Saturday, June 14, 2014

सुनो...


सुनो...जब सूखी धरती पर
बूँदें आसमानी गिरती हैं,
कुछ पल वो शुरुआत के 
कितने हसीन होते हैं न..
सोंधी-सोंधी खुशबू से महक उठती है धरा
उन गीली बूंदों के आलिंगन से 
कैसे खिल जाती है न..
फीके रंगों में जैसे जान सी पड़ जाती है,
ताप भुलाकर अपना 
वो भी निखर जाती है।
सुनो.. तुम मुझे उन बूंदों से दिखते हो
और मैं ..
बाहें फैलाये 
बूंदों का इंतज़ार लिए
...धरा सी !

4 comments:

  1. लाजबाव...क्या उपमेय-उपमान का संगम किया है।। अद्भुत...

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  2. अनुभूतियों और भावनाओं का सुंदर समवेश इस खूबसूरत प्रस्तुति में.

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  3. गज़ब ! एकदम सुन्दर

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