Tuesday, July 8, 2014

पिछली बारिश..


याद है पिछली बारिश तुम्हें..
हर बार की तरह
हम दौड़कर गए थे छत पर..
खुले आसमान के नीचे
तन मन सब गीला..

वो बूँदें कहाँ बूंदों जैसी थीं
बस यूँ लगा की प्रेम का ही एक रूप था
जो भिगो रहा था आत्मा को भी.. 
अन्दर तलक..
तुम्हारे लबों तक जो बातें कभी आई न थीं
तुमने आँखों के ज़रिये सब कह डालीं
वो काले बादलों के बीच बिजली का कौंधना..
और एकदूसरे को देखकर मुस्कुराते हम तुम..

कितनी प्यारी थी न..
 वो पिछली बारिश..
और इस बरस ..
ये बूँदें छू ही न पायीं मुझे
आती हैं...
अपनी खुशबू से मुझे बुलाती भी हैं...
पर कैसे समझाऊं इन्हें ..
की 'उन बिन'
वो सिर्फ पानी है
 जो गीला तो कर सकती हैं तन
पर भिगो नही सकती..
मेरा अंतर्मन..
उफ्फ़...
कितनी प्यारी थी न..
वो पिछली बारिश !!


9 comments:

  1. बहुत प्यारी रचना
    बिलकुल मेरी पारी जैसी
    हार्दिक शुभ कामनाएं
    अभी तो सावन बाकी है

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  2. अंतर्मन भिगोने के लिए प्रेम भरा एहसास ... उनका साथ होना जरूरी है ...
    कोमल भाव भरी रचना ...

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  3. बहुत सुन्दर..... अंतर्मन भीगे तो अहसास जागें .....

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  4. बारिश का मौसम है और ऐसे में इतनी सुन्दर रचना पढ़कर दिल प्रसन्न हो रहा है ! दिल की गहराइयों से निकली सुन्दर अभिव्यक्ति

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  5. सुंदर भावपूर्ण कविता .

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  6. बहुत सुन्दर
    बहुत भावपूर्ण

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  7. waah parul sundar pyaari rachna.....padh kar yaad aa gaye mujhe bhi kuch din

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  8. उन बिन'
    वो सिर्फ पानी है
    जो गीला तो कर सकती हैं तन
    पर भिगो नही सकती..
    मेरा अंतर्मन..,, bahut bahut sundar rachna

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