Monday, January 26, 2015

बिखर जाने दो..


बिखर जाने दो.. 
कि फूल हैं ये..
रिश्ते नहीं हैं..

रंग फूलों का भी वही है 
जो इस रिश्ते का है 
बसंती..खिलता भी बहुत है
पक्का भी है, बेहद
इसने बांधे रखा है 
तुझे~मुझे
एक डोर से...

खुशबू वो भी 
बेपनाह देता है,
महकाए ये भी रखता है..
पल पल को..
उससे रिश्ता खिलता है या
रिश्ते से वो..
पता नहीं...

पर खिल जाये तो 
निखर उठता है 
मेरे रिश्ते का एक नया रंग
तो बिखर जाने दो
कि फूल हैं ये..
रिश्ते नहीं हैं..



10 comments:

  1. फूल व रिश्ते
    सुगंधित चमन
    जो न बिखरे
    धारदार लेखनी परी लव यू

    ReplyDelete
  2. फूल व रिश्ते
    सुगंधित चमन
    जो न बिखरे
    धारदार लेखनी परी लव यू

    ReplyDelete
  3. जितने ख़ूबसूरत लफ्ज़..उतनी ही दिलकश आवाज़.. पिरो दीजिये आज इन्हें शब्दों में..

    ReplyDelete
  4. रिश्ते भी तो फूल से नाजुक होते हैं ... बिखर कर टूटें न ... उनकी खुशबू सहेजना ...
    अच्छी रचना ...

    ReplyDelete
  5. सुन्दर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  6. Lajawaab Parul~
    कि फूल हैं ये..
    रिश्ते नहीं हैं..

    ReplyDelete
  7. बिखर ही जाने दो न ...सच्ची में :) महक उठुंगी मैं भी :)

    ReplyDelete
  8. आप सभी का आभार..दिल से :)

    ReplyDelete
  9. बेमिसाल.. बेहद सुन्दर रचना..

    ReplyDelete

आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।