Friday, February 28, 2014

उसका मन?


बचपन से पिता की बात मानती
और बाद में पति का कहा सुनती
क्या खुद की कभी सुन पाई है..?

'ये मत करो..वो मत करो'
'शादी के बाद भी बचपना नहीं गया तुम्हारा'
क्या मन का कभी कर पाई है..?

'कैसी पसंद है तुम्हारी.. ये रंग मुझको जंचता नहीं'
'कुछ और पहन लो ये फबता नहीं'
क्या मन का कभी ओढ़ पाई है..?

'ज्यादा पढ़कर क्या करना है
चूल्हा चौका ही तो करना है'
'अब बच्चों को पढ़ाना है या खुद पढ़ना है'
क्या मन का कभी पढ़ पाई है..?

'अरे ये शौक-वौक सब बेकार की बातें'
कुछ घर के लिए करो'
'हमें क्यों बोर करती हो'
क्या सपना कोई सच कर पायी है..?

जो बात माने सबकी तो कितना प्यार पायी है
जो कर ली मन की तो बिगड़ी हुई बताई है
कर्तव्य निभाए सारे तो उसका धर्म है भाई
खुद पर जो दिया ध्यान तो बेशर्म कहलाई है

सपने संजोती थी बचपन से
उन्हें संभाले ससुराल आई है
बोझ से ज़्यादा क़ीमत नहीं है उनकी
अब तक जिन्हें ढ़ोती ही आई है..


                                                                                                  photo courtesy: Google 

Monday, February 24, 2014

वो अधूरी हसरतें..


छोटी सी ज़िन्दगी की 
छोटी-छोटी हसरतें
मचलती हैं हर दिल के किसी कोने में
हर दिल चाहता है हो जायें पूरी
पर ज़िन्दगी पे भारी हैं
ज़िम्मेदारियों के कम न होते बोझ
उतारते-उतारते जिन्हें 
जीवन जाता बीत
और वो हसरतें
रह जाती दबी..कुचली
सहमी सी
पूरी होने का ख़्बाब लिए
हो जातीं एक दिन मौन..
शून्य सी... 
निरर्थक सी..
आह !
वो अधूरी हसरतें..


Thursday, February 13, 2014

शुक्रिया तुम्हें..



जब तुम मेरे जीवन में आए
तुम बहुत सी बातें करते थे....लेकिन अधूरी 
बहुत कुछ कहना चाहते थे ... पर कहते नहीं थे
बात करते करते बीच में ही चुप हो जाते
और उन अर्थहीन बातों को बाद में मैं सोचती
पर कभी समझ नहीं पाती थी.. 
अधूरी थीं शायद इसलिए
अधूरे शब्द..अनकही बातें
अक्सर मानसिक उलझनें पैदा करती हैं
मेरे मन पर भी एक बोझ था
पत्नी होकर भी मैं अगर उनकी बातों को समझ नहीं पाऊं
तो शायद मैं असफल हूं।
और ये बोझ मैंने कई साल ढ़ोया भी.
समय के साथ चलते-चलते
हम एकदूसरे को संभालते रहे
इस रिश्ते को प्रेम और विश्वास से सींचते रहे 
और देखो.. अब इसपर फल आ रहे हैं
जो हमें कितना सुकून देते हैं
जैसा सुकून मुझे तब मिलता है जब 
तुम्हारे करने से पहले ही तुम्हारी शरारतों को भांप लेती हूँ
तुम्हारे कहने से पहले ही तुम्हारे शब्दों को पहचान लेती हूँ
तुम्हारी हर अधूरी बात को पूरा कर देती हूं
जब तुम कहते हो 'कैसे जान लेती हो मेरे मन की हर बात'
 मैं मन ही मन गर्वित हो जाती हूँ
जानते हो.. ये सुकून उन सभी सुखों से बढ़कर हैं
जो तुमने मुझे दिए 
खुद के असफल और अपूर्ण होने का बोझ अब
महसूस ही नहीं होता.. 

शुक्रिया तुम्हें.. 
मुझे पूर्ण करने के लिए।।

                                                            Happy Anniversary !

photo courtesy ~ Shruti Moghe Photography 

Monday, February 10, 2014

हम~तुम..साथ में


कभी गली के मोड़ से 
घर के टैरेस को ताकते
कभी तुझको खोजते
कभी खिड़की से झांकते 
आंखें पढ़ते हम~तुम..
साथ में

जागती रातें..
धड़कनें बढ़ाती 
वो अनछुई बातें    
शरमाते, घबराते फोन पर 
बतियाते हम~तुम..
साथ में

भीगी भीगी सी रात में
चांद के साथ में
हाथों में हाथ थे
बहके जज़्बातों में 
खोये थे हम~तुम..
साथ में

समंदर के किनारे
सीली सी रेत पर बैठे
सपनों का घर बनाते
कल को सजाते हम~तुम.. 
साथ में 

मुशकिल डगर है 
लम्बा सफर है 
पथरीले रस्ते
मगर हंसते हंसते 
पाएंगे मंज़िल हम~तुम..
साथ में

                                                               चित्र -गूगल से साभार

Sunday, February 9, 2014

बहुत ख़ास हैं ये...


                    आज 'तारे ज़मीन पर' एक बार फिर से देखी.. इस बार पहले से भी ज़्यादा अच्छी लगी। पता नहीं क्यों..शायद बीते 6 सालों में जीवन कुछ ज़्यादा ही संजीदा हो गया...इतना कुछ दिखा दिया है, कि शायद दिल पहले से ज़्यादा भावुक हो गया है.. बच्चों को देखने समझने का तरीक़ा बदल गया है। दिल को मज़बूत तो बहुत बनाया था पर आज बहुत सालों से जो थाम कर रखे थे वो आंसू रुक न सके...समझने वाले हों तो ये फिल्म कितना कुछ समझाती है।
                    अपने बच्चों को तो सब प्यार करते हैं.. समझते हैं..सारे प्रयास करते हैं उन्हें हर अच्छे से अच्छी सुविधा उपलब्ध कराने की। बहुत तो ऐसे भी हैं जो बच्चों के मांगने से पहले ही उनकी हर ज़रूरत को पूरा कर देते हैं। माता-पिता अपने कर्तव्य निभाते है और बच्चे अपने। और जीवन ऐसे ही हंसी खुशी चलता रहता है। बड़ी नॉर्मल सी है ये जिन्दगी...पर नॉर्मल दुनिया में कहीं न कहीं कुछ अबनॉर्मल भी होता है। बहुत सारे बच्चों में कुछ ऐसे भी हैं जो बाकियों से अलग हैं..सबकी तरह आसान सा जीवन नहीं होता उनका..रोज़ाना न जाने कितनी बार उनको प्रयास करना पड़ता है खुद को साबित करने के लिए...और जब असफल हो जाते हैं तो खुद पर कितना गुस्सा आता कि वो सबकी तरह क्यों नहीं हैं..कुछ उस गुस्से को दबाते हैं तो कुछ आक्रामक तरीके से व्यवहार करते हैं...कुछ तो अपने दिल की बात को कह भी नहीं पाते। हर बच्चा प्यारा होता है..शरारतें करता है अपने मन की हर इच्छा अपने माता-पिता से बताता है.. उसकी ज़िद..उसकी शरारतें..उसकी हर चीज़ माता पिता को अच्छी लगती है..पर ये बच्चे जो औरों से अलग होते हैं उनके जीवन में नार्मल कुछ नहीं होता..उनकी ज़रूरतें चॉकलेट्स और महंगे खिलौने नहीं होते..शायद वो इन सबकी इच्छा  भी न करते हों..उनकी अपनी ही दुनिया है जिसका हर क्षण चुनौतियों से भरा होता है। उपने मन के भाव वो बता नहीं पाते..इच्छाएं अपनों के सामने रख नहीं पाते..जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं वो तो मन का खेल भी नहीं पाते। औरों के लिए जहां बचपन मासूमियत से भरा होता है.. इनके जीवन में उसकी जगह धैर्य, संयम और चुनौतियों ने ले ली है। वो सबसे अच्छे..सबसे बेहतर होने के लिए नहीं लड़ते(जैसे बाकी बच्चे करते हैं).. उनके लिए मेन स्ट्रीम में आना ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। सोचकर देखने भर से अंदाज़ा होजाएगा कि कितना कठिन जीवन जीते हैं कुछ बच्चे। इन बच्चों के ऐसा होने में खुद इनका कोई क़ुसूर नहीं होता, फिर भी उम्र भर इसकी सज़ा भोगते
रहते हैं। इनके माता-पिता अगर सजग हैं तो इन्हीं की तरह वो भी हर जगह प्रयास करते हैं अपने बच्चे को उस मेनस्ट्रीम में लाने का..उनका जीवन भी अब नॉर्मल नहीं रहता। कितनी ही परेशानियां उन्हें भी झेलनी पड़ती हैं। इस सच को वो तो अपना लेते हैं क्योंकि वो माता-पिता हैं पर कोई दूसरा इसे समझ नहीं पाता। उनके लिए वो कौतुहल का विषय है..थोडी सी हमदर्दी.. इससे ज़्यादा कुछ भी नहीं। ज़्यादातर कुछ समझदार लोग अपने अच्छे बच्चों को उनके पास न जाने की हिदायतें भी देते हैं और मन में चाहते भी यही हैं कि वो बच्चे उनके बच्चों के पास न आयें। अब इन बच्चों के माता-पिता जब स्कूलों में इनके दाखिले के लिए जाते हैं, तो हर जगह एक ही जवाब पाते हैं..'ऐसे बच्चों के लिए तो स्पेशल स्कूल होते हैं, आपको वहां जाना चाहिए'।  स्कूल के प्रिंसिपल भी नहीं चाहते कि उनके स्कूल में ऐसा कोई भी बच्चा आए.. जबकि देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है। बच्चे को सिर्फ देखकर क्या उसके सामर्थ्य का आंकलन करना सही है..उसकी क़ाबिलियत उसकी अक्षमताओं के पीछे छिपी ही रह जाती है। आखों में आंसू लिए मां-बाप लौट आते हैं और ईश्वर से एक ही सवाल करते हैं कि मेरे ही बच्चे के साथ ऐसा क्यूं ? ये भेद भाव ही उन्हें हमसे अलग करता है..सोच हमारी नार्मल नहीं है..तो अबनार्मल बच्चा कैसे हुआ ?
            ये भी अच्छा है कि समाज में सभी एक जैसे नहीं होते, बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो वास्तव में इन बच्चों के लिए बहुत कुछ करते हैं। कुछ पेशे से तो कुछ दिल से। बहुत सारे स्कूल चलाये जा रहे हैं इन बच्चों को शिक्षित करने के लिए। जिससे उनके अंदर छिपी हुई क़ाबिलीयत बाहर आ सके और उनके हौसले बढ सकें।
            आज ये सब लिखने आ आशय सिर्फ इतना सा था कि सिर्फ हमदर्दी दिखाकर कोई शुभचिंतक नहीं बन जाता। अगर इन बच्चों के लिए कुछ करना है तो ज़रूरत है कि हम अपनी सोच को बदलें..उनके प्रति नॉर्मल बिहेव करें..उन्हें अजूबा न मानकर उन्हें भी एक साधारण बालक समझें। उनके मन को पढ़ने का प्रयास करें। उनकी अपेक्षा न करके उनका साथ दें...जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े और वो खुद को साबित कर पायें...कि औरों से कुछ कम हैं तो क्या हुआ हौसले सबसे ज़्यादा हैं..कुछ कमी है तो भी अपने प्रयासों से उससे उबर सकते हैं...जो ठीक हो जायें तो सबको पछाड़ भी सकते हैं।
ये बच्चे भी सभी की तरह इस दुनिया में आये हैं लेकिन कुछ कमियों के साथ.. जिन्हें स्वीकार करने में किसी को असहज महसूस नहीं करना चाहिए और उन्हें भी अपनी कमी का अहसास न कराया जाये तो ही बेहतर होगा। यही योगदान शायद एक नॉर्मल इंसान दे पाये तो इन बच्चों को बेहतर भविष्य मिल सके, एक नई राह मिल सके..अपना खुद का आसमान खुद की ज़मीं मिल सके। सच.. मासूम हैं ये..ईश्वर के भेजे हुए.. बहुत ख़ास हैं ये...।

                                                                                                                 चित्र गूगल से साभार

Tuesday, February 4, 2014

शुभरंग बसंती..

This is the 100th post of my blog. Obviously very special to me and 
I am dedicating it to the love of my life...Sunil !


पहले ये रंग इतना खूबसूरत न था 
पर जीवन के कितने सच समाए हैं इस रंग में
जिन रंगों से मेरे जीवन में खुशियां हैं
उनमें सबसे गहरा है ये रंग
ये रंग मेरे जीवन में आया
उसे नया करने
शुभ लगन लिखकर एक शुभ दिन लाया
मेरे अपनों ने मुझपर ये रंग चढ़ाया 
अपना आंगन छोड़ने की तब इच्छा न थी
पर बाबुल ने मेरे हाथ इस रंग में रंगकर 
उनके हाथों में दे दिये 
और शुभारंभ हुआ एक नये जीवन का 
आज ही का तो दिन था वो
बसंतपंचमी..
और ये बसंती रंग ले आया 
मेरे जीवन में भी बसंत
खुशियों का ये रंग 
करता हर पल बसंती
नव, नवीन ये पावन रंग 
जीवन करता ये पावन बसंती 
अब छूटे न
पिया का आंगन बसंती
जिसमें रम गया ये जीवन बसंती
रंग गई मैं भी बसंती
रंग गये पिया बसंती
कितना खूबसूरत है न ये 
शुभ रंग.. 
बसंती..

                          photo courtesy:~Chintu Pathak photography, google images


Saturday, February 1, 2014

कुछ लोग बहुत याद आते हैं..


तुम्हारे चेहरे पर तुम्हारी पूरी कहानी दिखती है
चेहरे की सिलवटों में छिपे हैं संघर्ष तुम्हारे
आखें बयां करती हैं परिश्रम तुम्हारे
तुम्हारे बालों की सफेदी में 
तुम्हारे अनुभवों की चमक दिखती है
तुम्हारी आखों में झांककर देखा नहीं किसी ने
इनमें जीने की एक छोटी सी ललक दिखती है
हमारे बुजुर्ग कितना कुछ सिखाते हैं हमें
परंपरा और संस्कार बताते हैं हमें
सीख इनकी हमेशा रखना ज़हन में
उम्र भर कहां ये साथ निभाते है
सहेज कर रख ली हैं तुम्हारी भी यादें
कुछ लोग बहुत याद आते हैं..

 photo courtesy : Nishant Kashyap Photography