Monday, August 12, 2013

सब ठीक है ?



        कुछ सवालों के जवाब जानते हुए भी हम अकसर पूछते ही हैं, और जब वही जवाब सुनने मिलता है तो कितनी खीज होती है न ..जैसे अपने मां-बाप का हाल जानने के लिए जब फोन लगाओ तो पहले से ही पता होता है कि वो जवाब क्या देंगे..यहां सब ठीक है बेटा..तुम सुनाओ...तुम कैसे हो? 
        ऐसे कह देते हैं सब ठीक है..जैसे दुनिया के सबसे सुखी व्यक्ति से बात हो रही हो।
कभी कभी सोचती हूं कि कैसे ठीक रहते होते होंगे वो मां-बाप जिनके बच्चे उनके पास नहीं होते।
और आजकल तो ज़्यादातर मां-बाप चाहे वो लड़की के हों या फिर लड़के के, अकेले ही दिखते हैं। लड़कियां ब्याह करके दूर होती हैं तो लड़के पढ़ाई और फिर नौकरी के चलते। और मां-बाप अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के सपने संजोये... बस उनके फोन और उनके आने के इंतज़ार में जीवन बिता देते हैं। वो एक फोन उनके लिए कितना महत्वपूर्ण होता है.. कभी किसी ने सोचा है? एक दिन अगर फोन न कर सके तो मां के दिल की धड़कने और पिताजी का बीपी दोनों तेज़ हो जाते हैं... सिर्फ एक फोन के कारण...और बच्चे इस बात से बेखबर अपनी ही दुनिया में व्यस्त कहीं.. सोच भी नहीं पाते मां-बाप की फ़िक्र। बच्चे तो फिर भी उड़ा देते हैं..पर मां-बाप हर फिक्र को धुएं में नहीं उड़ाते...अपने अंदर समेटकर रख लेते हैं...उनके लिए ये फ़िक्र भी बहुत क़ीमती है... क्योंकि ये उनके बच्चों से जुड़ी है। 
        सुख सुविधाएं देकर हम अपने माता-पिता के कष्ट कुछ कम भले ही कर सकें..लेकिन दूर रहकर हम न जाने कितनी चिंताएं उनको दे देते हैं... और अनजाने में उन चिंताओं के साथ कुछ बीमारियां भी। हम साथ भले ही नहीं रहते पर हमारी जगह ये बीमारियां हमेशा उनके साथ रहती हैं। और उनके साथ वो हमेशा ठीक ही होते हैं....फिर भी सोचती हूं कि कैसे ठीक रहते होंगे वो मां-बाप जिनके बच्चे उनके पास नहीं होते। 
         सबकुछ जानकर भी कितने अनजाने हैं न हम... 

                                                                                                 to be continued....




9 comments:

  1. आदरणीया ,
    सादर अभिवादन |
    माँ बाप जैसी परवाह और बिना शर्त का प्रेम कहीं नही मिलता |
    ***************************
    ज़िन्दगी हुस्न है , रानाई है , दिलदारी भी है
    हकीक़त है , दर्द -दुःख भी है , ज़िम्मेदारी भी है,
    ********************************
    रानाई = सौन्दर्य , खूबसूरती , लालित्य , लावण्यता , मनहारी , मोहक , मुग्ध करने वाली सुन्दरता .
    आभार .....

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  2. आपने बिलकुल सही कहा,हम फ़ोन करना तक भूल जाते हैं, लेकिन जब हम छोटे थे तो वो हमारी हर एक बात का ख्याल रखते थे , जीवन की सत्यता को बहुत अच्छे से आपने बयाँ किया हैं,

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  3. सही कहा आपने ... बच्चे जहां रहें माँ बाप मना नहीं करते पर रोज़ एक बार उन्हें फोन तो करना ही चाहिए ...

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  4. आपने बिलकुल सही कहा,पारुल जी ...पूरी तरह से सहमत हूँ

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  5. बिलकुल सच कहा आपने।

    स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ!

    सादर

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  6. पारुल जी, क्या कहूँ मैं?
    आज सुबह माँ से बहुत देर बातें हुईं, तीज पर्व है आज..कह रहीं थीं की कुछ भी विशेष बनाने का मन नहीं है, तुम दोनों(मैं और मेरी बहन) हो ही नहीं पास में!!मेरा भी मन भर आया था..
    मेरी माँ आज भी सुबह और शाम दोनों वक़्त फोन पर बात करती है, और अब ऐसा हो गया है की मैं एक दिन बात ना करूँ तो मुझे भी बेचैनी होने लगती है..सोचता हूँ कभी कभी की ये कैसा भविष्य हम बना रहे हैं जिसने माँ-पापा से ही दूर कर दिया है....
    ऐसी और कई बातें जो सोचता हूँ वो याद आने लगी ये पढ़कर...आपकी पोस्ट की हर बात महसूस कर रहा हूँ...!!!

    टू बी कन्टिन्यूड लिखा है? लिखिए आगे, हम पढेंगे!

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    1. माननीय, आभार आपका कि आपको मेरी रचना अच्छी लगी। लिखने का तात्पर्य ये था कि परिस्थितियां चाहे जो भी हो माता-पिता उम्र के इस दौर में खुद को अकेला महसूस न करें। शीघ्र ही आगे लिखूंगी...आप ऐसे ही हौसला देते रहें।

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।