Wednesday, October 9, 2013

क्यों संवेदनाक्षीण हो गई मैं..?


तब कुछ भी नहीं होता जब अहसास नहीं होता, 
और जब अहसास हो जाता है तो 
कभी पीड़ा देता है
तो कभी मन ग्लानि से भर देता है..
मुझे भी हुआ आज अहसास और
अपने किये पर पछतावा..
उपवास के ये नौ दिन
घर में बनते हैं दो प्रकार के भोजन 
फलाहार और साधारण भोजन
और ढ़ेर सारे बर्तन उन्हें बनाने में प्रयुक्त होते
मेरी बाई ने कहा-
'भाभी मैं दिन भर घर-घर काम करती हूं 
शाम को पूजा-अर्चना के बाद 
सिर्फ एक ही बार कुछ खाती हूं
आप बर्तन थोड़े कम निकालने का प्रयास करो
मैं भी नवरात्रे कर रही हूं न..
आजकल थक जाती हूं'
सुनकर ही मन व्यथित हो उठा
और सिर्फ एक सवाल
क्यों संवेदनाक्षीण हो गई मैं
जो इतना भी न सोचा मैंने?

14 comments:

  1. भावों से सजी सुंदर रचना |

    मेरी नई रचना :- मेरी चाहत

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  2. बहुत सुन्दर भाव.......

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  3. बहुत सुन्दर भाव.
    नई पोस्ट : मंदारं शिखरं दृष्ट्वा
    नवरात्रि की शुभकामनाएँ .

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  4. संवेदनशील है आपका मन इसलिए विचलित हुआ ... इस बात भान न रहना आम है ... हां कहने के बाद ख्याल न रखना ठीक नहीं ...

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  5. मर्मस्पर्शी कविता



    सादर

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  6. कल 11/10/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  7. बहुत ही भावपूर्ण रचना...

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार - 11/10/2013 को माँ तुम हमेशा याद आती हो .... - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः33 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra

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  9. सुन्दर कविता

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  10. मर्म को छूती कविता ...विचारणीय प्रश्न

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  11. भावपूर्ण सुन्दर...रचना..

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  12. बहुत सुन्दर रचना | वास्तव में आजकल लोग संवेदना हीन हो गए हैं |
    लेटेस्ट पोस्ट नव दुर्गा

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  13. सुनकर ही मन व्यथित हो उठा
    और सिर्फ एक सवाल
    क्यों संवेदनाक्षीण हो गई मैं
    जो इतना भी न सोचा मैंने?

    ..........विचारणीय प्रश्न

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।