Monday, March 17, 2014

होली...


बहुत याद आई अपने बचपन की होली
रंगते थे एकदूसरे को बनाते थे टोली 
कितनी खुशनुमा थी अपने बचपन की होली
खाते थे छुपकर जब भी भांग की गोली
मचता था हुडदंग जमती थी होली

हंसी ठहाकों की गूंज में
जब गुम जाते थे द्वेष सारे
गुजियों से ज्यादा मीठी 
होती थी अपनी बोली

वो शिद्दत से ढूँढकर
तेरा कमरे से खेंच लाना
और गुलाल लेकर चेहरे को रंगते जाना
फिर पलट के मेरा तुझको रंग लगाना
और अपने पैरों पर तेरे हाथों का स्पर्श पाना
गले लग के मनाते थे यार अपनी होली

वक़्त के जाल में फिर उलझ सा गया जीवन
होली तो फिर नाम भर की होली हो ली
अब रोग ऐसा लग गया की खा न पाएं गुजियाँ
मिठास जीवन से गई जुबान कडवी हो ली

क्रोध में कहने भर से 
ख़त्म होते नहीं हैं रिश्ते
तेरे मेरे बनाये, हैं ही नहीं ये रिश्ते
प्यार है और रहेगा भी क्योंकि..
तेरे बिना मैंने और मेरे बिना तूने
खेली ही नहीं होली...
खेली ही नहीं होली...
             

8 comments:

  1. वाह ,
    मंगलकामनाएं रंगोत्सव की !!

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  2. yadon ke moti piriye huye sundar rachna ..

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  3. आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएँ !

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  4. होली की हार्दिक शुभकामनायें परी
    बहुत अच्छी लगी कविता

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  5. होली ही है जो सबदे ज्यादा याद आती है वो भी किसी अपने के साथ हो ...
    रंगों का ये दिन सबसे अनमोल होता है ... होली कि शुभकामनायें ...

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  6. बहुत सुंदर. शुभकामनाएँ !
    नई पोस्ट : कुछ कहते हैं दरवाजे

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  7. वाह...बहुत उम्दा और सामयिक पोस्ट...
    नयी पोस्ट@चुनाव का मौसम

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