपके पापा को जल्दी स्वस्थ करें |

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  3. पिता पुत्री का नाता ऐसा ही है ... एक बीमार हो तो दूसरा कहाँ सहज तो पाता है ...
    इश्वर जल्दी उन्हें ठीक करेगा ...

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  4. वाह, बहुत सुन्दर और भावपूर्ण

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।