Friday, September 19, 2014

प्याले ..प्यार के !


कितनी सुनहरी थीं वो सुबह
जब साथ में हम-तुम होते थे, 
ताज़गी भरे वो घूँट..हम साथ-साथ भरते थे,
चाय के प्याले दो..तब पास-पास रहते थे,
मिठास से जिसकी..मुस्कराहटें सजती थी,
ताज़गी ऐसी की..
रग-रग में बस्ती थी।

तुम गये तो संग..सुहानी सुबह भी ले गये
अलसाई सी मैं..तब अलसाई ही रहती 
चाय के प्याले..जुदा हो गए
लम्हे् वो प्यार वाले.. भाप हो गए
अब वो ठंडे घूँट कहाँ..मेरी सुबह ताज़ा करते
न मेरी उबासियाँ ख़त्म होतीं 
न मेरी सुबह..सुबह होती

खुदा का शुक्र है
के तुम लौट आए..
वो दौर ताज़गी के फिर चल पड़े हैं
वो प्याले प्यार के दो
फिर संग हो गए हैं
मिठास जिसकी जीवन में घुलने लगी है
फ़ीकी सी सुबह मेरी..
अब सुनहरी सी होने लगी हैं।


26 comments:

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    1. O that's so good to hear.. :) thanks for visiting my blog

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  2. वाह बहुत अच्छी प्रस्तुति

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    1. धनयवाद आपका रीता जी

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  3. bahut badhiya ji .....ye to mere hi man ki baat kah dee...

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  4. bhagwan kare tumhare jeevan mey sada mithas bani rahe ......bahut khubsoorat rachna

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    1. रेवा दी, स्नेह बनाए रखिए.. :)

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  5. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 22/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  6. कामयाब कोशिश....बेहतरीन रचना...अलग रंग...अलग रूप...वाह...

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    1. संजय जी, शुक्रिया

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-09-2014) को "मेरी धरोहर...पेड़" (चर्चा मंच 1743) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत धन्यवाद सर, मेरी रचना को स्थान देने के लिए।

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  8. वाह... भावपूर्ण

    सारे रंग तुम्हारे साथ से ही हैं ...

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  9. उनका साथ है तो सब रंग साथ आ जाते हैं ... ताजगी लौट आती है ...
    बहुत समय बाद आपको पढ़ा अच्छा लगा ...

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    1. सर ताज़गी ही अब लौटी है...इसीलिए समय लग गया :)

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  10. kaun hai wo khushnaseeb jiske saath aapke chaai ke pyaale saajha kiye hain

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    1. तुम जानते हो सुरेन्द्र ... :)

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  11. बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता.

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