Sunday, July 20, 2014

सीली यादें..

तुम्हारी यादें सहेज रखी हैं मैंने,
मन के गागर से छलकती जा रही हैं।
कुछ तो बहुत नर्म हैं..
ठंडी आहों जैसी ,
और कुछ सीली पड़ी हैं..
गीले आंसू की तरह।
कुछ को तो मैंने बहला कर 
अभी सुलाया है...
और कुछ मेरे दिलासों पर 
यकीन नहीं करती हैं।
देखो..ये यादें तुम्हारी..
अब मुझसे नहीं संभलती हैं।
आ जाओ अब..
सियाह यादों को रंगीन कर दो..
खो जायें न मुझसे..
इन यादों को हक़ीकत कर दो!

9 comments:

  1. रादें बीते दिनों की होती हैं ... पर सारी को जीने के लिए सहारा जरूरी होता है ...

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  2. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 21 . 7 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  3. यादों को भी सहारा चाहिए ...सुन्दर अभिव्यक्ति |
    कर्मफल |

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  4. कोमल भावो की अभिवयक्ति......

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  5. वाह बहुत खूबसूरन. दिल को छू गई रचना

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  6. बहुत शानदार

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  7. पुकार में पीडा है

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  8. भावों से नाजुक शब्‍द को बहुत ही सहजता से रचना में रच दिया आपने.........

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  9. Yadein itni khubsurat hai ki abhi bhi unse ummidein hai.... bahut khub.

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।