Wednesday, December 3, 2014

रुकता नहीं हूं..



मेरी सफलताएं मेरी कोशिशों की कहानी 
बयां करें न करें..
मेरे हौसले कभी कम नहीं होते।
असफ़लता और सफ़लता के बीच 
जो छोटी सी रेखा है...
तमाम कोशिशों के बाद सही
धुंधला ही जाती है।

मंज़िलें मेरी भी बुलाती हैं मुझे
मैं हर पल उस ओर बढ़ता हूं
गिरता हूं..संभलता हूं..
संभलकर फिर गिर जाता हूं
पर डरता नहीं हूं..रुकता नहीं हूं..
 हारता नहीं हूं मैं ।

खुश हूं कि भीड़ का हिस्सा नहीं
सुना है कि बहुत खास हूं मैं..
मुझसे भी किसी के सपने सजते हैं
मैं रौशनी हूं किसी की आंखों की
मेरे घर में भी उम्मीदों के दिए जलते हैं।

Dec 3, International day of persons with disabilities.




3 comments:

  1. उम्मीद के दिए यूँ ही जलते रहने चाहियें ...
    बहुत खूब ...

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    Replies
    1. बहुत बहुत आभार दिगम्बर सर :)

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  2. वाह क्या बात है अच्छी लगी रचना बधाई

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।