Monday, December 16, 2013

चुप हूं जब तक.. चुप हूं....



चुप हूं जब तक 
चुप हूं..
बेज़बान समझने की अब
कोशिश न करना

क्रोध की अग्नि जली
आग बहुत है भीतर भरी
अब और उलझने की 
कोशिश न करना

जल जाओगे एक दिन
खुद ही के गुनाहों में
मुझको ग़लत समझने की अब
कोशिश न करना

मेरी नियति में नहीं है
गिरना और बिखर जाना
कांच का टुकड़ा समझने की अब 
कोशिश न करना

चेहरे की मुस्कान 
निश्छल है हमारी
पर नादान समझने की अब
कोशिश न करना

मन में भाव कोमल हैं
नाज़ुक ही बदन मेरा
पर फूल सा मसलने की अब
कोशिश न करना

सह लिया बहुत तुमको 
और तुम्हारे ज़ुल्मों को 
एक और निर्भया बनाने की अब
कोशिश न करना

चुप हूं जब तक 
चुप हूं..

12 comments:

  1. सुन्दर सन्देश. बदलाव तो हो रहा है जो अच्छी बात है.

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  2. ये उदद्घोषणा अत्यावश्यक...... बहुत सुन्दर पंक्तियाँ

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  3. सुपर सटीक !
    यकीनन यह समय चुप रहने का नहीं चुप्पी को तोड़ने का है।

    सादर

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  4. कल 18/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  5. बहुत सटीक चेतावनी !
    नई पोस्ट चंदा मामा
    नई पोस्ट विरोध

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  6. chup raha hi kyun jaay , galat ka jawab hatoh-hath hi dena hoga ....bahut sundar rachna

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  7. bahut khub ,,jaruri hai ye chetawani ..or jaruri hai ki ladkiya apne aapko majboot samjhe abla nhi .. badhayi :)

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  8. नारी मन के भाव लिख दिया आपने ... और अब समय भी नहीं है छुप रहने ला ...
    निर्भय भी तो यही कह गई है ...

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  9. सच अब छुपी के दिन लद गए.. अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए उठ खड़े होने का समय है ....
    बहुत बढ़िया प्रेरक रचना ...

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  10. बहुत बढियां स्त्री मनोदशा को सुन्दरता से प्रकट किया है ..

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