Sunday, September 28, 2014

बेटियां हैं हम !


अपने कांधों पर हमने भी उठा रखी हैं जिम्मेदारियां,
हम भी बच्चों के भविष्य के लिए फिक्रमंद हैं,
हम कहते नहीं कभी कि दर्द हमको भी होता है,
जबकि कोल्हू के बैल की तरह हम भी पिसते हैं,
बहाते हैं पसीना..दिनभर और 
रात को अपनी आह्ह दबाकर सो जाते हैं।
सुबह से फिर जिन्दगी हाथों में दबाए
जुट जाते हैं उसे संवारने में..
बेटे भी ऐसे ही होते हैं न..
पर उन्हें छोड़ना नहीं पड़ता,    
पिता का वो स्नेहिल आंगन,
जिसे छोड़ आते हैं हम..
ले आते हैं उनकी यादों को दिलों में दबाये,
जो बनाती जाती हैं हमें 
उम्र दर उम्र..बहुत मज़बूत,
पर अंदर वो सौम्य सा दिल 
शरारतों और प्यार से भरा..
बेटियों वाला दिल..
वैसे ही धड़कता रहता है सदा के लिए..!
सच..बड़ा सुकून है कि..फक़्र करते हो तुम 
कि.. तुम्हारी बेटियां हैं हम !

Love you so much papa & mumma !!

Saturday, September 27, 2014

कुछ सवाल..मेरे भी!

एक बालक जो अक्षम है, कल ही मिला मुझे। कुछ कहना चाह रहा था इस दुनिया के लोगों से। मैं उसकी भाषा जानती हूँ..तो उसके मन के सवालों को सबके सामने रख रही हूँ।

क्या पार की हैं मैंने हदें तुम्हारे कर्मक्षेत्र में प्रवेश कर..?
या फिर तोड़ दिया है खिलौना तुम्हारा..प्यारा कोई..?

जिन तत्वों के मिलने से तुमने जीवन पाया है
क्या उन्हीं के मिलन से मैंने जीवन न पाया है..?
अब मेरे हिस्से की धरती..मेरी,
और आसमान भी मैंने पाया है।

हाँ..तुमसे थोड़ी अलग-अलग है मेरे सपनों की ये दुनिया,
छल-कपट और लोभ-माया से नहीं बनी मेरी दुनिया,
तुम्हारी दुनिया में आकर, क्या मैंने कभी हस्तक्षेप किया..?
फिर मेरी दुनिया को तुमने, क्यों ये नाम 'हीन' दिया ?

क्या तुम्हारे हिस्से के दुखों को मैंने और बढ़ाया है..?
या फिर मेरे होने से मान तुम्हारा घटाया है..?

फिर क्या रोक रहा है तुमको
मेरा साथ पाने में..?
फिर क्या रोक रहा है तुमको
मेरा अस्तित्व स्वीकारने में..?



Friday, September 19, 2014

प्याले ..प्यार के !


कितनी सुनहरी थीं वो सुबह
जब साथ में हम-तुम होते थे, 
ताज़गी भरे वो घूँट..हम साथ-साथ भरते थे,
चाय के प्याले दो..तब पास-पास रहते थे,
मिठास से जिसकी..मुस्कराहटें सजती थी,
ताज़गी ऐसी की..
रग-रग में बस्ती थी।

तुम गये तो संग..सुहानी सुबह भी ले गये
अलसाई सी मैं..तब अलसाई ही रहती 
चाय के प्याले..जुदा हो गए
लम्हे् वो प्यार वाले.. भाप हो गए
अब वो ठंडे घूँट कहाँ..मेरी सुबह ताज़ा करते
न मेरी उबासियाँ ख़त्म होतीं 
न मेरी सुबह..सुबह होती

खुदा का शुक्र है
के तुम लौट आए..
वो दौर ताज़गी के फिर चल पड़े हैं
वो प्याले प्यार के दो
फिर संग हो गए हैं
मिठास जिसकी जीवन में घुलने लगी है
फ़ीकी सी सुबह मेरी..
अब सुनहरी सी होने लगी हैं।


Saturday, September 13, 2014

मेरे चेहरे पे मत जाना..


देखो..मेरे चेहरे पे मत जाना

कभी-कभी रंगकर्मी की तरह
बदल लेती हूँ भाव अपने चेहरे के
सीख रही हूँ न..
जीवन जीने की कला
दुनिया भी तो ऐसी ही है न
शक्ल देखकर..मन पढ़ लेती है

पर मैं..
अब बदल लेती हूँ
अपने माथे की सिलवटों को 
मिला देती हूँ उन्हें उन लकीरों में
जो हंसते हुए चेहरे पर उभर आती हैं

सारी व्याकुलताओं को
आँखों के काजल में छुपाकर
बना लेती हूँ रात सी...
भोर का इंतज़ार करती

मैंने आंसुओं को भी समझाना सीख लिया है
कह दिया है.. थोड़ा शरमाया करो..
आवारा बन सबके सामने न आया करो
वो भी अब मानकर मेरी बात
 छिपे रहते हैं मुखौटे की ओ़ट में

तो सुना न..
मेरे चेहरे पे मत जाना