Monday, July 8, 2013

अभी और भी जीना है..

                                 
कभी थकान दामन थामती है.. और उदासियों की गर्त में मन गिरने जाता है ..मैं खुद को थाम लेती हूं। ये कविता पढ़ती हूं और गहरी सांस भरकर फिर से जुट जाती हूं....

                                     

उगते सूरज ने आज मुझसे कहा
चलो, कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी चलना है
अभी और भी जीना है

ये बाल अब पकने लगे, 
माथे के बल भी बढ़ने लगे
आंखों की चमक खो रही 
होंठों की हंसी को बनाए रखना है 
कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी जीना है

मुश्किलों का क्या है, 
आएंगी जाएंगी
अभी और लड़ना है
अभी और जीतना है
कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी जीना है

जीवन के हर मोड़ पर 
तुम्हें पत्थर कई मिलेंगे
उनको संजोना है और
नाम अपना लिखना है
कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी जीना है

ड़ालियों के फूल मुरझा न जाएं
उन्हें बागीचे में सजाए रखना हैं
हर सुबह सींचना है 
हर रात देखना है
कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी जीना है

आंधियां तो आएंगी और सताएंगी
हवा ही तो हैं...हवा हो जाएंगी
बस चरागों की लौ को थामे रखना है
कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी जीना है


6 comments:

  1. वाह बहुत ही सुंदर, जीवन की सच्चाई को कलम से शब्दों का रूप देकर कागज पर उतार दिया,ढेरो शुभकामनाये

    यहाँ भी पधारे ,
    रिश्तों का खोखलापन
    http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_8.html

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  2. हर शब्‍द बहुत कुछ कहता हुआ....पारुल जी आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है!

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  3. aapki kavita k har shabd kuch bayan karte hain... jane kya karte hain bs is dil ko chu lete lete hai...

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।