Thursday, August 15, 2013

कैसे कह दूं कि.. मेरा देश महान !



भूख और बेरोज़गारी चौराहों पर रोज़ खड़ी मिलती है,
फबतियां कसती तो कहीं चैन खिंचती दिखती है,
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..

देश को मां कहने वाले, बेटियां पैदा होने पर डरते हैं..
क्योंकि बेटियां बेआबरू कर कहीं भी फेंक दी जाती हैं
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..

खून से लिपटे हाथ कानून के पानी से अकसर धुल जाते हैं
न्याय का इंतज़ार तकते, आंखें अकसर बंद हो जाया करती हैं
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..

देश की हिफाज़त करते सिपाहियों के सर नहीं मिलते
सच्चे अफ़सरों की ईमानदारी यहां मज़ाक बन जाती है
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..

देश चलाने वाले जब अपनी जेबें भरते हैं
देश में रहनेवाले तब महंगाई के आंसू रोते हैं
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..

बेईमानी और भ्रष्टता जब हाहाकार मचाती है
बच्चों के खाने में कीड़े पड़ जाया करते हैं
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..  




Monday, August 12, 2013

सब ठीक है ?



        कुछ सवालों के जवाब जानते हुए भी हम अकसर पूछते ही हैं, और जब वही जवाब सुनने मिलता है तो कितनी खीज होती है न ..जैसे अपने मां-बाप का हाल जानने के लिए जब फोन लगाओ तो पहले से ही पता होता है कि वो जवाब क्या देंगे..यहां सब ठीक है बेटा..तुम सुनाओ...तुम कैसे हो? 
        ऐसे कह देते हैं सब ठीक है..जैसे दुनिया के सबसे सुखी व्यक्ति से बात हो रही हो।
कभी कभी सोचती हूं कि कैसे ठीक रहते होते होंगे वो मां-बाप जिनके बच्चे उनके पास नहीं होते।
और आजकल तो ज़्यादातर मां-बाप चाहे वो लड़की के हों या फिर लड़के के, अकेले ही दिखते हैं। लड़कियां ब्याह करके दूर होती हैं तो लड़के पढ़ाई और फिर नौकरी के चलते। और मां-बाप अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के सपने संजोये... बस उनके फोन और उनके आने के इंतज़ार में जीवन बिता देते हैं। वो एक फोन उनके लिए कितना महत्वपूर्ण होता है.. कभी किसी ने सोचा है? एक दिन अगर फोन न कर सके तो मां के दिल की धड़कने और पिताजी का बीपी दोनों तेज़ हो जाते हैं... सिर्फ एक फोन के कारण...और बच्चे इस बात से बेखबर अपनी ही दुनिया में व्यस्त कहीं.. सोच भी नहीं पाते मां-बाप की फ़िक्र। बच्चे तो फिर भी उड़ा देते हैं..पर मां-बाप हर फिक्र को धुएं में नहीं उड़ाते...अपने अंदर समेटकर रख लेते हैं...उनके लिए ये फ़िक्र भी बहुत क़ीमती है... क्योंकि ये उनके बच्चों से जुड़ी है। 
        सुख सुविधाएं देकर हम अपने माता-पिता के कष्ट कुछ कम भले ही कर सकें..लेकिन दूर रहकर हम न जाने कितनी चिंताएं उनको दे देते हैं... और अनजाने में उन चिंताओं के साथ कुछ बीमारियां भी। हम साथ भले ही नहीं रहते पर हमारी जगह ये बीमारियां हमेशा उनके साथ रहती हैं। और उनके साथ वो हमेशा ठीक ही होते हैं....फिर भी सोचती हूं कि कैसे ठीक रहते होंगे वो मां-बाप जिनके बच्चे उनके पास नहीं होते। 
         सबकुछ जानकर भी कितने अनजाने हैं न हम... 

                                                                                                 to be continued....




Saturday, August 3, 2013

मेरी मां



क्या क्या न सोचा होगा 
जब नन्हे नन्हे मोज़े बनाये होंगे..
मेरे आने से पहले मुझसे न जाने कितनी बातें की होंगी
और मेरे आने के बाद... न जाने कितनी रातें तुमने जागकर काटी होंगी
मेरे बोलना सीखने से पहले कैसे मेरी बातों को समझा होगा
बचपन की शरारतों को भी कहीं सहेजकर रखा होगा
जैसे तुम सारी पुरानी चीजों को संभालकर रखा करती हो
सामने आते ही ...तुम्हारे होंठों पर मुस्कान ले आती होंगी
मेरे बचपन की यादें...

मेरे बड़े होने से पहले न जाने क्या क्या सोचा होगा 
कितनी ही उम्मीदें और कितने ही सपने देखे होंगे
और फिर जब मैंने उन्हें तोड़ा होगा
तो कैसे चुपचाप उन्हें फिर समेट कर रख लिया होगा
अपने अंदर... जहां उन बिखरे टुकड़ों को कोई देख नहीं पाया होगा

मेरी शादी के सपने भी तुमने शायद मेरे बचपन से देखे होंगे
रोज़ थोड़े-थोड़े जोड़े होंगे..और जब वो जुड़ गये होंगे तो
कैसे तुमने उन्हें सिलकर मेरे लिए वो ओढना बनाया होगा
वो ओढ़ना जिसमें तुमने अपने सारे सपने..अपना सारा प्यार 
सितारों में भरकर टांका होगा ..
जिसकी झिलमिल तुम्हारी आंखों की चमक से बहुत मिलती है 
जिसे मैं ओढ़कर खुद को तुम्हारी गोद में महसूस करती हूं

आज भी न जाने क्या क्या सोचती होगी..क्या क्या सहेजती होगी..
क्या क्या जोड़ती होगी... मेरी मां !