Thursday, June 12, 2014

मैं खुद को खोजती हूं..


मैं कौन थी, मैं क्या हुई,
मैं खुद को खोजती हूँ।
खो गई हूँ खुद से, मैं खुद को खोजती हूँ।
झिलमिल सितारों सी, चमकती थी दूर से ही
मैं वापस अपनी रौशन तकदीर खोजती हूँ।
कुछ हादसों की साजिश, कुछ वक़्त के थपेड़े
मैं अपनी कोई चहकती तस्वीर खोजती हूँ ।
रंग ही रंग थे, फिजाओं में बिखरे रहते थे
अब धुंध में बेरंग हुई वो तस्वीर खोजती हूँ।
हाँ खो गई हूँ खुद से, 
मैं खुद को खोजती हूँ।

5 comments:

  1. हाँ खो गई हूँ खुद से
    मैं खुद को खोजती हूँ

    .बहुत ही सुन्दर बहुत ही सुकून भरी पंक्तियाँ..!!
    बहुत ही हृदयस्पर्शी कविताएं लिखती हैं आप....पारुल जी

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  2. सुंदर भाव.. पाना-खोना..

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  3. अपनी पहचान की जद्दो जेहद ही जिंदगी है. सुंदर रचना .

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  4. ​हर इंसान यही तो करता है , एक अरसे बाद खुद को ही खोजता है ! सुन्दर अभिव्यक्ति

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