Thursday, September 10, 2015

तुम


ख़्वाबों के समंदर में एक टुकड़ा उम्मीदों का
जब फेंकती हूँ शिद्दत से,
कुछ बूँदें आस की छलक आती हैं 
मेरे चेहरे पर भी...
तुम.. 
उन बूंदों की ठंडक हो,
ताज़गी भरते हो रगों में हर पल,
हर रोज़ नया करते हो जीवन..
हर रोज़ मुझमे माँ नई जगाते हो।

Sunday, July 26, 2015

वक़्त..


कोसती नहीं वक़्त को,
जानती हूँ इम्तिहान लेता है।
रोती नहीं वक़्त पर,
जानती हूँ जीना सिखा देता है।
वक़्त अपनी ताक़त का अंदाज़ा,
पल भर में करा देता है।
मैं आगे निकलना चाहती हूँ,
वो मुझको हरा देता है।
लड़ती नहीं हूं वक़्त से अब..
बस बाँध लेती हूँ कलाई पर,
और यही बात कहती हूँ..
तू मेरा साथ दे, न दे
मैं चलूंगी हर पल..
तेरे ही साथ-साथ।


Sunday, July 19, 2015

यादें बरसेंगी...



घिर आये हैं बादल,
     आज यादें बरसेंगी।
तुझे देखने को आँखें,
     फिर से आज तरसेंगी।
आंसू और बूँदें आज, 
     हो जाएंगी एक जैसी।
मिल जाएंगी ख़ाक में
     काँधे को तेरे तरसेंगी।
घिर आये हैं बादल,
     आज यादें बरसेंगी..।।

Wednesday, July 8, 2015

सखी सी लगने लगी हो..

सुनो ..
तुम सखी सी लगने लगी हो।
हर पल पास बैठी रहती हो,
अपने आप में उलझाये रखती हो,
मुझे करने ही नहीं देती कुछ भी।

तुम इतने करीब क्यों आ जाती हो मेरे..
जानती भी हो..?
मैं तुम्हें पसंद नहीं करती।
कितनी झिड़कियां देती हूँ तुम्हें,
पर फिर भी..
नाराज़ नहीं होतीं तुम,
रूठकर जाती ही नहीं..
कब रुठोगी मुझसे...?
तुम उदासी हो..
पर सच..
तुम सखी सी लगने लगी हो!

Sunday, May 17, 2015

मैं..

मैं..
तेरी आँखों का 
प्यारा सा..
अदना ख़्वाब सही,

मैं..
तेरी नज़्मों का
रूठा हुआ हिस्सा कोई,
न गीत..न कहानी..
बस  किस्सा कोई,

मैं..
तेरी बिखरी हुई माला का 
एक मोती सही
मैं हूँ माथे की शिकन में..
मैं..
तेरे जेहन में भी..

मैं हूँ काजल में लिपटा 
आँख का आंसू वही
बहता था तब भी 
जब साथ थे..
बहता हूँ अब भी 
जब पास नहीं..

Tuesday, May 5, 2015

साथ..


दो जोड़ी पलकों पर टिके एक ख़्वाब जैसा है,
जैसे चमकता है जुगनू.. वैसा है
मां की एक सिमटी सी उम्मीद जैसा ..
पापा की आंखों से छलकती खुशी जैसा है,
सन्नाटे के बाद बिखरी खिलखिलाहटों जैसा
जीवन संघर्ष के बाद चैन की एक सांस जैसा है,
बाज़ुओं की ताक़त..और मन के सुकून जैसा 
त्यौहार में चखी हो मिठास..वैसा है
हिम्मत.. हौसले..और गर्व का दूसरा नाम हो जैसे  
ये 'साथ' बेटियों का ..
बुझती प्यास जैसा है।


Thursday, April 16, 2015

लौट आओ..


घर की दीवारें, 
खिड़कियां और दरवाज़े
आँगन, छत और सीढियां
करीने से सजे गमले..
फूल पत्तियां ..
वो छोटे पौधे..मिटटी..पानी
सब वैसा ही है
पर इतने रोज़ बीते
इतनी परवाह से इन्हें किसी ने न देखा..
इतने प्यार से न ही इनको सहलाया।
तुम न हो तो दीवारों के रंग फीके दिखते हैं.. 
खिड़की दरवाज़ों से ठण्डी हवाएं नहीं आती..
छत.. सीढियां.. आँगन.. गुमसुम
पत्तियां हवाओं के साथ हिलती नहीं,
फूलों को खिलने की इच्छा होती नहीं,
क्योंकि हंसी तुम्हारी.. 
अब फ़िज़ाओं में गूंजती नहीं,
लौट आओ कि तुम बिन 
सब सूना है..
लौट आओ की तुम ही
घर की जान हो..।

Get well soon papa..come home soon papa !

Monday, March 9, 2015

नियति..



दुखों के नाम नहीं होते
पर होते हैं कई सारे
कुछ सहे जाते हैं..कुछ नहीं..

कुछ अप्रत्याशित...कुछ अपेक्षित
कुछ का आना तय है
कुछ दुख नियति होते हैं

ये नियत दुख 
ह्रदय में जीते हैं
जीवन भर..
जिनकी भरपाई
कर ही नहीं सकता
कोई भी सुख..

                                                                         ... Missing you Bauji !
                                                                     




Monday, February 9, 2015

Chocolate !!


''अच्छा ये बताओ ..
कि तुम्हें मैं ज़्यादा पसंद हूं...
या चॉकलेट्स ??''
मैंने यूं ही कह दिया था.. चॉकलेट्स!!
और फिर उसके बाद 
तुम जब भी आये.. 
चॉक्लेट्स के साथ ही आये..
वक़्त गुज़र गया..
पर मैंने उन चॉक्लेट्स के रैपर्स आज भी सहेज रखे हैं
उनमें चॉकलेट्स तो नहीं हैं..
पर रैपर्स पर तुम्हारे हाथों के स्पर्श को
अब भी महसूस कर लेती हूं..
पता है क्यों..?
क्योंकि मुझे तुम ज़्यादा पसंद हो..
चॉकलेट्स नहीं..






Monday, January 26, 2015

बिखर जाने दो..


बिखर जाने दो.. 
कि फूल हैं ये..
रिश्ते नहीं हैं..

रंग फूलों का भी वही है 
जो इस रिश्ते का है 
बसंती..खिलता भी बहुत है
पक्का भी है, बेहद
इसने बांधे रखा है 
तुझे~मुझे
एक डोर से...

खुशबू वो भी 
बेपनाह देता है,
महकाए ये भी रखता है..
पल पल को..
उससे रिश्ता खिलता है या
रिश्ते से वो..
पता नहीं...

पर खिल जाये तो 
निखर उठता है 
मेरे रिश्ते का एक नया रंग
तो बिखर जाने दो
कि फूल हैं ये..
रिश्ते नहीं हैं..



Sunday, January 4, 2015

सर्दी की धूप..


आज चाय की चुस्कियों के साथ 
अचानक वो घर आई..
कई साल पहले 
मुझसे रूठकर गई थी..
मिलकर लगा मानो 
कब से इसी की तलाश थी

मेरी ज़िन्दगी में 
फिर से तुम्हारा स्वागत है..
अब आई हो तो कुछ दिन साथ रहना..
सर्दी की धूप..