Saturday, September 27, 2014

कुछ सवाल..मेरे भी!

एक बालक जो अक्षम है, कल ही मिला मुझे। कुछ कहना चाह रहा था इस दुनिया के लोगों से। मैं उसकी भाषा जानती हूँ..तो उसके मन के सवालों को सबके सामने रख रही हूँ।

क्या पार की हैं मैंने हदें तुम्हारे कर्मक्षेत्र में प्रवेश कर..?
या फिर तोड़ दिया है खिलौना तुम्हारा..प्यारा कोई..?

जिन तत्वों के मिलने से तुमने जीवन पाया है
क्या उन्हीं के मिलन से मैंने जीवन न पाया है..?
अब मेरे हिस्से की धरती..मेरी,
और आसमान भी मैंने पाया है।

हाँ..तुमसे थोड़ी अलग-अलग है मेरे सपनों की ये दुनिया,
छल-कपट और लोभ-माया से नहीं बनी मेरी दुनिया,
तुम्हारी दुनिया में आकर, क्या मैंने कभी हस्तक्षेप किया..?
फिर मेरी दुनिया को तुमने, क्यों ये नाम 'हीन' दिया ?

क्या तुम्हारे हिस्से के दुखों को मैंने और बढ़ाया है..?
या फिर मेरे होने से मान तुम्हारा घटाया है..?

फिर क्या रोक रहा है तुमको
मेरा साथ पाने में..?
फिर क्या रोक रहा है तुमको
मेरा अस्तित्व स्वीकारने में..?



18 comments:

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    1. शुक्रिया मोनिका जी।

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  2. संवेदना एवं मानवीयता के अनुपम गुणों से युक्त बहुत ही सुन्दर रचना !

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  3. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 29/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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    1. कुलदीप जी, आभार आपका।

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  4. एक अक्षम बच्चे के मनों भावों को सुंदर शब्द दिये हैं आपने...
    मैं खुद भी 100 प्रतिशत दृष्टिहीन हूं। पर मैं ये सोचता हूं कि ऐसे प्रश्नों का समाज के लिये कोई महत्व नहीं है। अपने लिये हर आदमी की तरह अक्षम को भी अपना पथ स्वयम् बनाना पड़ता है...
    जिन माता पिता के बालक अक्षम है। उन्हे सबसे पहले उनके भविष्य के बारे में सोचना होगा। क्योंकि इस संसार में कोई भी ईश्वर की बनाई हुई ऐसी चीज नहीं है जिसका कहीं भी उपयोग न हो। केवल हमे ये देखना होता है कि उसकी आवश्यक्ता कहां है।

    आप जैसे संवेदनशील व्यक्तियों के कारण किसी भी अक्षम व्यक्ति के जीवन में भी बहार आ सकती है।

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    1. आपकी बात से सहमत हूं। इस कविता को लिखने का आशय समाज को संवेदनशील बनाने का प्रयास मात्र है। क्योंकि अगर संवेदनाएं जगेंगी तो ही मानसिक अक्षम सबके साथ मिलकर चल पाएंगें। ये सच है कि हर किसी को अपने लिए रास्ते स्वयं बनाने पड़ते हैं। पर इन बच्चों को थोडा सा सहारा चाहिए खड़े होने के लिए..जो हम ही दे सके हैं।
      आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आप तो प्रेरणा हैं हम सबके लिए। REGARDS !!

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  5. बच्चे और क्या चाहते हैं सिर्फ प्यार के ... कुछ देर को साथ के ...
    सोच को प्रेरित करते भाव ...

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    1. सोच बदलने का प्रयास है सर.. शुक्रिया

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  6. bahut badhiya ji ...har koi kaise jaan sakta hai kisi ki sanvedna....kavi ka komal man hi jaan sakta hai ye ....:)

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    1. थोड़ा सा संवेदनशील और हो जाएं सब तो हर कोई समझ सकता है..मेरे ख्याल से । आपका शुक्रिया।

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (29-09-2014) को "आओ करें आराधना" (चर्चा मंच 1751) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    शारदेय नवरात्रों की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  8. sundar, samvedansheel bhaavaabhivyakti !

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  9. संवेदना से भरपूर। एक माँ का दृष्टिकोण। स्वयं शून्य

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।