Sunday, July 20, 2014

सीली यादें..

तुम्हारी यादें सहेज रखी हैं मैंने,
मन के गागर से छलकती जा रही हैं।
कुछ तो बहुत नर्म हैं..
ठंडी आहों जैसी ,
और कुछ सीली पड़ी हैं..
गीले आंसू की तरह।
कुछ को तो मैंने बहला कर 
अभी सुलाया है...
और कुछ मेरे दिलासों पर 
यकीन नहीं करती हैं।
देखो..ये यादें तुम्हारी..
अब मुझसे नहीं संभलती हैं।
आ जाओ अब..
सियाह यादों को रंगीन कर दो..
खो जायें न मुझसे..
इन यादों को हक़ीकत कर दो!

Tuesday, July 8, 2014

पिछली बारिश..


याद है पिछली बारिश तुम्हें..
हर बार की तरह
हम दौड़कर गए थे छत पर..
खुले आसमान के नीचे
तन मन सब गीला..

वो बूँदें कहाँ बूंदों जैसी थीं
बस यूँ लगा की प्रेम का ही एक रूप था
जो भिगो रहा था आत्मा को भी.. 
अन्दर तलक..
तुम्हारे लबों तक जो बातें कभी आई न थीं
तुमने आँखों के ज़रिये सब कह डालीं
वो काले बादलों के बीच बिजली का कौंधना..
और एकदूसरे को देखकर मुस्कुराते हम तुम..

कितनी प्यारी थी न..
 वो पिछली बारिश..
और इस बरस ..
ये बूँदें छू ही न पायीं मुझे
आती हैं...
अपनी खुशबू से मुझे बुलाती भी हैं...
पर कैसे समझाऊं इन्हें ..
की 'उन बिन'
वो सिर्फ पानी है
 जो गीला तो कर सकती हैं तन
पर भिगो नही सकती..
मेरा अंतर्मन..
उफ्फ़...
कितनी प्यारी थी न..
वो पिछली बारिश !!