Wednesday, December 25, 2013

हम फिर साथ होंगे..


कई बार आवाज़ दी होगी मुझको,
मैं फिर भी न आई होंगी,
उसी वक़्त वो बह आये होंगे,
जिन्हें कितना सहेज कर रखते हो तुम..

वो जिनको हथेलियों में छुपाने का मन करता है,
उसकी नमी से दिल अपना भिगोने का मन करता है,
वो आ जायें तो आंखें सुर्ख हो जाती हैं तुम्हारी..

तनहाइयों में कई बार छुपा लिए होंगे,
मुझे याद करके न जाने कितने खो दिये होंगे,
वो जो स़बसे अज़ीज़ हैं मुझको,
     जिन्हें देखकर मेरी बेचैनियां बढ़ जाती हैं..

तुमने भी जिन्हें बार-बार संभाला होगा,
रोकना चाहा होगा बहुत, फिर भी वो बह आये होंगे,
कितने तनहा थे तुम, इस बात की गवाहीं देंगे,
घर के तकियों पर भी वो दिखाई देंगे..

हां बहुत अज़ीज़ हैं मुझको...जो तुमसे बिखर गये हैं
ये अनमोल मोती...तेरी मेरी यादों के 
हम मिलकर समेट लेंगे 
अब और सुर्ख न करना मेरे आइने को
हम फिर साथ होंगे..हम फिर साथ होंगे..
                                                                                                       Missing you..hubby!
                                                                                                

Tuesday, December 24, 2013

उलझी ऊन..



ऊन ले आई थी एक दिन
सोचा कि समय मिलते ही इसे व्यवस्थित करूंगी..
पर ध्यान नहीं दिया 
और रखे-रखे ऊन की डोरियां आपस में उलझने लगीं
जब समय मिला तो पाया 
कि अब बहुत देर हो गई
शायद ये ऊन अब सुलझ नहीं पायेगी मुझसे
उलझनें सुलझाने का प्रयास कर रही हूं
एक ठीक होती है तो दूसरी उलझ जाती है
कैसा अजीब सा ताना बाना बन गया है
इन उलझनों में मैं खुद ही उलझ जाती हूं
हल्के से खुद को बचाती हूं, फिर जुट जाती हूं 
कुछ उलझनें सुलझती तो हैं 
पर जगह-जगह गांठें पड़ जाती हैं
गांठें खोल रही हूं...
कुछ खुल गई हैं,
कुछ बाक़ी हैं,
थोड़ा मुशकिल है..असंभव नहीं..
जीवन भी तो ऐसा ही है न 
कभी कभी उलझी सी ऊन जैसा..
पर यकीनन 
बहुत सुखद है..
जीवन की उलझनों को सुलझा लेना
रिश्तों में पड़ी गांठों को 
खोल लेना..

Monday, December 16, 2013

चुप हूं जब तक.. चुप हूं....



चुप हूं जब तक 
चुप हूं..
बेज़बान समझने की अब
कोशिश न करना

क्रोध की अग्नि जली
आग बहुत है भीतर भरी
अब और उलझने की 
कोशिश न करना

जल जाओगे एक दिन
खुद ही के गुनाहों में
मुझको ग़लत समझने की अब
कोशिश न करना

मेरी नियति में नहीं है
गिरना और बिखर जाना
कांच का टुकड़ा समझने की अब 
कोशिश न करना

चेहरे की मुस्कान 
निश्छल है हमारी
पर नादान समझने की अब
कोशिश न करना

मन में भाव कोमल हैं
नाज़ुक ही बदन मेरा
पर फूल सा मसलने की अब
कोशिश न करना

सह लिया बहुत तुमको 
और तुम्हारे ज़ुल्मों को 
एक और निर्भया बनाने की अब
कोशिश न करना

चुप हूं जब तक 
चुप हूं..

Saturday, December 14, 2013

कल रात बहुत याद आए तुम..



कल रात बहुत याद आए तुम..
सर्द रात में ठण्डी हवा का झोंका बन..
मेरी राहतों का खलल बन..चले आये तुम।
मेरी तनहाइयां तेरी यादों से महकती रहीं,
क़तरा-क़तरा कर रूह में उतर आये तुम।

तेरी यादों के शहर में जाके हम,  
तेरी गोद में सर रख के सोने की ज़िद करते रहे
शिकवे-शिकायतें करते-करते, सिसकियां हज़ार भरते रहे।

तुम प्यारी सी मुस्कान लिए, मेरी सारी बातें सुनते रहे..
बालों में हाथ फेरकर, दर्द मेरे सोखते रहे,
मासूम सी नींद देके मुझे, एक बच्चा सा मुझमें खोजते रहे।

मैं चुप हो गयी कह कर..सिसकियां रुक गईं थक कर
फिर आंखें खोलने की ज़हमत न की मैंने,
और तुमने भी तो नहीं जगाया मुझको,
आंखें खोलीं तो बहुत ढूंढा तुमको,
फिर आंख का आंसू बन.. बह आये तुम
उफ्फ...कल रात बहुत याद आए तुम..!!

Sunday, December 8, 2013

क्योंकि गहनों का मुझे शौक नहीं...

कितने ही गहने हैं पास..पर और चाहिए...
ऐसा कभी चाहा नहीं..
क्योंकि गहनों का मुझे शौक नहीं... 
शायद प्यार है..जो धीरे-धीरे संचित हो रहा है
बचपन में नानी ने दी थीं मुझे सोने की बालियां
फिर मां पापा का प्यार जो अकसर बरसता था
कभी कानों के बुंदों में, पांव की पायल में,
तो कभी गले की चेन में,
और शादी पर तो भावनाओं का सैलाब ही आ गया
कितने सारे रिश्तेदारों का प्यार मिला
सास-ससुर ने भी प्यार देने में कोई कमी न रखी
पति ने भी प्यार जताने के लिए गहने दिलवाये
सुर्ख सोने की चमक से सूरत तो दमकी
सुनहरी रौशनी इसकी..पर आंखें न चमकीं
क्योंकि गहनों का मुझे शौक नहीं...
क्योंकि अकसर सोच में पड़ जाती हूं मैं 
कि ये वाकई प्यार है..या कुछ और
समाज में प्रतिष्ठा दिलाने का महंगा सा सामान
या फिर प्रभाव जमाने का सस्ता सा साधन
क्योंकि सोना प्यारा है अगर र्निमल भावों में गढ़ा हो
क्योंकि सोना क़ीमती है अगर किसी ईमानदार का तोहफ़ा हो
क्योंकि सोना सुन्दर है अगर सिर्फ सौन्दर्य बढ़ाये
क्योंकि सोना बहुत महंगा है.. अगर दिमाग पर चढ़ जाये
क्योंकि गहनों का मुझे शौक नहीं... 
इसीलिए बस...प्यार सहेज रही हूं...सोना नहीं !

Saturday, December 7, 2013

वो बिखरी पंखुड़ियां और...एक सोच


आज शाम अपने घर की छत पर बेटे के साथ टहल रही थी...बहुत सारे गमले फूलों से सजे थे...रंग बिरंगे फूलों को देखकर मेरा बेटा बहुत उत्साहित था। अचानक उसकी निगाह एक गुलाब पर पड़ी..जो मुरझाने की कगार पर था, उसकी कुछ पंखुड़ियां झड़ कर नीचे गिर गयी थीं और फूल पर दो चार ही बाकी थीं। उसने तुरंत वो सारी पंखुड़ियां इकट्ठा कीं और मुझे दे दीं...और मुझे इशारा कर कहने लगा कि इन्हें वापस उस फूल से जोड़ दो ...फिर से फूल बना दो..मैंने उसे समझाया कि अब ये संभव नहीं है, तो वो खुद प्रयास करने लगा। मेरे लाख समझाने पर भी वो कोशिश करता रहा उन पंखुड़ियों को उस फूल से जोड़ने की...और अंत में हार मान गया। मैं उसकी समझ और नासमझी को एक साथ देख रही थी.. और उसकी आंखों में तैरते उन अनगिनत सवालों को भी...जिनके जवाब मैं चाहकर भी उसे दे न सकी। एक कोमल मन, जो एक फूल को भी बिखरा नहीं देख सकता..मैं उसे सृष्टि के नियम समझा न सकी..आदि और अंत के बारे में बता न सकी..उसकी सकारात्मक सोच और कोशिशों के आगे मैं हार गयी...और मैं खुद ये सोचने लगी कि अगर इरादे बुलंद हों तो बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो बिखरने के बाद भी जोड़ी जा सकती हैं...दुनिया के सही ग़लत समझने के लिए मेरा बेटा अभी छोटा सही..पर हां उसकी सोच ने मुझे और मेरे मन को आज गर्व और सुकून से भर दिया।

चित्र: गूगल से साभार

Wednesday, December 4, 2013

Cell का मायाजाल..


तेरा मेरा हम सबका cell phone is कचरे का डब्बा,
पीटो मारो उड़ा दो उसको जिसने बनाया इसे हायो रब्बा।

जितने advantages हैं उससे ज़्यादा तो इसके नुकसान हैं
Cell के मोह जाल में deep तक फंस चुका अब इंसान है।

चलो cell बनाया तो बनाया
but ये sms pack क्यों Invent किया,
Youth ने तो खुद को fully इसपे depend किया।

कभी कभी तो लग जाती है झड़ी sms की,
और कभी एक beep सुनने को कान तरस जाते हैं,
Sms addiction  से अब बड़े-बूढ़े भी न बच पाते हैं।

हर month pack डलवा डलवा के हमने कितना पैसा बर्बाद किया,
Typing कर कर के अपने nails and fingers को ख़राब किया।

कितनी misunderstandings.. कितने झगड़ों का ये औज़ार है,
Time waste करने का तो ये prime हथियार है।

पर love birds के लिए तो ये एक blessing है,
Sms कर कर के हो जाती कितनों की setting है।

और तो और मेरी तो poems भी cell में ही type की जाती है,
pen से टूटा नाता अब तो cell  में ही diary नज़र आती है।
समय की गति कैसी होती है इसके बारे में सबकी अपनी अलग राय है। 
पर मेरी समझ से तो समय के पंख होते हैं..फुर्र से उड़ जाता है...
आज भी समय ने अहसास कराया कि वो कितनी जल्दी कितनी लम्बी दूरी तय कर लेता है..
मेरी सबसे छोटी बहन जिसे हम अभी तक बहुत छोटा समझते थे, अचानक बड़ी सी लगने लगी।
कोर्स की किताबों में उसे हमेशा व्यस्त देखा था, कभी उसने नहीं बताया कि वो लिखती भी है...
मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं थी जब मैंने उसकी डायरी पढ़ी.. 
न जाने कब से लिख रही थी अपनी डायरी,
मैंने उसे मेरे ब्लॉग पर लिखने को कहा है... कभी-कभी वो भी अपने ख़याल सबसे साझा करेगी। 
जो स्नेह मुझे मिला उसे भी मिले...ऐसी आशा है।