Friday, February 28, 2014

उसका मन?


बचपन से पिता की बात मानती
और बाद में पति का कहा सुनती
क्या खुद की कभी सुन पाई है..?

'ये मत करो..वो मत करो'
'शादी के बाद भी बचपना नहीं गया तुम्हारा'
क्या मन का कभी कर पाई है..?

'कैसी पसंद है तुम्हारी.. ये रंग मुझको जंचता नहीं'
'कुछ और पहन लो ये फबता नहीं'
क्या मन का कभी ओढ़ पाई है..?

'ज्यादा पढ़कर क्या करना है
चूल्हा चौका ही तो करना है'
'अब बच्चों को पढ़ाना है या खुद पढ़ना है'
क्या मन का कभी पढ़ पाई है..?

'अरे ये शौक-वौक सब बेकार की बातें'
कुछ घर के लिए करो'
'हमें क्यों बोर करती हो'
क्या सपना कोई सच कर पायी है..?

जो बात माने सबकी तो कितना प्यार पायी है
जो कर ली मन की तो बिगड़ी हुई बताई है
कर्तव्य निभाए सारे तो उसका धर्म है भाई
खुद पर जो दिया ध्यान तो बेशर्म कहलाई है

सपने संजोती थी बचपन से
उन्हें संभाले ससुराल आई है
बोझ से ज़्यादा क़ीमत नहीं है उनकी
अब तक जिन्हें ढ़ोती ही आई है..


                                                                                                  photo courtesy: Google 

17 comments:

  1. काटती तो चींटी भी है
    पैरो तले रौंदी जाती है तो
    हार्दिक शुभकामनायें

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 01/03/2014 को "सवालों से गुजरना जानते हैं" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1538 पर.

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    1. आभार राजीव जी मेरी रचना को मंच देने के लिए।

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  3. bahut saarthak bat kahi hain......:-)

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  4. बेहद संवेदनशील रचना ………दिल के पास से गुजरती हुई

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  5. यथार्थ संवेदना .....

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  6. आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद..

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  7. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन आप, Whatsapp और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. दिल को छु गयी...

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  9. बहुत ही लाज़वाब प्रस्तुति

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  10. bahut sundar rachna ....yahi to hota hai har ladki -aurt ke sath ...

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  11. बहुत सशक्त ,सटीक ..

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  12. नारी जीवन की ये विडंबना है ... पर समय आने वाला है जब नारी अपने मन का करेगी ...
    हिम्मत नहीं हारना चाहिए ...

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।