Tuesday, June 24, 2014

आत्महत्या..हल नहीं


"कभी कभी कुछ सत्य विचलित कर देते हैं मन
वो मेरे इतनी करीब भी नहीं थी..
फिर क्यों मन उसका लिखा पढ़कर विचलित हो उठा
उसके दर्द को महसूस भी करना चाहा,
पर उसकी पीड़ा की अनुभूति 
मुझे किस तरह होती.. 
न जाने क्या झेला होगा उसने और 
आगे क्या झेल पाना उसके लिए संभव नहीं था
की जिसके आगे उसे 
अपना जीवन त्याग देना बेहतर लगा।
वो जीवन जिसे सँवारने के लिए 
कितनी मेहनत की होगी उसने,
अपने ख्वाब पूरे करने के लिए 
कितनी ही बार समाज से लड़ा होगा,
मेहनत से खुद की पहचान बनाई होगी।
शायद उसे ये पता ही नहीं है
की उसके जैसे लोग कितने कम हैं इस दुनिया में,
कितने सारे लोगों को बिना मिले भी प्रेरणा देती है वो,
कितनी ही लड़कियों की आँखों में 
एक ख्वाब जगाती है वो..
पर क्या खुद को जानती है वो?
नहीं....
जो जान पाती तो 
जान देने की कोशिश न करती।
पर खुश हूँ... कि वो है..
अब खुद को जानने के लिए।
और ये मानने के लिए की 
जान किसी की भी हो 
..बहुत कीमती होती है।"


(मेरी ये दोस्त भारत के एक जानेमाने न्यूज़ चैनल की प्रतिष्ठित एंकर है जो मानसिक उत्पीडन की शिकार हुई )

Monday, June 16, 2014

सपने मरा नहीं करते !


सपने मरा नहीं करते..जिंदा रहते हैं
आँखों में जो खारा सा सागर है न..
उसकी तली पर पड़ी सीपियों में बंद रहते हैं
मोती की तरह
परत दर परत बढता इंतज़ार 
बना देता है उन्हें अनमोल...सदा के लिए।
सपने मरा नहीं करते...जिन्दा रहते हैं
माथे की सिलवटों में छुपे रहते हैं..
डरते हैं कभी कभी.. कि साकार हो गए तो...
कितने ही दिल टूट जायेंगे
कितने ही अपने रूठ जायेंगे
और कितने ही ख्वाब फिर बंद हो जायेंगे
उन्हीं सीपियों में..
निःशब्द से...
गुमनाम से..
सच..सपने मरा नहीं करते !

Saturday, June 14, 2014

सुनो...


सुनो...जब सूखी धरती पर
बूँदें आसमानी गिरती हैं,
कुछ पल वो शुरुआत के 
कितने हसीन होते हैं न..
सोंधी-सोंधी खुशबू से महक उठती है धरा
उन गीली बूंदों के आलिंगन से 
कैसे खिल जाती है न..
फीके रंगों में जैसे जान सी पड़ जाती है,
ताप भुलाकर अपना 
वो भी निखर जाती है।
सुनो.. तुम मुझे उन बूंदों से दिखते हो
और मैं ..
बाहें फैलाये 
बूंदों का इंतज़ार लिए
...धरा सी !

Thursday, June 12, 2014

मैं खुद को खोजती हूं..


मैं कौन थी, मैं क्या हुई,
मैं खुद को खोजती हूँ।
खो गई हूँ खुद से, मैं खुद को खोजती हूँ।
झिलमिल सितारों सी, चमकती थी दूर से ही
मैं वापस अपनी रौशन तकदीर खोजती हूँ।
कुछ हादसों की साजिश, कुछ वक़्त के थपेड़े
मैं अपनी कोई चहकती तस्वीर खोजती हूँ ।
रंग ही रंग थे, फिजाओं में बिखरे रहते थे
अब धुंध में बेरंग हुई वो तस्वीर खोजती हूँ।
हाँ खो गई हूँ खुद से, 
मैं खुद को खोजती हूँ।

Saturday, June 7, 2014

मुश्किल पल..


वो पल बहुत मुश्किल था
दूर जा रहा था वो आहिस्ता-आहिस्ता !
अपने साथ मेरा एक हिस्सा लिए
और छूट रहा था 
एक जिस्म..पीछे कहीं
लबों पर झूठी मुस्कान लिये
सच..वो पल बहुत मुश्किल था
दूर जा रहा था वो आहिस्ता-आहिस्ता !