Wednesday, October 30, 2013

मुझे सताने के तरीक़े..




मुझे सताने के तरीक़े
तुम्हें अच्छे से आते हैं..
मैं जानकर नाराज़ होती हूं तुमसे 
और तुम जानकर 
मनाते नहीं मुझको

कभी-कभी की बात न रही अब ये
हर रोज़ अनजाने बन जाते हो तुम
रोज़ाना तेरी आंखों में प्यार खोजती हूं
रोज़ाना मेरी आंखों से बह जाते हो तुम

तेरी बेरुखी से बढ़कर
कोई सज़ा न होगी मेरे लिए
खुद ब खुद मर जाऊंगी एक दिन
दो चार बार और
बस मुंह फेर लेना मुझसे..


Sunday, October 13, 2013

विजयदशमी


किसी की जीत किसी की हार बन गई।
वो विजय आज त्यौहार बन गई,
मुझे भी लड़ना है, 
और जीतना है, 
मेरे अंदर के रावण से 
बाहर के अनेकों रावणों पर विजय पानी है,
मुझे भी विजयदशमी मनानी है।

Saturday, October 12, 2013

तुम बिन अधूरी हूं..


कितना भी दूर रहूं उससे 
वो अपने होने का अहसास कुछ इस तरह करा देता है 
मानो उसके बिना जीना मेरे लिए संभव नहीं
अपने रक्त में घुला महसूस करती थी जिसे 
उससे दूर होने की कल्पना भी न की थी कभी 
फिर भी खुद से दूर कर देना चाहती थी मैं
पर देखो न..
कितना खिंचाव है इन सात सुरों की सरगम में
साज और आवाज़ के मधुर मिलन में
ताल की गमक और अलफाज़ की रूमानियत में
रोम-रोम को आनंदित करते इस संगीत में 
कि मेरे अस्तित्व पर ही कब्ज़ा किये बैठे हैं
ये न हो तो मैं खुद जैसी नहीं लगती मुझको
लोग पहचान नहीं पाते इनके बगैर मुझको
और ये संगीत ..
रूह जैसे खींचता रहता हो अपनी तरफ
अजीब सा खिंचाव है जो 
जीवन में होकर भी मुझे गुम कर देता है 
और न होकर मुझे रिक्त 
इस कदर घुल गया है मुझमें कि 
अब आंखों से आंसू बनकर बहता है।
हां मान लेती हूं कि तुम जीत गये मुझसे 
और हार गयी मैं खुद से..
अब तुम ही हो 
जो मुझे सुकून दे पाओगे
तुम बिन अधूरी हूं..
तुम ही पूर्ण कर पाओगे।

Wednesday, October 9, 2013

क्यों संवेदनाक्षीण हो गई मैं..?


तब कुछ भी नहीं होता जब अहसास नहीं होता, 
और जब अहसास हो जाता है तो 
कभी पीड़ा देता है
तो कभी मन ग्लानि से भर देता है..
मुझे भी हुआ आज अहसास और
अपने किये पर पछतावा..
उपवास के ये नौ दिन
घर में बनते हैं दो प्रकार के भोजन 
फलाहार और साधारण भोजन
और ढ़ेर सारे बर्तन उन्हें बनाने में प्रयुक्त होते
मेरी बाई ने कहा-
'भाभी मैं दिन भर घर-घर काम करती हूं 
शाम को पूजा-अर्चना के बाद 
सिर्फ एक ही बार कुछ खाती हूं
आप बर्तन थोड़े कम निकालने का प्रयास करो
मैं भी नवरात्रे कर रही हूं न..
आजकल थक जाती हूं'
सुनकर ही मन व्यथित हो उठा
और सिर्फ एक सवाल
क्यों संवेदनाक्षीण हो गई मैं
जो इतना भी न सोचा मैंने?

Tuesday, October 8, 2013

बहुत श्रद्धा है लोगों की देवी के प्रति


बहुत श्रद्धा है लोगों की देवी के प्रति
कितने प्रेम भाव से लगे रहते हैं दिन रात
उस मां को सजाने संवारने में..
फूल चुन चुनकर उसके चरणों में अर्पण करते हैं  
उसकी पूजा में कोई कमी भी नहीं रखना चाहते
कोई नौ दिन अन्न त्याग देता है
तो कोई मौन ग्रहण करता है
कुछ भी करके बस मां को प्रसन्न करना चाहते हैं।
न गरबा करते करते इनके पांव थकते हैं और 
न भजन-कीर्तन करते इनके गले में खराशें आती हैं
घर के मंदिर में विराजमान देवी मां
और बाहर पंडालों में सजी-धजी मां के प्रति 
प्रेम और श्रद्धा इन नौ दिनों में और भी उमड़ आती है
वहीं घर में बैठी एक जननी 'मैं' सोच रही हूं
क्यों इन लोगों को हर जगह मां नहीं दिखती
वो तो हर घर में विराजमान है
किसी की मां में, किसी की बेटी में 
किसी की बहन तो किसी की बहु में..
क्या हाथों में शस्त्र और सिंह की सवारी ही शक्ति का प्रतीक है
वो स्त्री जिसके हाथों में बेलन और तन पर सादे वस्त्र हैं
उसमें देवी क्यों नहीं ढूंढता कोई
उसके प्रति सम्मान में सर क्यों नहीं झुकाता कोई
क्यों देवी को पूजने वाली इस धरती पर 
औरत को शक्तिविहीन और भोगने की वस्तु समझा जाता है
क्यों हर रोज़ किसी बेटी के बलात्कार की खबर से अखबार सना रहता है..

बहुत श्रद्धा है लोगों की देवी के प्रति..


Friday, October 4, 2013

हां..सिर्फ अपने आप से मतलब रखूंगी


हां..सिर्फ अपने आप से मतलब रखूंगी
तुमको अब न सताऊंगी, 
तुम्हारी ज़िन्दगी तुम्हारी है..
ह़क अपना न कभी जताऊंगी।

नहीं देखूंगी तुम्हारे चेहरे की उदासी कभी
समझ के भी नासमझ सी बन जाऊंगी
जब खामोश भी रहोगे न तुम
कुछ भी कहने को न कह पाऊंगी।

जो खो जाओगे उलझनों के भंवर में तुम
हाथ तुम तक न अपना बढ़ाऊंगी
पुकार लेना मुझे चाहे कितनी दफ़ा
मैं चेहरे पर अपने शिकन न लाऊंगी

जब कुछ अच्छा न लगे तुमको कभी
मैं न गीत अपने गुनगुनाऊंगी
बातों से कभी अपनी न मन तुम्हारा बहलाऊंगी 
होंठ सी लूंगी अपने, बस..खामोश रह जाऊंगी 

तुम्हारी ज़िन्दगी तुम्हारी है..
ह़क अपना न कभी जताऊंगी।

जो खोज न पाओ मुझे कहीं भी अगर
एक नज़र देख लेना दिल में मगर
जो कोना वीरान सा दिखे अगर
समझ लेना मैं हूं खड़ी उधर
तेरे प्यार से बंधी हुई, 
मैं और कहां जा पाऊंगी
तेरी होकर जो तेरे साथ नहीं
तुझसे दूर मैं क्या जी पाऊंगी..

हां..सिर्फ अपने आप से मतलब रखूंगी
तुमको अब न सताऊंगी.. 

Wednesday, October 2, 2013

प्लास्टिक के फूल..



आज भी संभाल रखे हैं मैंने 
वो प्लास्टिक के फूल
जिन्हें देकर तुमने कहा था कभी
कि असली फूलों की उम्र ज़रा कम होती है
वो खुशबू तो देते हैं मगर
मुरझा कर बदरंग हो जाते हैं दो-चार दिन में..
ये प्लास्टिक के फूल कभी ख़राब न होंगे
खुशबू नहीं है इनमें लेकिन
हमेशा खिले रहेंगे..
उनकी पत्तियों पर तुमने नाम भी मेरा लिख डाला था
या यूं कहूं कि प्यार से एक गुलदस्ता सजाया था
हां आज भी खिले हुए हैं 
वो प्लास्टिक के फूल 
पर सोचती हूं...
.
.
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काश ! प्यार भी प्लास्टिक का बना होता..