Saturday, December 7, 2013

वो बिखरी पंखुड़ियां और...एक सोच


आज शाम अपने घर की छत पर बेटे के साथ टहल रही थी...बहुत सारे गमले फूलों से सजे थे...रंग बिरंगे फूलों को देखकर मेरा बेटा बहुत उत्साहित था। अचानक उसकी निगाह एक गुलाब पर पड़ी..जो मुरझाने की कगार पर था, उसकी कुछ पंखुड़ियां झड़ कर नीचे गिर गयी थीं और फूल पर दो चार ही बाकी थीं। उसने तुरंत वो सारी पंखुड़ियां इकट्ठा कीं और मुझे दे दीं...और मुझे इशारा कर कहने लगा कि इन्हें वापस उस फूल से जोड़ दो ...फिर से फूल बना दो..मैंने उसे समझाया कि अब ये संभव नहीं है, तो वो खुद प्रयास करने लगा। मेरे लाख समझाने पर भी वो कोशिश करता रहा उन पंखुड़ियों को उस फूल से जोड़ने की...और अंत में हार मान गया। मैं उसकी समझ और नासमझी को एक साथ देख रही थी.. और उसकी आंखों में तैरते उन अनगिनत सवालों को भी...जिनके जवाब मैं चाहकर भी उसे दे न सकी। एक कोमल मन, जो एक फूल को भी बिखरा नहीं देख सकता..मैं उसे सृष्टि के नियम समझा न सकी..आदि और अंत के बारे में बता न सकी..उसकी सकारात्मक सोच और कोशिशों के आगे मैं हार गयी...और मैं खुद ये सोचने लगी कि अगर इरादे बुलंद हों तो बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो बिखरने के बाद भी जोड़ी जा सकती हैं...दुनिया के सही ग़लत समझने के लिए मेरा बेटा अभी छोटा सही..पर हां उसकी सोच ने मुझे और मेरे मन को आज गर्व और सुकून से भर दिया।

चित्र: गूगल से साभार

9 comments:

  1. बहुत अच्छा लगा पढ़ कर। वास्तव मे निश्छल बचपन से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं जो भविष्य मे हमारी सोच को भी गहरे से प्रभावित करता है।

    सादर

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  2. सत्य हमेशा साथ होता है किन्तु कुसमय कि गंदगी उसे धुंधला कर देती है ……शुभकामना ....

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  3. बहुत अच्छा लिखा है.....

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  4. जीवन के कुछ गारे सत्य सहज ही लिख दिए ... सुन्दर प्रस्तुति

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  5. bahut sundar baat ki aapne , kuchh baten ham nahi samay hi samjha paata hai ....:)

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  6. बच्चों के बचपने से भी कई गहरी बाते हम सिख जाते है..
    :-)

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  7. आप सभी का धन्यवाद...

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  8. कोमल मन की सोच तो ऐसी ही होती है .... बस हम लोग ही उसे दूषित करते हैं ...

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