Sunday, April 13, 2014

याद


पिताजी इसी पत्थर पर आकर बैठते थे। कहते थे - मुझे यहाँ आकर बड़ा सुकून मिलता है.. जब मैं न रहूँ तो यहीं आकर मुझसे मिल लिया करना। 
बात सालों पुरानी है.. जीवन की आपाधापी में समय कब हाथ से फिसल गया.. पता ही नहीं चला। आज सालों बाद वो अपने पूरे परिवार के साथ यहाँ आया था। बच्चे खेलने लगे और वो अपने पिता से बातें करने लगा। दोनों ने काफी बातें की.. पिता ने कहा - बहुत देर लगा दी आने में.. बेटा यहाँ से दूर तक दिखता है। तुझे कुछ दिख रहा है.. उसने कहा - हाँ पापा..मै आपका हाथ थामे इन्ही वादियों में चलना सीख रहा हूँ। फिर यही आप के साथ बैठकर जीवन की दिशा चुनी। यहीं आपने समझाया था.. बेटा राशि को इस तरह से मत डांटा करो..धीरे धीरे सब समझ जाएगी..। और आज फिर आप से इतने सालों बाद मिल रहा हूँ। 
तभी राशि की आवाज़ से उसकी तन्द्रा टूटी.. उसने कहा - चलो सब वापस लौटने के लिए तैयार हैं.. वो फिर लौट पड़ा..अपने पिता कि याद उस शिला से दूर, लेकिन फिर लौटने के वादे के साथ।

8 comments:

  1. वो कहते हैं न की अपनों के जाने के बाद ही उनकी कही हर बाद कितनी सच लगती है
    खूबसूरती से बयां किया आपने ये बाप बेटे का रिश्ता, मैंने भी ऐसा ही कुछ लिखा था अभी थोड़े दिन पहले.... लिंक छोड़े जा रहा हु… कभी समय मिले तो पढियेगा..
    http://pearlsfromtheocean.blogspot.in/2014/04/father-unsung-hero.html

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  2. अपनों की यादें ही रह जाती हैं ! बढ़िया पारुल जी
    ~ ज़िन्दगी मेरे साथ -बोलो बिंदास ! ~






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  3. आपकी लिखी रचना मंगलवार 15 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  4. yahi jiwan hai ..yyaden yad aati hai ...

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  5. कुछ पल, कुछ जगहें ... कुछ यादें ... जीवन में हमेशा रहते हैं ... दूर हो कर भी करीब रहते हैं ...

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।