Sunday, January 4, 2015

सर्दी की धूप..


आज चाय की चुस्कियों के साथ 
अचानक वो घर आई..
कई साल पहले 
मुझसे रूठकर गई थी..
मिलकर लगा मानो 
कब से इसी की तलाश थी

मेरी ज़िन्दगी में 
फिर से तुम्हारा स्वागत है..
अब आई हो तो कुछ दिन साथ रहना..
सर्दी की धूप..

6 comments:

  1. पारुल जी
    नमस्कार !
    छोटी पर अति प्रशंसनीय एवं मनमोहक कविता !
    आप स्वस्थ,सुखी,प्रसन्न और दीर्घायु हों,हार्दिक शुभकामनाएं हैं …!

    संजय भास्कर

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  2. जी हम सब भी यही चाहते हैं ....सुन्दर

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  3. जी हम सब भी यही चाहते हैं ....सुन्दर

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  4. बहुत खूब ... इंतज़ार तो सभी को रहता है इसको इन दिनों ...

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