Saturday, December 27, 2014

बे~वजह प्यार..


तुम कहते हो 
"तुम्हें प्यार करता हूं..
बेवजह,
प्यार करने के लिए 
क्या वजह होना ज़रूरी है?''
पर जानते हो...
एक भी वजह
जो तुम मुझे बताओगे
मैं सच कहती हूं..
मेरी आंखों में 
प्यार ही पाओगे
थोड़ी सी शरमा जाउंगी
थोड़े से गुगूर में भी रंग जाउंगी
पर सच कहती हूं
जी उठूंगी.. 
थोड़ा सा और 
खिल जाउंगी..
थोड़ा सा और 
तो बताओ न..
एक भी वजह
मुझे बेवजह प्यार करने की.. !

Sunday, December 7, 2014

तू भोर मेरी..


तू भोर मेरी
तू ही रौशनी
तू हंसी मेरी 
तू सुकून भी

तू रगों में बहते
 रक्त सा
तू सांसे मेरी..
धड़कन मेरी
सब हारी मैं
तू जीत मेरी

कितना सुखद 
जो तूने कहा
'मां'
तू सबकुछ मेरी..
सबकुछ मेरी..
                                                                                      love you son !

Thursday, December 4, 2014

मखमली शॉल..


क्यूं कहते हो..
कि मैं अपना ख़्याल नहीं रखती?
जानते हो... मेरे पास कुछ ख़ास है..
हर पल साथ रहता है 
साये की तरह..
ढाँके रखता है मुझे
धूल के थपेड़ों में..
सेकता है 
मेरे हर कंपकंपाते पल को..
ताज़ा रखता है 
तुमसे साझा किये 
हर लम्हे को..

तुम्हारे प्रेम..
परवाह 
और फ़िक्र से बुना 
वो मखमली शॉल..
सुनो...
ऊन के रेशों में 
वो तुम्हारे प्यार वाली बात कहाँ..!

Wednesday, December 3, 2014

रुकता नहीं हूं..



मेरी सफलताएं मेरी कोशिशों की कहानी 
बयां करें न करें..
मेरे हौसले कभी कम नहीं होते।
असफ़लता और सफ़लता के बीच 
जो छोटी सी रेखा है...
तमाम कोशिशों के बाद सही
धुंधला ही जाती है।

मंज़िलें मेरी भी बुलाती हैं मुझे
मैं हर पल उस ओर बढ़ता हूं
गिरता हूं..संभलता हूं..
संभलकर फिर गिर जाता हूं
पर डरता नहीं हूं..रुकता नहीं हूं..
 हारता नहीं हूं मैं ।

खुश हूं कि भीड़ का हिस्सा नहीं
सुना है कि बहुत खास हूं मैं..
मुझसे भी किसी के सपने सजते हैं
मैं रौशनी हूं किसी की आंखों की
मेरे घर में भी उम्मीदों के दिए जलते हैं।

Dec 3, International day of persons with disabilities.




Friday, October 24, 2014

मैं बाती..


मैं बाती..
और तुम दिए समान 
गहन,
तुम्हारे प्रेम में डूबी मैं 
हरती..
अपने रिश्ते का
हर अंधियारा कोना
रौशन करती मुस्कुराहटें ...

मुझको खुद में समेटे
सशक्त तुम..
ताप सहकर भी 
देते सहनशक्ति।

मिलन से हमारे
ये जो है प्रकाशित
तेज ये अलौकिक 
परिणाम हमारे तप का

निरंतर जलकर भी 
तपती नहीं..
अग्नि होकर भी
जलती नहीं..
प्रकाशित रहूंगी सर्वदा
जो सींचता रहेगा जीवन
प्रेम घृत तुम्हारा।।

Happy Diwali hubby!

Tuesday, October 14, 2014

'मां'


तेरी शैतानियों पर
कभी गुस्सा..
तो कभी प्यार आता है,
संग तेरे..
मेरा बचपन भी 
मुस्कुराता है,
भीग जाती हूँ मैं..
अन्दर तलक..
जब गले लगकर 
तू मुझको 
'माँ' बुलाता है!

Friday, October 3, 2014

रावण...

कोशिशें जारी हैं
उसपर विजय पाने की,
लडते आ रहे हैं उससे..
जिद है उसे हराने की,
पर और विशाल हो जाता है वो
हर वार के बाद
सवाल हर बरस मन में कहीं रह जाता है..
मन का रावण क्यों कभी
 जल नहीं पाता है..?

                                                           Photo courtesy: Times of India

Sunday, September 28, 2014

बेटियां हैं हम !


अपने कांधों पर हमने भी उठा रखी हैं जिम्मेदारियां,
हम भी बच्चों के भविष्य के लिए फिक्रमंद हैं,
हम कहते नहीं कभी कि दर्द हमको भी होता है,
जबकि कोल्हू के बैल की तरह हम भी पिसते हैं,
बहाते हैं पसीना..दिनभर और 
रात को अपनी आह्ह दबाकर सो जाते हैं।
सुबह से फिर जिन्दगी हाथों में दबाए
जुट जाते हैं उसे संवारने में..
बेटे भी ऐसे ही होते हैं न..
पर उन्हें छोड़ना नहीं पड़ता,    
पिता का वो स्नेहिल आंगन,
जिसे छोड़ आते हैं हम..
ले आते हैं उनकी यादों को दिलों में दबाये,
जो बनाती जाती हैं हमें 
उम्र दर उम्र..बहुत मज़बूत,
पर अंदर वो सौम्य सा दिल 
शरारतों और प्यार से भरा..
बेटियों वाला दिल..
वैसे ही धड़कता रहता है सदा के लिए..!
सच..बड़ा सुकून है कि..फक़्र करते हो तुम 
कि.. तुम्हारी बेटियां हैं हम !

Love you so much papa & mumma !!

Saturday, September 27, 2014

कुछ सवाल..मेरे भी!

एक बालक जो अक्षम है, कल ही मिला मुझे। कुछ कहना चाह रहा था इस दुनिया के लोगों से। मैं उसकी भाषा जानती हूँ..तो उसके मन के सवालों को सबके सामने रख रही हूँ।

क्या पार की हैं मैंने हदें तुम्हारे कर्मक्षेत्र में प्रवेश कर..?
या फिर तोड़ दिया है खिलौना तुम्हारा..प्यारा कोई..?

जिन तत्वों के मिलने से तुमने जीवन पाया है
क्या उन्हीं के मिलन से मैंने जीवन न पाया है..?
अब मेरे हिस्से की धरती..मेरी,
और आसमान भी मैंने पाया है।

हाँ..तुमसे थोड़ी अलग-अलग है मेरे सपनों की ये दुनिया,
छल-कपट और लोभ-माया से नहीं बनी मेरी दुनिया,
तुम्हारी दुनिया में आकर, क्या मैंने कभी हस्तक्षेप किया..?
फिर मेरी दुनिया को तुमने, क्यों ये नाम 'हीन' दिया ?

क्या तुम्हारे हिस्से के दुखों को मैंने और बढ़ाया है..?
या फिर मेरे होने से मान तुम्हारा घटाया है..?

फिर क्या रोक रहा है तुमको
मेरा साथ पाने में..?
फिर क्या रोक रहा है तुमको
मेरा अस्तित्व स्वीकारने में..?



Friday, September 19, 2014

प्याले ..प्यार के !


कितनी सुनहरी थीं वो सुबह
जब साथ में हम-तुम होते थे, 
ताज़गी भरे वो घूँट..हम साथ-साथ भरते थे,
चाय के प्याले दो..तब पास-पास रहते थे,
मिठास से जिसकी..मुस्कराहटें सजती थी,
ताज़गी ऐसी की..
रग-रग में बस्ती थी।

तुम गये तो संग..सुहानी सुबह भी ले गये
अलसाई सी मैं..तब अलसाई ही रहती 
चाय के प्याले..जुदा हो गए
लम्हे् वो प्यार वाले.. भाप हो गए
अब वो ठंडे घूँट कहाँ..मेरी सुबह ताज़ा करते
न मेरी उबासियाँ ख़त्म होतीं 
न मेरी सुबह..सुबह होती

खुदा का शुक्र है
के तुम लौट आए..
वो दौर ताज़गी के फिर चल पड़े हैं
वो प्याले प्यार के दो
फिर संग हो गए हैं
मिठास जिसकी जीवन में घुलने लगी है
फ़ीकी सी सुबह मेरी..
अब सुनहरी सी होने लगी हैं।


Saturday, September 13, 2014

मेरे चेहरे पे मत जाना..


देखो..मेरे चेहरे पे मत जाना

कभी-कभी रंगकर्मी की तरह
बदल लेती हूँ भाव अपने चेहरे के
सीख रही हूँ न..
जीवन जीने की कला
दुनिया भी तो ऐसी ही है न
शक्ल देखकर..मन पढ़ लेती है

पर मैं..
अब बदल लेती हूँ
अपने माथे की सिलवटों को 
मिला देती हूँ उन्हें उन लकीरों में
जो हंसते हुए चेहरे पर उभर आती हैं

सारी व्याकुलताओं को
आँखों के काजल में छुपाकर
बना लेती हूँ रात सी...
भोर का इंतज़ार करती

मैंने आंसुओं को भी समझाना सीख लिया है
कह दिया है.. थोड़ा शरमाया करो..
आवारा बन सबके सामने न आया करो
वो भी अब मानकर मेरी बात
 छिपे रहते हैं मुखौटे की ओ़ट में

तो सुना न..
मेरे चेहरे पे मत जाना

Wednesday, August 27, 2014

तेरे प्यार में...



कितने रंग निखर आये हैं
तेरे प्यार के मुझपर,
कभी दिन में सुरमई,
रातों में अक्सर सियाह सी,
तेरी यादों में पीली..
और तेरे पास होने से
लाल हो गई हूँ..
तेरे प्यार में यार
मैं गुलाल हो गई हूँ.. 

Sunday, July 20, 2014

सीली यादें..

तुम्हारी यादें सहेज रखी हैं मैंने,
मन के गागर से छलकती जा रही हैं।
कुछ तो बहुत नर्म हैं..
ठंडी आहों जैसी ,
और कुछ सीली पड़ी हैं..
गीले आंसू की तरह।
कुछ को तो मैंने बहला कर 
अभी सुलाया है...
और कुछ मेरे दिलासों पर 
यकीन नहीं करती हैं।
देखो..ये यादें तुम्हारी..
अब मुझसे नहीं संभलती हैं।
आ जाओ अब..
सियाह यादों को रंगीन कर दो..
खो जायें न मुझसे..
इन यादों को हक़ीकत कर दो!

Tuesday, July 8, 2014

पिछली बारिश..


याद है पिछली बारिश तुम्हें..
हर बार की तरह
हम दौड़कर गए थे छत पर..
खुले आसमान के नीचे
तन मन सब गीला..

वो बूँदें कहाँ बूंदों जैसी थीं
बस यूँ लगा की प्रेम का ही एक रूप था
जो भिगो रहा था आत्मा को भी.. 
अन्दर तलक..
तुम्हारे लबों तक जो बातें कभी आई न थीं
तुमने आँखों के ज़रिये सब कह डालीं
वो काले बादलों के बीच बिजली का कौंधना..
और एकदूसरे को देखकर मुस्कुराते हम तुम..

कितनी प्यारी थी न..
 वो पिछली बारिश..
और इस बरस ..
ये बूँदें छू ही न पायीं मुझे
आती हैं...
अपनी खुशबू से मुझे बुलाती भी हैं...
पर कैसे समझाऊं इन्हें ..
की 'उन बिन'
वो सिर्फ पानी है
 जो गीला तो कर सकती हैं तन
पर भिगो नही सकती..
मेरा अंतर्मन..
उफ्फ़...
कितनी प्यारी थी न..
वो पिछली बारिश !!


Tuesday, June 24, 2014

आत्महत्या..हल नहीं


"कभी कभी कुछ सत्य विचलित कर देते हैं मन
वो मेरे इतनी करीब भी नहीं थी..
फिर क्यों मन उसका लिखा पढ़कर विचलित हो उठा
उसके दर्द को महसूस भी करना चाहा,
पर उसकी पीड़ा की अनुभूति 
मुझे किस तरह होती.. 
न जाने क्या झेला होगा उसने और 
आगे क्या झेल पाना उसके लिए संभव नहीं था
की जिसके आगे उसे 
अपना जीवन त्याग देना बेहतर लगा।
वो जीवन जिसे सँवारने के लिए 
कितनी मेहनत की होगी उसने,
अपने ख्वाब पूरे करने के लिए 
कितनी ही बार समाज से लड़ा होगा,
मेहनत से खुद की पहचान बनाई होगी।
शायद उसे ये पता ही नहीं है
की उसके जैसे लोग कितने कम हैं इस दुनिया में,
कितने सारे लोगों को बिना मिले भी प्रेरणा देती है वो,
कितनी ही लड़कियों की आँखों में 
एक ख्वाब जगाती है वो..
पर क्या खुद को जानती है वो?
नहीं....
जो जान पाती तो 
जान देने की कोशिश न करती।
पर खुश हूँ... कि वो है..
अब खुद को जानने के लिए।
और ये मानने के लिए की 
जान किसी की भी हो 
..बहुत कीमती होती है।"


(मेरी ये दोस्त भारत के एक जानेमाने न्यूज़ चैनल की प्रतिष्ठित एंकर है जो मानसिक उत्पीडन की शिकार हुई )

Monday, June 16, 2014

सपने मरा नहीं करते !


सपने मरा नहीं करते..जिंदा रहते हैं
आँखों में जो खारा सा सागर है न..
उसकी तली पर पड़ी सीपियों में बंद रहते हैं
मोती की तरह
परत दर परत बढता इंतज़ार 
बना देता है उन्हें अनमोल...सदा के लिए।
सपने मरा नहीं करते...जिन्दा रहते हैं
माथे की सिलवटों में छुपे रहते हैं..
डरते हैं कभी कभी.. कि साकार हो गए तो...
कितने ही दिल टूट जायेंगे
कितने ही अपने रूठ जायेंगे
और कितने ही ख्वाब फिर बंद हो जायेंगे
उन्हीं सीपियों में..
निःशब्द से...
गुमनाम से..
सच..सपने मरा नहीं करते !

Saturday, June 14, 2014

सुनो...


सुनो...जब सूखी धरती पर
बूँदें आसमानी गिरती हैं,
कुछ पल वो शुरुआत के 
कितने हसीन होते हैं न..
सोंधी-सोंधी खुशबू से महक उठती है धरा
उन गीली बूंदों के आलिंगन से 
कैसे खिल जाती है न..
फीके रंगों में जैसे जान सी पड़ जाती है,
ताप भुलाकर अपना 
वो भी निखर जाती है।
सुनो.. तुम मुझे उन बूंदों से दिखते हो
और मैं ..
बाहें फैलाये 
बूंदों का इंतज़ार लिए
...धरा सी !

Thursday, June 12, 2014

मैं खुद को खोजती हूं..


मैं कौन थी, मैं क्या हुई,
मैं खुद को खोजती हूँ।
खो गई हूँ खुद से, मैं खुद को खोजती हूँ।
झिलमिल सितारों सी, चमकती थी दूर से ही
मैं वापस अपनी रौशन तकदीर खोजती हूँ।
कुछ हादसों की साजिश, कुछ वक़्त के थपेड़े
मैं अपनी कोई चहकती तस्वीर खोजती हूँ ।
रंग ही रंग थे, फिजाओं में बिखरे रहते थे
अब धुंध में बेरंग हुई वो तस्वीर खोजती हूँ।
हाँ खो गई हूँ खुद से, 
मैं खुद को खोजती हूँ।

Saturday, June 7, 2014

मुश्किल पल..


वो पल बहुत मुश्किल था
दूर जा रहा था वो आहिस्ता-आहिस्ता !
अपने साथ मेरा एक हिस्सा लिए
और छूट रहा था 
एक जिस्म..पीछे कहीं
लबों पर झूठी मुस्कान लिये
सच..वो पल बहुत मुश्किल था
दूर जा रहा था वो आहिस्ता-आहिस्ता !

Thursday, May 8, 2014

तुम..


ग़लत हो जाती हूं अकसर, 
और ग़लत होना बुरा भी तो नहीं
क्योकिं तब.. 
सही होते हो तुम !

कभी-कभी ग़लत होकर 
सच्चाई दिखती है तुम्हारी आंखों में
और तब ग़लतियां मानकर अपनी
खुश भी हो जाती हूं 
क्योंकि तब..
सही होते हो तुम!

हार-जीत के मायने ख़त्म हो जाते हैं 
जब हारकर भी खुशी मिलने लगे
कभी-कभी हारना भी अच्छा लगता है 
अगर हराने वाले होते हो तुम !

हां..हार ही तो गई हूं खुद को
और जीत लिया है तुमने मुझको
और ये हारना बुरा भी तो नहीं
क्योंकि तब..
जीत जाते हो तुम !

                                                                                               love you !!

Tuesday, April 22, 2014

वो बातें..


वो छिपी हुई हैं मन में कहीं,  वो जिन्हें कभी भी सुना नहीं
वो जो बिखरी हुई थीं यहाँ वहां, जिन्हें तुमने ह्रदय में दबा लिया।

वो चाशनी से पगी हुईं, कानों में रस घोलती
वो जिनको सुनकर ख़ुशी मेरी, आंसुओं में बरबस डोलती
वो बातें शब्दविहीन सी, आत्ममंथन करती हुई
वो बातें समुद्र की लहरों सी
जिन्हें तुमने ह्रदय में दबा लिया।।

वो बातें छोटी मोटी सी, वो बातें कच्ची-पक्की सी
वो बातें हंसाती तोतली, वो बातें फूल बिखेरती 
वो बातें शरारतों में ढली हुई, वो बातें बालपन में रमी हुई
वो बातें तुम्हारे बचपन की
जिन्हें तुमने ह्रदय में दबा लिया।।

कही अनकही के बीच का, ये जो वक़्त है पहाड़ सा
शुन्य से शुरू हुआ, ये सफ़र है अपार सा
वो बातें पथ के कांटों सी
जिन्हें तुमने ह्रदय में दबा लिया।।

वो बातें इंतज़ार में लिपटी हुई, मेरे धैर्य का इम्तिहान हैं
मुझ में जीवन घोलती, मेरी खुशियों का सामान हैं
वो बातें तेरी मेरी सी, जिन्हें तुमने कभी भी कहा नहीं
वो बातें मेरा जीवन हैं
जिन्हें तुमने ह्रदय में दबा लिया।।

                                                               You are not alone..I am with you.. hamesha
                                                                   love you Beta !!

Sunday, April 13, 2014

याद


पिताजी इसी पत्थर पर आकर बैठते थे। कहते थे - मुझे यहाँ आकर बड़ा सुकून मिलता है.. जब मैं न रहूँ तो यहीं आकर मुझसे मिल लिया करना। 
बात सालों पुरानी है.. जीवन की आपाधापी में समय कब हाथ से फिसल गया.. पता ही नहीं चला। आज सालों बाद वो अपने पूरे परिवार के साथ यहाँ आया था। बच्चे खेलने लगे और वो अपने पिता से बातें करने लगा। दोनों ने काफी बातें की.. पिता ने कहा - बहुत देर लगा दी आने में.. बेटा यहाँ से दूर तक दिखता है। तुझे कुछ दिख रहा है.. उसने कहा - हाँ पापा..मै आपका हाथ थामे इन्ही वादियों में चलना सीख रहा हूँ। फिर यही आप के साथ बैठकर जीवन की दिशा चुनी। यहीं आपने समझाया था.. बेटा राशि को इस तरह से मत डांटा करो..धीरे धीरे सब समझ जाएगी..। और आज फिर आप से इतने सालों बाद मिल रहा हूँ। 
तभी राशि की आवाज़ से उसकी तन्द्रा टूटी.. उसने कहा - चलो सब वापस लौटने के लिए तैयार हैं.. वो फिर लौट पड़ा..अपने पिता कि याद उस शिला से दूर, लेकिन फिर लौटने के वादे के साथ।

Thursday, April 10, 2014

Happy Birth Day...



अपना प्यार जताने के लिए उपहार देना बहुत सहज सी बात है।
कोशिशें तो मैंने भी बहुत कीं प्यार जताने की, उपहारों के माध्यम से ...
लेकिन बहुत देर से समझी..
कि जिसके लिए प्यार ही सबसे अनमोल हो
उसको ये बेमोल के तोहफ़े कहाँ भाएंगे..
वो मेरे प्यार को सबसे अनमोल कहता है और
मैं उसके प्यार को सबसे क़ीमती समझती हूं..
अब और क्या दूँ तुम्हें, मेरे प्यार से बढ़कर हो जो..
दिल तेरा..साँसे तेरी..तू मेरा और मैं तेरी।   
जन्मदिन पर ढेर सारा प्यार तुम्हारे लिए  

Happy birthday Hubby !!

Saturday, April 5, 2014

अहसास.. तेरे संग होने का


तपती धूप में बारिश की बूंद जैसा
भरी थकान में चाय के गर्म घूंट जैसा
पंखुडियों पर टिकी ओस की बूंद हो जैसे.. 
मंदिर में जलते दिये की लौ जैसा
कभी लगता है माथे पर सजी बिंदिया जैसा
कजरारी आंखों में तैरते हुए ख़्वाब की तरह
और कभी लौंग के लशकारे की तरह झिलमिलाता सा..
खूबसूरत है..
 धड़कनों को शिथिल सा कर जाता है
सुख और सुकून के मिलन से जन्मा 
एक अहसास..
तेरे संग होने का

सच.. बहुत सुखद है 
तेरा होना..
मेरे संग होना..!


photo courtesy: 'Nishant Kashyap Photography'

Monday, March 17, 2014

होली...


बहुत याद आई अपने बचपन की होली
रंगते थे एकदूसरे को बनाते थे टोली 
कितनी खुशनुमा थी अपने बचपन की होली
खाते थे छुपकर जब भी भांग की गोली
मचता था हुडदंग जमती थी होली

हंसी ठहाकों की गूंज में
जब गुम जाते थे द्वेष सारे
गुजियों से ज्यादा मीठी 
होती थी अपनी बोली

वो शिद्दत से ढूँढकर
तेरा कमरे से खेंच लाना
और गुलाल लेकर चेहरे को रंगते जाना
फिर पलट के मेरा तुझको रंग लगाना
और अपने पैरों पर तेरे हाथों का स्पर्श पाना
गले लग के मनाते थे यार अपनी होली

वक़्त के जाल में फिर उलझ सा गया जीवन
होली तो फिर नाम भर की होली हो ली
अब रोग ऐसा लग गया की खा न पाएं गुजियाँ
मिठास जीवन से गई जुबान कडवी हो ली

क्रोध में कहने भर से 
ख़त्म होते नहीं हैं रिश्ते
तेरे मेरे बनाये, हैं ही नहीं ये रिश्ते
प्यार है और रहेगा भी क्योंकि..
तेरे बिना मैंने और मेरे बिना तूने
खेली ही नहीं होली...
खेली ही नहीं होली...
             

Monday, March 10, 2014

महिला दिवस !


मेरी कामवाली जब आज सुबह नहीं आई तो गुस्से की जगह चेहरे पर मुस्कुराहट आई। आज महिला दिवस है और उसे भी पूरा ह़क है इस दिन को अपने तरीक़े से मनाने का। कुछ 2 घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई.. देखा तो कामवाली थी। मैंने पूछा "आज क्या हुआ तुझे.. इतनी देर से कैसे आई।" वो बोली "दीदी आज मेरी बेटी के स्कूल में महिला दिवस समारोह था वहां मुझे भी बुलाया गया था। आपसे कहना भूल गई थी।" मैंने पूछा "तो कैसे मनाया तुमने महिला दिवस?'' वो बोली ''अरे दीदी मेरे लिए तो सारे दिवस एक ही जैसे हैं। मैं बस एक बात जानती हूं कि मुझे मेरी बेटियों को पढ़ाना है और उसके लिए मुझे जितनी भी मेहनत करनी पड़े..मैं करूंगी, उनकी पढ़ाई कभी रुकने नहीं दूंगी।" मन ही मन मुझे गर्व हुआ उसपर..और एक महिला होने पर। सोचा कि.. देर से ही सही पर जागरुक हो रही हैं महिलाएं..आने वाला समय निश्चित ही महिलाओं के लिए बेहतर होगा। इससे अच्छा महिला दिवस मेरे लिए कोई न था।

Monday, March 3, 2014

वो कुछ साल..

~ लघु कथा लिखने का ये पहला प्रयास था। 'नया लेखन - नए दस्तखत ' ने चित्रकथा प्रतियोगित का आयोजन किया , जिसमें मेरी लघुकथा को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया ~

                  ऋचा कॉलेज क्या पहुंची.. उसके तो पंख ही लग गए। आज़ाद खयालों की ऋचा अपने मन का करती.. नये-नये दोस्त बनाती। कॉलेज ख़त्म होते होते ऋचा का लाइफ़स्टाइल बदल चुका था। नए जीवन के सपने लिए ऋचा सातवें आसमान पर थी.. एक दिन पिता ने उसे बुलाकर कहा ‘अब तुम बड़ी हो गई हो, और मैं रिटायर.. अब परिवार का ध्यान तुम्हें ही रखना है।‘ ऋचा ज़मीन पर आ गई थी। जल्दी ही उसे नौकरी भी मिल गई थी.. लेकिन खर्च पूरा नहीं पड़ता था.. उसने ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू कर दिया था। उसे पता ही नहीं चला कि ये 5 साल कैसे बीत गए। लोग कहते पिता उसकी कमाई पर ऐश कर रहे हैं.. शुरू में तो उसे बुरा लगता लेकिन अब उसे भी ऐसा ही लगने लगा था।
                 पिता ने अपने दोस्त के बेटे वरूण से ऋचा की शादी तय कर दी थी.. एक बारगी उसने सोचा कि अब घर का खर्च कैसे चलेगा.. पर वरूण ने कहा कि शादी तो कर लो बाकी बाद में देखेंगे। आज उसकी शादी थी.. पिता सालों बाद उसके कमरे में आए थे। उनकी आंखों में आंसू थे और हाथों में एक लिफ़ाफ़ा। पिता ने लिफ़ाफ़ा ऋचा की ओर बढ़ाया, जिसमें एक चेक था..ऋचा के नाम का.. उसकी सालों की कमाई की पाई-पाई का चेक.. पिता रूंधे हुए गले से बोले.. तेरे कुछ साल लौटा रहा हूं.. मैंने देखा कॉलेज के बाद तेरी संगत बदली.. तेरे कदम बहकने लगे थे.. तू मेरा गुरूर थी.. तूझे बिगड़ते हुए कैसे देखता.. इसलिए ज़िम्मेदारियां लाद दीं.. अब मुझे कोई डर नहीं.. ज़िम्मेदारियां मैने वापस ले ली हैं.. तेरे साल तुझे लौटा रहा हूं..। ऋचा की आंखो से अविरल आंसू बहने लगे।

Friday, February 28, 2014

उसका मन?


बचपन से पिता की बात मानती
और बाद में पति का कहा सुनती
क्या खुद की कभी सुन पाई है..?

'ये मत करो..वो मत करो'
'शादी के बाद भी बचपना नहीं गया तुम्हारा'
क्या मन का कभी कर पाई है..?

'कैसी पसंद है तुम्हारी.. ये रंग मुझको जंचता नहीं'
'कुछ और पहन लो ये फबता नहीं'
क्या मन का कभी ओढ़ पाई है..?

'ज्यादा पढ़कर क्या करना है
चूल्हा चौका ही तो करना है'
'अब बच्चों को पढ़ाना है या खुद पढ़ना है'
क्या मन का कभी पढ़ पाई है..?

'अरे ये शौक-वौक सब बेकार की बातें'
कुछ घर के लिए करो'
'हमें क्यों बोर करती हो'
क्या सपना कोई सच कर पायी है..?

जो बात माने सबकी तो कितना प्यार पायी है
जो कर ली मन की तो बिगड़ी हुई बताई है
कर्तव्य निभाए सारे तो उसका धर्म है भाई
खुद पर जो दिया ध्यान तो बेशर्म कहलाई है

सपने संजोती थी बचपन से
उन्हें संभाले ससुराल आई है
बोझ से ज़्यादा क़ीमत नहीं है उनकी
अब तक जिन्हें ढ़ोती ही आई है..


                                                                                                  photo courtesy: Google 

Monday, February 24, 2014

वो अधूरी हसरतें..


छोटी सी ज़िन्दगी की 
छोटी-छोटी हसरतें
मचलती हैं हर दिल के किसी कोने में
हर दिल चाहता है हो जायें पूरी
पर ज़िन्दगी पे भारी हैं
ज़िम्मेदारियों के कम न होते बोझ
उतारते-उतारते जिन्हें 
जीवन जाता बीत
और वो हसरतें
रह जाती दबी..कुचली
सहमी सी
पूरी होने का ख़्बाब लिए
हो जातीं एक दिन मौन..
शून्य सी... 
निरर्थक सी..
आह !
वो अधूरी हसरतें..


Thursday, February 13, 2014

शुक्रिया तुम्हें..



जब तुम मेरे जीवन में आए
तुम बहुत सी बातें करते थे....लेकिन अधूरी 
बहुत कुछ कहना चाहते थे ... पर कहते नहीं थे
बात करते करते बीच में ही चुप हो जाते
और उन अर्थहीन बातों को बाद में मैं सोचती
पर कभी समझ नहीं पाती थी.. 
अधूरी थीं शायद इसलिए
अधूरे शब्द..अनकही बातें
अक्सर मानसिक उलझनें पैदा करती हैं
मेरे मन पर भी एक बोझ था
पत्नी होकर भी मैं अगर उनकी बातों को समझ नहीं पाऊं
तो शायद मैं असफल हूं।
और ये बोझ मैंने कई साल ढ़ोया भी.
समय के साथ चलते-चलते
हम एकदूसरे को संभालते रहे
इस रिश्ते को प्रेम और विश्वास से सींचते रहे 
और देखो.. अब इसपर फल आ रहे हैं
जो हमें कितना सुकून देते हैं
जैसा सुकून मुझे तब मिलता है जब 
तुम्हारे करने से पहले ही तुम्हारी शरारतों को भांप लेती हूँ
तुम्हारे कहने से पहले ही तुम्हारे शब्दों को पहचान लेती हूँ
तुम्हारी हर अधूरी बात को पूरा कर देती हूं
जब तुम कहते हो 'कैसे जान लेती हो मेरे मन की हर बात'
 मैं मन ही मन गर्वित हो जाती हूँ
जानते हो.. ये सुकून उन सभी सुखों से बढ़कर हैं
जो तुमने मुझे दिए 
खुद के असफल और अपूर्ण होने का बोझ अब
महसूस ही नहीं होता.. 

शुक्रिया तुम्हें.. 
मुझे पूर्ण करने के लिए।।

                                                            Happy Anniversary !

photo courtesy ~ Shruti Moghe Photography 

Monday, February 10, 2014

हम~तुम..साथ में


कभी गली के मोड़ से 
घर के टैरेस को ताकते
कभी तुझको खोजते
कभी खिड़की से झांकते 
आंखें पढ़ते हम~तुम..
साथ में

जागती रातें..
धड़कनें बढ़ाती 
वो अनछुई बातें    
शरमाते, घबराते फोन पर 
बतियाते हम~तुम..
साथ में

भीगी भीगी सी रात में
चांद के साथ में
हाथों में हाथ थे
बहके जज़्बातों में 
खोये थे हम~तुम..
साथ में

समंदर के किनारे
सीली सी रेत पर बैठे
सपनों का घर बनाते
कल को सजाते हम~तुम.. 
साथ में 

मुशकिल डगर है 
लम्बा सफर है 
पथरीले रस्ते
मगर हंसते हंसते 
पाएंगे मंज़िल हम~तुम..
साथ में

                                                               चित्र -गूगल से साभार

Sunday, February 9, 2014

बहुत ख़ास हैं ये...


                    आज 'तारे ज़मीन पर' एक बार फिर से देखी.. इस बार पहले से भी ज़्यादा अच्छी लगी। पता नहीं क्यों..शायद बीते 6 सालों में जीवन कुछ ज़्यादा ही संजीदा हो गया...इतना कुछ दिखा दिया है, कि शायद दिल पहले से ज़्यादा भावुक हो गया है.. बच्चों को देखने समझने का तरीक़ा बदल गया है। दिल को मज़बूत तो बहुत बनाया था पर आज बहुत सालों से जो थाम कर रखे थे वो आंसू रुक न सके...समझने वाले हों तो ये फिल्म कितना कुछ समझाती है।
                    अपने बच्चों को तो सब प्यार करते हैं.. समझते हैं..सारे प्रयास करते हैं उन्हें हर अच्छे से अच्छी सुविधा उपलब्ध कराने की। बहुत तो ऐसे भी हैं जो बच्चों के मांगने से पहले ही उनकी हर ज़रूरत को पूरा कर देते हैं। माता-पिता अपने कर्तव्य निभाते है और बच्चे अपने। और जीवन ऐसे ही हंसी खुशी चलता रहता है। बड़ी नॉर्मल सी है ये जिन्दगी...पर नॉर्मल दुनिया में कहीं न कहीं कुछ अबनॉर्मल भी होता है। बहुत सारे बच्चों में कुछ ऐसे भी हैं जो बाकियों से अलग हैं..सबकी तरह आसान सा जीवन नहीं होता उनका..रोज़ाना न जाने कितनी बार उनको प्रयास करना पड़ता है खुद को साबित करने के लिए...और जब असफल हो जाते हैं तो खुद पर कितना गुस्सा आता कि वो सबकी तरह क्यों नहीं हैं..कुछ उस गुस्से को दबाते हैं तो कुछ आक्रामक तरीके से व्यवहार करते हैं...कुछ तो अपने दिल की बात को कह भी नहीं पाते। हर बच्चा प्यारा होता है..शरारतें करता है अपने मन की हर इच्छा अपने माता-पिता से बताता है.. उसकी ज़िद..उसकी शरारतें..उसकी हर चीज़ माता पिता को अच्छी लगती है..पर ये बच्चे जो औरों से अलग होते हैं उनके जीवन में नार्मल कुछ नहीं होता..उनकी ज़रूरतें चॉकलेट्स और महंगे खिलौने नहीं होते..शायद वो इन सबकी इच्छा  भी न करते हों..उनकी अपनी ही दुनिया है जिसका हर क्षण चुनौतियों से भरा होता है। उपने मन के भाव वो बता नहीं पाते..इच्छाएं अपनों के सामने रख नहीं पाते..जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं वो तो मन का खेल भी नहीं पाते। औरों के लिए जहां बचपन मासूमियत से भरा होता है.. इनके जीवन में उसकी जगह धैर्य, संयम और चुनौतियों ने ले ली है। वो सबसे अच्छे..सबसे बेहतर होने के लिए नहीं लड़ते(जैसे बाकी बच्चे करते हैं).. उनके लिए मेन स्ट्रीम में आना ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। सोचकर देखने भर से अंदाज़ा होजाएगा कि कितना कठिन जीवन जीते हैं कुछ बच्चे। इन बच्चों के ऐसा होने में खुद इनका कोई क़ुसूर नहीं होता, फिर भी उम्र भर इसकी सज़ा भोगते
रहते हैं। इनके माता-पिता अगर सजग हैं तो इन्हीं की तरह वो भी हर जगह प्रयास करते हैं अपने बच्चे को उस मेनस्ट्रीम में लाने का..उनका जीवन भी अब नॉर्मल नहीं रहता। कितनी ही परेशानियां उन्हें भी झेलनी पड़ती हैं। इस सच को वो तो अपना लेते हैं क्योंकि वो माता-पिता हैं पर कोई दूसरा इसे समझ नहीं पाता। उनके लिए वो कौतुहल का विषय है..थोडी सी हमदर्दी.. इससे ज़्यादा कुछ भी नहीं। ज़्यादातर कुछ समझदार लोग अपने अच्छे बच्चों को उनके पास न जाने की हिदायतें भी देते हैं और मन में चाहते भी यही हैं कि वो बच्चे उनके बच्चों के पास न आयें। अब इन बच्चों के माता-पिता जब स्कूलों में इनके दाखिले के लिए जाते हैं, तो हर जगह एक ही जवाब पाते हैं..'ऐसे बच्चों के लिए तो स्पेशल स्कूल होते हैं, आपको वहां जाना चाहिए'।  स्कूल के प्रिंसिपल भी नहीं चाहते कि उनके स्कूल में ऐसा कोई भी बच्चा आए.. जबकि देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है। बच्चे को सिर्फ देखकर क्या उसके सामर्थ्य का आंकलन करना सही है..उसकी क़ाबिलियत उसकी अक्षमताओं के पीछे छिपी ही रह जाती है। आखों में आंसू लिए मां-बाप लौट आते हैं और ईश्वर से एक ही सवाल करते हैं कि मेरे ही बच्चे के साथ ऐसा क्यूं ? ये भेद भाव ही उन्हें हमसे अलग करता है..सोच हमारी नार्मल नहीं है..तो अबनार्मल बच्चा कैसे हुआ ?
            ये भी अच्छा है कि समाज में सभी एक जैसे नहीं होते, बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो वास्तव में इन बच्चों के लिए बहुत कुछ करते हैं। कुछ पेशे से तो कुछ दिल से। बहुत सारे स्कूल चलाये जा रहे हैं इन बच्चों को शिक्षित करने के लिए। जिससे उनके अंदर छिपी हुई क़ाबिलीयत बाहर आ सके और उनके हौसले बढ सकें।
            आज ये सब लिखने आ आशय सिर्फ इतना सा था कि सिर्फ हमदर्दी दिखाकर कोई शुभचिंतक नहीं बन जाता। अगर इन बच्चों के लिए कुछ करना है तो ज़रूरत है कि हम अपनी सोच को बदलें..उनके प्रति नॉर्मल बिहेव करें..उन्हें अजूबा न मानकर उन्हें भी एक साधारण बालक समझें। उनके मन को पढ़ने का प्रयास करें। उनकी अपेक्षा न करके उनका साथ दें...जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े और वो खुद को साबित कर पायें...कि औरों से कुछ कम हैं तो क्या हुआ हौसले सबसे ज़्यादा हैं..कुछ कमी है तो भी अपने प्रयासों से उससे उबर सकते हैं...जो ठीक हो जायें तो सबको पछाड़ भी सकते हैं।
ये बच्चे भी सभी की तरह इस दुनिया में आये हैं लेकिन कुछ कमियों के साथ.. जिन्हें स्वीकार करने में किसी को असहज महसूस नहीं करना चाहिए और उन्हें भी अपनी कमी का अहसास न कराया जाये तो ही बेहतर होगा। यही योगदान शायद एक नॉर्मल इंसान दे पाये तो इन बच्चों को बेहतर भविष्य मिल सके, एक नई राह मिल सके..अपना खुद का आसमान खुद की ज़मीं मिल सके। सच.. मासूम हैं ये..ईश्वर के भेजे हुए.. बहुत ख़ास हैं ये...।

                                                                                                                 चित्र गूगल से साभार

Tuesday, February 4, 2014

शुभरंग बसंती..

This is the 100th post of my blog. Obviously very special to me and 
I am dedicating it to the love of my life...Sunil !


पहले ये रंग इतना खूबसूरत न था 
पर जीवन के कितने सच समाए हैं इस रंग में
जिन रंगों से मेरे जीवन में खुशियां हैं
उनमें सबसे गहरा है ये रंग
ये रंग मेरे जीवन में आया
उसे नया करने
शुभ लगन लिखकर एक शुभ दिन लाया
मेरे अपनों ने मुझपर ये रंग चढ़ाया 
अपना आंगन छोड़ने की तब इच्छा न थी
पर बाबुल ने मेरे हाथ इस रंग में रंगकर 
उनके हाथों में दे दिये 
और शुभारंभ हुआ एक नये जीवन का 
आज ही का तो दिन था वो
बसंतपंचमी..
और ये बसंती रंग ले आया 
मेरे जीवन में भी बसंत
खुशियों का ये रंग 
करता हर पल बसंती
नव, नवीन ये पावन रंग 
जीवन करता ये पावन बसंती 
अब छूटे न
पिया का आंगन बसंती
जिसमें रम गया ये जीवन बसंती
रंग गई मैं भी बसंती
रंग गये पिया बसंती
कितना खूबसूरत है न ये 
शुभ रंग.. 
बसंती..

                          photo courtesy:~Chintu Pathak photography, google images


Saturday, February 1, 2014

कुछ लोग बहुत याद आते हैं..


तुम्हारे चेहरे पर तुम्हारी पूरी कहानी दिखती है
चेहरे की सिलवटों में छिपे हैं संघर्ष तुम्हारे
आखें बयां करती हैं परिश्रम तुम्हारे
तुम्हारे बालों की सफेदी में 
तुम्हारे अनुभवों की चमक दिखती है
तुम्हारी आखों में झांककर देखा नहीं किसी ने
इनमें जीने की एक छोटी सी ललक दिखती है
हमारे बुजुर्ग कितना कुछ सिखाते हैं हमें
परंपरा और संस्कार बताते हैं हमें
सीख इनकी हमेशा रखना ज़हन में
उम्र भर कहां ये साथ निभाते है
सहेज कर रख ली हैं तुम्हारी भी यादें
कुछ लोग बहुत याद आते हैं..

 photo courtesy : Nishant Kashyap Photography

Thursday, January 30, 2014

मैं हूं न तेरे संग..


जाने क्या बात है..
क्यों परेशां हो 
जब साथ है
क्यों लगा कि मुशकिलें 
मिलेंगी राह में
मैं हूं न तेरे संग
हर पल... हर हाल में
ये संग ही हमारा 
हौसला है दिलबर
देता है खुशियां
और जीने की हिम्मत 
ये संग तेरा 
ये संग मेरा
बढ़ाता है जीवन
रोज़ 
थोड़ा..थोड़ा



Thursday, January 23, 2014

उलझन सुलझा दो न..


कहा था तुमने मुझसे कभी
''तुम बिन जी न पाएंगे
तुम ही जीवन हो  
तुम बिन हम..
बस मर जाएंगे"
आज उलझन में हूं
 तुम ही सुलझा दो ना.. 
हर बात पर चुप हो जाने वाले, 
मेरे एक सवाल का जवाब दो ना..
क्यों नमी मेरी आंखों से गुम नहीं होती  
मुझको अपनी ज़िन्दगी कहने वाले
     क्यों आज तुझे ज़िन्दगी महसूस नहीं होती..?

Tuesday, January 14, 2014

तुमने हमको जीना सिखाया..


एक दिन खुशी मांगी थी रब से 
और तुमने खुद को हमें सौंप दिया
उस देने वाले ने ये अन्तहीन सुख 
सिर्फ हमें भेंट किया..

हम तो इस लायक न थे कि 
जीवन को समझ पाते
तुम ही ने हमें इस क़ाबिल बनाया 
कि आज हम ज़िन्दगी के मायने सीख गये..

हमने अपनी कमियां देखीं
उन्हें दूर करने का हौसला तुमने दिया
हमने अपनी कमज़ोरियां देखीं
उन्हें हिम्मतों में बदलने का जज़्बा तुमने दिया

हम तो अल्हड़ थे..ज़िम्मेदारियों से परे
ज़िम्मेदारियां उठाना तुमने सिखाया
अब तक तो सीखते आ रहे थे 
पर सिखाने का हुनर भी तो तुमने सिखाया

कभी तुमने हंसाया, कभी तुमने रुलाया
तुम्हारा ह़क है हमपर जो तुमने जताया
हम परेशान हुए तो, तुम ही ने गले से भी लगाया
अपने हौसलों से तुमने, हमको जीना सिखाया ।।


                                                     wishing you happiness unlimited... 
                                                                          happy birth day son !!

Tuesday, January 7, 2014

पूस की एक रात..


पूस की एक रात..
चांद को निहारते
महसूस की  
धीमी सी हलचल..
बादलों ने रंग बदला
काली घटाओं ने चांदनी को घेरा
रौशन जहां धुंधला गया
शांत से माहौल में यकायक
मेघगर्जना हुई
एक बूंद गालों पर पड़ी
एक बूंद आंखों से गिरी
और फिर तेरी यादों की   
झड़ी सी लग गई
तेरी यादें थीं सीली-सीली सी
भीगी देह और 
भीग गया अंतर्मन भी
तेरे न होकर भी 
तेरे होने को महसूस किया
उसी पल तेरा हाथ थाम के  
एक बार फिर
तनहा ही गुज़ार दी
पूस की एक रात..