Saturday, September 21, 2013

ये कैसा विसर्जन..?


        मन में कई सारे सवाल उठ रहे थे। बहुत असमंजस में थी कि क्या ये बात वाकई ब्लॉग जगत में पोस्ट करने लायक है। उसी उलझन में दो दिन ऐसे ही बीत गये, पर आज सोचा शायद लिखकर भारी मन कुछ हल्का हो जाये ।
        गणेशोत्सव बीत गया.. गणेश जी अगले बरस आने का वादा करके चले गये। और उनकी विदाई बहुत धूम धाम से होती है। गणपति विसर्जन कितने उत्साह से किया जाता है उससे सब अच्छी तरह से परिचित हैं। महाराष्ट्र और उससे सटे राज्यों में तो ये पर्व देखते ही बनता है। मेरा जन्म यूपी में हुआ और वहां गणेशोत्सव पर इतना उल्लास मैंने कभी नहीं देखा। इस साल पहली बार मुझे इस उत्सव का आनंद लेने का अवसर मिला.. मैं उत्साहित थी। यहां गली-गली में गणपति जी की स्थापना की जाती है। ढेर सारा धन उनकी सुन्दर और विशाल प्रतिमाओं के निर्माण में लगाया जाता है। साज-सज्जा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। बड़ी श्रद्धा से उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। ये दस दिन बड़े ही पवित्र होते हैं..घर में सुबह शाम भजन-आरती, घर क्या गली-मोहल्लों का माहौल एकदम बदल जाता है..हर तरफ श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई देती है। इन दिनों मोहल्ले किसी तीर्थ स्थल में तबदील हुए दिखाई देते हैं। ख़ैर विसर्जन पर जो कुछ मैंने देखा वो सबसे बांट रही हूं। हो सकता है मेरे शब्द किसी की भावनाओं को आहत कर दें, इसलिए पहले से क्षमाप्रार्थी हूं।
          गणेशजी को विसर्जन के लिए ले जाया जा रहा था। एक ट्राली सबसे आगे चल रही थी जिसपर तेज़ साउंड वाले स्पीकर और म्यूज़िक सिस्टम लगे हुए थे। बहरा कर देने वाली अतितीव्र ध्वनि उनके उत्साह के आगे मानों दबी जा रही थी... पर हां मेरे घर की कांच की खिड़कियों में कंपन ज़रूर था। इस ट्राली के पीछे ढेर सारे लोग नाचते हुए, एक दूसरे पर गुलाल डालते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे...और सबसे पीछे थी हमारे गणेश जी की ट्रॉली, जिसके आसपास कुछ बच्चे बैठे थे हाथों में भोग-प्रसाद लेकर जिसे वो सबको बांटते जा रहे थे। इसमें नया क्या है...यही तो होता है विसर्जन पर। पर एक बात जो मुझे कुछ चुभ रही थी, वो ये कि गणेश जी के विसर्जन पर कोई "गणपति बप्पा मोरया" नहीं बोल रहा... बल्कि सब गानों पर बेसुध होकर नाचने में लगे थे... और यहां पर में उन विशेष गानों का ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगी। एक-एक गाना जैसे चुन-चुनकर बजाया जा रहा था... जितने संभव आइटम नंबर हो सकते हैं सारे ही गणेश जी के सामने प्रस्तुत थे...मुन्नी बदनाम हुई...पिंकी तो है दिलवालों की... घाघरा... चोली और पता नहीं क्या क्या। ऐसे मौके पर ये गाने फूहड़ और अश्लील लग रहे थे। यहां तक कि जो लोग नाच रहे थे ..वो नशे में थे... और शराब के नशे में वो जो हरकतें कर रहे थे वो शर्मिंदा कर देने वाली थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बारात जा रही हो.. । ये हालात सिर्फ एक जगह नहीं बल्कि हर दूसरी टोली के थे। एक टोली में तो लड़के कपड़े उतारकर नाच रहे थे। कुछ लड़कियां भी थीं वहां, पर वो जिस तरह खुद को संभाल कर चल रही थीं..उससे साफ पता चल रहा था कि वो असहज थीं।
         मेरे मन में यही विचार आया कि क्या ये वही गणपति विसर्जन है जिसके लिए मैं इतनी उत्साहित थी .. पहली बार जो दृश्य मैंने देखे वो मेरा उत्साह भंग करने के लिए काफी थे। मन तो पहले से ही खिन्न था और दोपहर को रही सही कसर एक खबर ने पूरी कर दी.. मुंबई में गणेश विसर्जन के दौरान एक लड़की के साथ बदसलूकी...यकीनन मैं बहुत आहत हूं (http://timesofindia.indiatimes.com/videos/news/Woman-molested-at-Lalbaugcha-Rajas-visarjan-procession/videoshow/22807295.cms?utm_source=facebook.com&utm_medium=referral)

        अब मन में एक ही सवाल ... क्या मज़ाक है विसर्जन? कैसी होती जा रही है ये आज की पीढी.. जो भक्ति में भी मस्ती करने से पीछे नहीं हटती। धार्मिक भावनाओं का मज़ाक बन गया ये विसर्जन। लड़कियों पर छींटाकशी तो आम बात है, पर उनसे छेड़छाड़ और अश्लील हरकतें करना अशोभनीय, निंदनीय है। भीड़भाड़ का सहारा लेकर अपने गंदे उद्देश्यों को अंजाम देना आजकल के कुछ लड़कों के लिए संतुष्टि का एक बहुत सस्ता सा तरीका है। जिसे वो लोग बड़े ही गर्व के साथ करते हैं।
     
        सोचती हूं कि शायद स्वयं गणपति जी भी ये सोचने पर मजबूर हो जाते होंगे कि अगले बरस भी जब यही सब देखना होगा..तो पृथ्वी पर जाऊं कि नहीं.. पर वो तो ईश्वर हैं.. मनुष्य नीचता के चरम पर ही क्यों न पहुंच जाये ...पर गणपति उनकी बुराइयों और दिल के मैल को अपने साथ लेकर पानी में लीन हो ही जाते हैं...और मनुष्य फिर वहीं का वहीं...

Friday, September 13, 2013

नौकरी...


किसी की रोजी तो किसी की रोटी है नौकरी
कोशिशें हज़ार करके भी नहीं मिलती नौकरी
किस्मत में नहीं..तो कहीं किस्मत चमकाती है नौकरी
किसी का गौरव है ऊंचे औहदे की नौकरी
तो किसी भूखे बच्चे के हाथों की रोटी है नौकरी
पैसे वालों को भले भाती नहीं ये नौकरी
छोटी-बड़ी.. कैसी भी.. पर मिले तो ये नौकरी
हज़ारों की भीड़ से किसी एक को मिलती है नौकरी
मिन्नतें किसी की, किसी की शिक्षा का फल है नौकरी
किसी के लिए आज़ादी होती है नौकरी
एक परिवार का भविष्य होती है नौकरी
मिल जाये तो छोड़ी न जाये नौकरी
पर जब अहम टकरायें, तो काहे की नौकरी
क्या औरत और मर्द की क़ाबिलियत में फ़र्क करती है नौकरी
नौकरी छूट जाये तो क्या दर्द में फ़र्क करती है नौकरी
फिर क्यों बहुओं की छुड़वाई जाती है नौकरी..
कोई क्यों समझता नहीं है मुझे..
मैं औरत हूं तो क्या.. मेहनत से मैंने भी कमाई थी नौकरी 
मुझे भी बहुत प्यारी थी ये नौकरी 
मेरे बाबा की मेहनत...मेरी मां का ख्वाब थी ये नौकरी ।


Monday, September 9, 2013

अम्मा.. !


कई बार अहसास होता है कि 
मेरे पास कहीं..तुम हो
दोपहर की चिलचिलाती धूप में
चेहरे से जब ठंड़ी हवा छू जाती है
तो लगता है...तुम साथ हो कहीं
यूं ही कई बार तुम्हें अपने आस-पास महसूस किया मैंने..
पर क्या ये वाकई तुम हो.. या फिर तुम्हारे साथ न होने का अहसास है..
जो कहीं न कहीं मुझे बता जाता है कि 
तुम होतीं..तो ये होता..तुम होतीं तो कुछ और भी अच्छा हो सकता था
हां वाकई...
तुम जो थीं वो कोई और नहीं हो सकता था
तुमने जो संभाला कोई और संभाल नहीं सकता था
तुम मेरे घर की नींव थीं... 
अब तुम नहीं तो वो घर घर नहीं लगता
दीवारें हैं खड़ी बस..खण्डहर नहीं लगता
तुम नहीं तो 'अम्मा' कुछ अच्छा नहीं लगता..


                                                                On the 2nd death anniversary of 
                                                                dadi 'Amma'

Saturday, September 7, 2013

मुझे मेरा स्पेस चाहिये !


अतीत की किताब के कुछ पन्ने आज उलटने बैठी हूं
छोटी-छोटी कितनी ही बातों पे तुम मुझ पर निर्भर रहते
'सुनो ज़रा पानी देना... सुनो ये काम कर देना'
'मेरा मोबाइल तो चार्जिंग पर लगा दो प्लीज़'
'यार वो पेपर ढूंढ़ दो न प्लीज़...'
'जब देखो कुछ न कुछ करती रहती हो...मैं जब घर आऊं तब कुछ न किया करो
मेरे पास बैठो...मुझसे बात करो... फालतू के काम मत करो न..'।
मेरे वक़्त पर भी तुम हक़ जताकर बैठे थे... 
मुझे मेरे लिये सिर्फ उतना ही समय मिलता जब तक तुम बाहर रहा करते...
और उस समय को मैं बड़ी ही किफ़ायत से खर्च करती।
कभी-कभी खीज होती.. और चिल्ला कर कह देती थी मैं... मुझे 'मेरा' समय चाहिये... 
थोड़ा सा स्पेस दे दो प्लीज़। 
अरे ये क्या... आंखों की नमी बढ़ क्यों गई... 
क्यों आज इतनी पुरानी बातें सोचने लगी
क्यों आज से पहले बीता वक़्त याद नहीं आया...
.
.
.
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अब स्पेस मिल गया है...
जिसमें गुमी मैं... खुद ही को खोज रही हूं ।



Monday, September 2, 2013

कहां हो तुम...?


कहां हो तुम...?
ये तुम.. जो मेरे सामने हो
या कि वो.. जो बसा है मेरे मन के एक कोने में..
जिसने सुनहरे पलों को थामे रखा है अपने हाथों में ...
फूल की कोमल पंखुड़ियों की तरह।
वही पल जिन्हें साथ मिलकर जोड़ा था
वही पल जिसका हर रंग प्रेम से भीगा था  
सुखद, सुंदर वो गुलाबी पल..

ये तुम जो मेरे सामने हो..बड़े ही मतलबी से लगते हो 
चेहरा तो जाना पहचाना सा है..पर अजनबी से लगते हो।
मेरे कांधे.. तेरे हाथों की गर्मी को तरसते हैं
और आंसू.. तेरे हाथों की नर्मी का इन्तज़ार करते हैं

कई बार कोशिश की
के खेंच कर बाहर ले आऊं तुम्हें.. मन के उस कोने से
पर मेरी कोशिशें नाकाम थीं..तेरी व्यस्तताएं अब आम थीं..

काश के तुम.. वही तुम बन जाओ
मन के कोने से निकलकर सामने आ जाओ
और वो पंखुडियां जो तुमने संभाल रखी हैं
मेरे व्याकुल से मन पर बिखेर जाओ
फिर से तुम.. तुम बन जाओ !