Monday, November 25, 2013

एक गुड़िया सयानी..


बचपन की बातें कितनी सुहानी 
एक था राजा एक थी रानी
राजा-रानी की थी एक गुड़िया सयानी

गुड़ियों की दुनिया मेरी भी थी, गुड़िया एक प्यारी मेरी भी थी
हंसती थी साथ, रोती थी साथ
खेलती साथ, सोती साथ, हर पल रहती थी साथ-साथ

बचपन के खेल ख़त्म हुए, मैं धीरे-धीरे बढ़ती गई
मुझे दोस्त और भी मिले कई, मेरी गुड़िया मगर..
मेरी गुड़िया रही

दिल के भाव मेरे कुछ बदलने लगे, गुड़िया के दर्द भी अब दिखने लगे
उससे रिश्ता मेरा और जुड़ता गया, वो बच्ची थी, 
दिल मां सा लगने लगा

टॉफी-चॉक्लेट बांट-बांट कर, दर्द भी साथ बंटने लगे
बचपन के रिश्ते से जुड़े ये दिल, आज भी 
एक रिश्ते में बंधे हुए

इंसान का इंसान से रिश्ता भी काश ऐसा होता
चोट मुझके लगती तो दर्द उसको होता..
फिर गुड़ियों से खेलने की ज़रूरत न होती
इंसानी रिश्तों में जो बात इतनी होती..






9 comments:

  1. गुड़िया से खेलने की ज़रूरत ही इसीलिए होती है कि उसके मुसकुराते चेहरे में खो कर हम कुछ पल को ही सही अपने गम भूल कर हल्का महसूस कर सकें। रही बात इन्सानों की तो हर समय हर इंसान गुड़िया की तरह प्यारा नहीं लग सकता :(

    बहरहाल आपकी यह रचना बहुत अच्छा संदेश भी देती है।

    सादर

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    1. यशवंत जी .. धन्यवाद आपका

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  2. वाह!!! बहुत सुंदर और प्रभावशाली रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर

    आग्रह है--
    आशाओं की डिभरी ----------

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    1. उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद

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  3. इंसानी रिश्ते कभी कभी गहरा दर्द देते हैं ... बेजान चीज़ें बस कठपुतली की तरह होते हैं ...

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  4. कल 27/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  5. काश इंसानी रिश्तों में कभी ऐसा हो पाता. ह्रदय से उकेरी पंक्तियाँ. बहुत बढ़िया रचना.

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  6. बहुत खूब लिखा ......

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  7. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

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