Wednesday, May 29, 2013

बहुत दिनों के बाद घर आई हूं..




आज बहुत दिनों के बाद घर आई हूं
वहां जहां...अपना बचपन कहीं छोड़ आई थी
आज लौटी तो पाया मैंने... कि कितनी दूर चली आई हूं

नये सपने आंखों में बसते गए..
और जो छोटे थे.. वो कहीं धंसते गए
कुछ पूरे तो कुछ अधूरे हुए...
और जो बिखरे.. उन्हें आज बटोर लाईं हूं
आज बहुत दिनों के बाद घर आई हूं

कुछ वादे भी थे कच्चे-पक्के
बचपन की तरह एकदम सच्चे
वो भी टूट गए हैं.. उन्हें भी साथ लाई हूं
आज बहुत दिनों के बाद घर आई हूं

एक वादा किया था मैंने कभी 
कि ब्याह करके न जाऊंगी 
साथ रही हूं अब तक तुम्हारे
आगे भी साथ निभाऊंगी
पर मां-बाबा का सपना जीता
मेरा वादा टूट गया..

इन सपनों का बोझ हक़ीकत से बहुत भारी है
अनमोल हैं..मेरे बचपन की तरह निस्वार्थ हैं
ये वो हैं.. जो मैंने देखे थे कभी अपने अपनों के लिए
निर्मल हैं..निश्छल हैं..
तो क्या ..कि ये पूरे न हो पाये..पर हमेशा थे और हमेशा रहेंगे तुम्हारे लिए...
आज बहुत दिनों के बाद घर आई हूं...
आज लौटी तो पाया मैंने... कि कितनी दूर चली आई हूं !

9 comments:

  1. वाह ! बेहद खूबसूरती से कोमल भावनाओं को संजोया इस प्रस्तुति में आपने ...!!!!

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  2. Beautiful as always.
    It is pleasure reading your poems....Parul ji

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    1. thanks sanjay ji...pleasure is all mine !!

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  3. har ek ladki ke man mei kabhi na kabhi ye bhaav aate honge ..aapne un sabke man ki baat kh di apni is rachna ke maadhyam se !!

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  4. Gahre jajbat ... Man ki komal bhavnayen utari hain shadon mein ... Bahut khoob...

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  5. कामयाब अभिव्यक्ति..
    बधाई कलम को !

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  6. Nothing can be greater than your feeling.. i am proud of you!

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आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।