Sunday, September 28, 2014

बेटियां हैं हम !


अपने कांधों पर हमने भी उठा रखी हैं जिम्मेदारियां,
हम भी बच्चों के भविष्य के लिए फिक्रमंद हैं,
हम कहते नहीं कभी कि दर्द हमको भी होता है,
जबकि कोल्हू के बैल की तरह हम भी पिसते हैं,
बहाते हैं पसीना..दिनभर और 
रात को अपनी आह्ह दबाकर सो जाते हैं।
सुबह से फिर जिन्दगी हाथों में दबाए
जुट जाते हैं उसे संवारने में..
बेटे भी ऐसे ही होते हैं न..
पर उन्हें छोड़ना नहीं पड़ता,    
पिता का वो स्नेहिल आंगन,
जिसे छोड़ आते हैं हम..
ले आते हैं उनकी यादों को दिलों में दबाये,
जो बनाती जाती हैं हमें 
उम्र दर उम्र..बहुत मज़बूत,
पर अंदर वो सौम्य सा दिल 
शरारतों और प्यार से भरा..
बेटियों वाला दिल..
वैसे ही धड़कता रहता है सदा के लिए..!
सच..बड़ा सुकून है कि..फक़्र करते हो तुम 
कि.. तुम्हारी बेटियां हैं हम !

Love you so much papa & mumma !!

6 comments:

  1. सहना तो जैसे दायित्व बना दिया है स्त्री का ...इन खुदाओं के बंदों ने ....
    ये सब सहन कर जब वो उच्च स्तर पर पहुंचती है तब फक्र होता है सब को ...लेकिन पिता ने कभी कमतर नहीं आँका इनको.

    भावों से भरपूर रचना :)

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  2. बहुत ही सुंदर रचना है ये परी
    शुभप्रभात

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  3. बहुत सुन्दर रचना ! बधाई आप सबको

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  4. parul
    this is one of the best from you....
    this is way too old picture and i remember all four of you and in the middle...one of the most important person of my life too......may GOD bless all of you and stay happy....

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  5. - क्या बात है वाह बहुत सही लिखा है दीदी आप ने......दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

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  6. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।