Wednesday, November 20, 2013

जीने की राहें



तेरे प्यार से पाईं है मैंने जीने की राहें
परेशां होती हूं जब 
पत्थर सी हुई जाती हूं
बिखर जाती हूं ज़मीं पर 
राहें मुश्किल बनाती हूं 
तभी तुम फूल से बनकर बिखरते हो
मेरे पत्थराए रस्तों को 
मखमल सा करते हो
हां तेरे प्यार से पाईं हैं मैंने जीने की राहें
हां तेरे प्यार में खोकर मैं मंज़िल को भी पा लूंगी...

18 comments:

  1. स्नेह की शक्ति सचमुच अतुल्य है. सुन्दर रचना.

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    1. शुक्रिया निहार जी

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  2. कोमल भाव कि सुन्दर रचना...
    :-)

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  3. बहुत ही बढ़िया। निहार जी ने सही कहा।

    सादर

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  4. बहुत सुंदर रचना.

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  5. Prem ke prati is samarpan ko naman hai mera ...

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (23-11-2013) "क्या लिखते रहते हो यूँ ही" “चर्चामंच : चर्चा अंक - 1438” पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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  7. कल 24/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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    1. शुक्रिया यशवंत जी

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  8. प्यार अगर सच्चा हो तो सारी राहें आसान हो जाती है और मंजिलें खुद ब खुद चलकर पास आ जाती हैं। बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना।

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    1. सही कहा आपने , धन्यवाद

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  9. बहुत बढ़िया , अच्छी रचना , धन्यवाद

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    1. आशीष भाई धन्यवाद तो मुझे कहना चाहिए... धन्यवाद !

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  10. सुन्दर रचना

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  11. प्रेम दिल मिएँ हो तो मंजिल पास हो न हो ... चाहत नहीं रहती उसे पाने की ... प्रेम भी तो मंजिल होती है अपने आप में ...

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