Sunday, February 9, 2014

बहुत ख़ास हैं ये...


                    आज 'तारे ज़मीन पर' एक बार फिर से देखी.. इस बार पहले से भी ज़्यादा अच्छी लगी। पता नहीं क्यों..शायद बीते 6 सालों में जीवन कुछ ज़्यादा ही संजीदा हो गया...इतना कुछ दिखा दिया है, कि शायद दिल पहले से ज़्यादा भावुक हो गया है.. बच्चों को देखने समझने का तरीक़ा बदल गया है। दिल को मज़बूत तो बहुत बनाया था पर आज बहुत सालों से जो थाम कर रखे थे वो आंसू रुक न सके...समझने वाले हों तो ये फिल्म कितना कुछ समझाती है।
                    अपने बच्चों को तो सब प्यार करते हैं.. समझते हैं..सारे प्रयास करते हैं उन्हें हर अच्छे से अच्छी सुविधा उपलब्ध कराने की। बहुत तो ऐसे भी हैं जो बच्चों के मांगने से पहले ही उनकी हर ज़रूरत को पूरा कर देते हैं। माता-पिता अपने कर्तव्य निभाते है और बच्चे अपने। और जीवन ऐसे ही हंसी खुशी चलता रहता है। बड़ी नॉर्मल सी है ये जिन्दगी...पर नॉर्मल दुनिया में कहीं न कहीं कुछ अबनॉर्मल भी होता है। बहुत सारे बच्चों में कुछ ऐसे भी हैं जो बाकियों से अलग हैं..सबकी तरह आसान सा जीवन नहीं होता उनका..रोज़ाना न जाने कितनी बार उनको प्रयास करना पड़ता है खुद को साबित करने के लिए...और जब असफल हो जाते हैं तो खुद पर कितना गुस्सा आता कि वो सबकी तरह क्यों नहीं हैं..कुछ उस गुस्से को दबाते हैं तो कुछ आक्रामक तरीके से व्यवहार करते हैं...कुछ तो अपने दिल की बात को कह भी नहीं पाते। हर बच्चा प्यारा होता है..शरारतें करता है अपने मन की हर इच्छा अपने माता-पिता से बताता है.. उसकी ज़िद..उसकी शरारतें..उसकी हर चीज़ माता पिता को अच्छी लगती है..पर ये बच्चे जो औरों से अलग होते हैं उनके जीवन में नार्मल कुछ नहीं होता..उनकी ज़रूरतें चॉकलेट्स और महंगे खिलौने नहीं होते..शायद वो इन सबकी इच्छा  भी न करते हों..उनकी अपनी ही दुनिया है जिसका हर क्षण चुनौतियों से भरा होता है। उपने मन के भाव वो बता नहीं पाते..इच्छाएं अपनों के सामने रख नहीं पाते..जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं वो तो मन का खेल भी नहीं पाते। औरों के लिए जहां बचपन मासूमियत से भरा होता है.. इनके जीवन में उसकी जगह धैर्य, संयम और चुनौतियों ने ले ली है। वो सबसे अच्छे..सबसे बेहतर होने के लिए नहीं लड़ते(जैसे बाकी बच्चे करते हैं).. उनके लिए मेन स्ट्रीम में आना ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। सोचकर देखने भर से अंदाज़ा होजाएगा कि कितना कठिन जीवन जीते हैं कुछ बच्चे। इन बच्चों के ऐसा होने में खुद इनका कोई क़ुसूर नहीं होता, फिर भी उम्र भर इसकी सज़ा भोगते
रहते हैं। इनके माता-पिता अगर सजग हैं तो इन्हीं की तरह वो भी हर जगह प्रयास करते हैं अपने बच्चे को उस मेनस्ट्रीम में लाने का..उनका जीवन भी अब नॉर्मल नहीं रहता। कितनी ही परेशानियां उन्हें भी झेलनी पड़ती हैं। इस सच को वो तो अपना लेते हैं क्योंकि वो माता-पिता हैं पर कोई दूसरा इसे समझ नहीं पाता। उनके लिए वो कौतुहल का विषय है..थोडी सी हमदर्दी.. इससे ज़्यादा कुछ भी नहीं। ज़्यादातर कुछ समझदार लोग अपने अच्छे बच्चों को उनके पास न जाने की हिदायतें भी देते हैं और मन में चाहते भी यही हैं कि वो बच्चे उनके बच्चों के पास न आयें। अब इन बच्चों के माता-पिता जब स्कूलों में इनके दाखिले के लिए जाते हैं, तो हर जगह एक ही जवाब पाते हैं..'ऐसे बच्चों के लिए तो स्पेशल स्कूल होते हैं, आपको वहां जाना चाहिए'।  स्कूल के प्रिंसिपल भी नहीं चाहते कि उनके स्कूल में ऐसा कोई भी बच्चा आए.. जबकि देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है। बच्चे को सिर्फ देखकर क्या उसके सामर्थ्य का आंकलन करना सही है..उसकी क़ाबिलियत उसकी अक्षमताओं के पीछे छिपी ही रह जाती है। आखों में आंसू लिए मां-बाप लौट आते हैं और ईश्वर से एक ही सवाल करते हैं कि मेरे ही बच्चे के साथ ऐसा क्यूं ? ये भेद भाव ही उन्हें हमसे अलग करता है..सोच हमारी नार्मल नहीं है..तो अबनार्मल बच्चा कैसे हुआ ?
            ये भी अच्छा है कि समाज में सभी एक जैसे नहीं होते, बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो वास्तव में इन बच्चों के लिए बहुत कुछ करते हैं। कुछ पेशे से तो कुछ दिल से। बहुत सारे स्कूल चलाये जा रहे हैं इन बच्चों को शिक्षित करने के लिए। जिससे उनके अंदर छिपी हुई क़ाबिलीयत बाहर आ सके और उनके हौसले बढ सकें।
            आज ये सब लिखने आ आशय सिर्फ इतना सा था कि सिर्फ हमदर्दी दिखाकर कोई शुभचिंतक नहीं बन जाता। अगर इन बच्चों के लिए कुछ करना है तो ज़रूरत है कि हम अपनी सोच को बदलें..उनके प्रति नॉर्मल बिहेव करें..उन्हें अजूबा न मानकर उन्हें भी एक साधारण बालक समझें। उनके मन को पढ़ने का प्रयास करें। उनकी अपेक्षा न करके उनका साथ दें...जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े और वो खुद को साबित कर पायें...कि औरों से कुछ कम हैं तो क्या हुआ हौसले सबसे ज़्यादा हैं..कुछ कमी है तो भी अपने प्रयासों से उससे उबर सकते हैं...जो ठीक हो जायें तो सबको पछाड़ भी सकते हैं।
ये बच्चे भी सभी की तरह इस दुनिया में आये हैं लेकिन कुछ कमियों के साथ.. जिन्हें स्वीकार करने में किसी को असहज महसूस नहीं करना चाहिए और उन्हें भी अपनी कमी का अहसास न कराया जाये तो ही बेहतर होगा। यही योगदान शायद एक नॉर्मल इंसान दे पाये तो इन बच्चों को बेहतर भविष्य मिल सके, एक नई राह मिल सके..अपना खुद का आसमान खुद की ज़मीं मिल सके। सच.. मासूम हैं ये..ईश्वर के भेजे हुए.. बहुत ख़ास हैं ये...।

                                                                                                                 चित्र गूगल से साभार

4 comments:

  1. बच्चे तो बच्चे ही होते हैं हम बड़े ही होते हैं जो उन्हें वर्गों में बाँट देते हैं .....
    ये एक बहुत गंभीर विषय है......और चिंतनीय भी ......

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  2. बहुत सही कहा.उन्हें उनकी कमी का अहसास न कराना ही बेहतर होगा तभी उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा.
    नई पोस्ट : फागुन की धूप

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  3. sach me we bahut khas hai tabhi to har dil ke paas hai ....

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।