Tuesday, December 24, 2013

उलझी ऊन..



ऊन ले आई थी एक दिन
सोचा कि समय मिलते ही इसे व्यवस्थित करूंगी..
पर ध्यान नहीं दिया 
और रखे-रखे ऊन की डोरियां आपस में उलझने लगीं
जब समय मिला तो पाया 
कि अब बहुत देर हो गई
शायद ये ऊन अब सुलझ नहीं पायेगी मुझसे
उलझनें सुलझाने का प्रयास कर रही हूं
एक ठीक होती है तो दूसरी उलझ जाती है
कैसा अजीब सा ताना बाना बन गया है
इन उलझनों में मैं खुद ही उलझ जाती हूं
हल्के से खुद को बचाती हूं, फिर जुट जाती हूं 
कुछ उलझनें सुलझती तो हैं 
पर जगह-जगह गांठें पड़ जाती हैं
गांठें खोल रही हूं...
कुछ खुल गई हैं,
कुछ बाक़ी हैं,
थोड़ा मुशकिल है..असंभव नहीं..
जीवन भी तो ऐसा ही है न 
कभी कभी उलझी सी ऊन जैसा..
पर यकीनन 
बहुत सुखद है..
जीवन की उलझनों को सुलझा लेना
रिश्तों में पड़ी गांठों को 
खोल लेना..

5 comments:

  1. बिलकुल!
    उलझनों को सुलझाते हुए आगे बढ़ते जाना ही जीवान है।

    सादर

    ReplyDelete
    Replies
    1. त्रुटि सुधार-
      जीवान=जीवन

      Delete
  2. सुलझते उलझते बढ़ना ही जीवन .......... बहुत सही

    ReplyDelete
  3. Bilkul sahi.....positive attitude.....superb thought

    ReplyDelete
  4. सुलझते सुलाजते उलझाने सुलझ जाती हैं ... हर पल जीवन में कुछ नया सिखा जाती हैं ...

    ReplyDelete

आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।