Monday, March 17, 2014

होली...


बहुत याद आई अपने बचपन की होली
रंगते थे एकदूसरे को बनाते थे टोली 
कितनी खुशनुमा थी अपने बचपन की होली
खाते थे छुपकर जब भी भांग की गोली
मचता था हुडदंग जमती थी होली

हंसी ठहाकों की गूंज में
जब गुम जाते थे द्वेष सारे
गुजियों से ज्यादा मीठी 
होती थी अपनी बोली

वो शिद्दत से ढूँढकर
तेरा कमरे से खेंच लाना
और गुलाल लेकर चेहरे को रंगते जाना
फिर पलट के मेरा तुझको रंग लगाना
और अपने पैरों पर तेरे हाथों का स्पर्श पाना
गले लग के मनाते थे यार अपनी होली

वक़्त के जाल में फिर उलझ सा गया जीवन
होली तो फिर नाम भर की होली हो ली
अब रोग ऐसा लग गया की खा न पाएं गुजियाँ
मिठास जीवन से गई जुबान कडवी हो ली

क्रोध में कहने भर से 
ख़त्म होते नहीं हैं रिश्ते
तेरे मेरे बनाये, हैं ही नहीं ये रिश्ते
प्यार है और रहेगा भी क्योंकि..
तेरे बिना मैंने और मेरे बिना तूने
खेली ही नहीं होली...
खेली ही नहीं होली...
             

Monday, March 10, 2014

महिला दिवस !


मेरी कामवाली जब आज सुबह नहीं आई तो गुस्से की जगह चेहरे पर मुस्कुराहट आई। आज महिला दिवस है और उसे भी पूरा ह़क है इस दिन को अपने तरीक़े से मनाने का। कुछ 2 घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई.. देखा तो कामवाली थी। मैंने पूछा "आज क्या हुआ तुझे.. इतनी देर से कैसे आई।" वो बोली "दीदी आज मेरी बेटी के स्कूल में महिला दिवस समारोह था वहां मुझे भी बुलाया गया था। आपसे कहना भूल गई थी।" मैंने पूछा "तो कैसे मनाया तुमने महिला दिवस?'' वो बोली ''अरे दीदी मेरे लिए तो सारे दिवस एक ही जैसे हैं। मैं बस एक बात जानती हूं कि मुझे मेरी बेटियों को पढ़ाना है और उसके लिए मुझे जितनी भी मेहनत करनी पड़े..मैं करूंगी, उनकी पढ़ाई कभी रुकने नहीं दूंगी।" मन ही मन मुझे गर्व हुआ उसपर..और एक महिला होने पर। सोचा कि.. देर से ही सही पर जागरुक हो रही हैं महिलाएं..आने वाला समय निश्चित ही महिलाओं के लिए बेहतर होगा। इससे अच्छा महिला दिवस मेरे लिए कोई न था।

Monday, March 3, 2014

वो कुछ साल..

~ लघु कथा लिखने का ये पहला प्रयास था। 'नया लेखन - नए दस्तखत ' ने चित्रकथा प्रतियोगित का आयोजन किया , जिसमें मेरी लघुकथा को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया ~

                  ऋचा कॉलेज क्या पहुंची.. उसके तो पंख ही लग गए। आज़ाद खयालों की ऋचा अपने मन का करती.. नये-नये दोस्त बनाती। कॉलेज ख़त्म होते होते ऋचा का लाइफ़स्टाइल बदल चुका था। नए जीवन के सपने लिए ऋचा सातवें आसमान पर थी.. एक दिन पिता ने उसे बुलाकर कहा ‘अब तुम बड़ी हो गई हो, और मैं रिटायर.. अब परिवार का ध्यान तुम्हें ही रखना है।‘ ऋचा ज़मीन पर आ गई थी। जल्दी ही उसे नौकरी भी मिल गई थी.. लेकिन खर्च पूरा नहीं पड़ता था.. उसने ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू कर दिया था। उसे पता ही नहीं चला कि ये 5 साल कैसे बीत गए। लोग कहते पिता उसकी कमाई पर ऐश कर रहे हैं.. शुरू में तो उसे बुरा लगता लेकिन अब उसे भी ऐसा ही लगने लगा था।
                 पिता ने अपने दोस्त के बेटे वरूण से ऋचा की शादी तय कर दी थी.. एक बारगी उसने सोचा कि अब घर का खर्च कैसे चलेगा.. पर वरूण ने कहा कि शादी तो कर लो बाकी बाद में देखेंगे। आज उसकी शादी थी.. पिता सालों बाद उसके कमरे में आए थे। उनकी आंखों में आंसू थे और हाथों में एक लिफ़ाफ़ा। पिता ने लिफ़ाफ़ा ऋचा की ओर बढ़ाया, जिसमें एक चेक था..ऋचा के नाम का.. उसकी सालों की कमाई की पाई-पाई का चेक.. पिता रूंधे हुए गले से बोले.. तेरे कुछ साल लौटा रहा हूं.. मैंने देखा कॉलेज के बाद तेरी संगत बदली.. तेरे कदम बहकने लगे थे.. तू मेरा गुरूर थी.. तूझे बिगड़ते हुए कैसे देखता.. इसलिए ज़िम्मेदारियां लाद दीं.. अब मुझे कोई डर नहीं.. ज़िम्मेदारियां मैने वापस ले ली हैं.. तेरे साल तुझे लौटा रहा हूं..। ऋचा की आंखो से अविरल आंसू बहने लगे।