Thursday, January 10, 2013

बचपन



चलते चलते यूं ही वक़्त से पूछा  मैंने , क्यों मेरे साथ तुमने ऐसा किया
क्या बिगाड़ा था मैंने तेरा, क्यों मुझको सबसे दूर किया

मेरे साथी, सखी, सहेलियां, ..वो खेल-खिलौने पहेलियां,
हर बात में छलकता बचपना, वो शरारतें...अठखेलियां
क्यों छीन लीं ये निशानियां ..मेरे बचपन की वो कहानियां।

हम पैरों पर रेत थपथपाकर घर अपने बनाया करते थे,
झंडियों से उसे सजाकर कितना इतराया करते थे,  
क्यों छीन ली वो नर्मियां..वो ठंडी रेत की गर्मियां।

दौड़-दौड़ कर मैदान में हम धूल उड़ाया करते थे, 
घर आकर मां से वो सारी बातें करते थे,
क्यों छीन लीं वो शाबाशियां..वो खेल, दौड़ और ट्रॉफियां।

दोस्तों के साथ वो प्यारा सा ऐहसास था,
कभी वो मेरे घर पे था, कभी मैं उसके साथ था,
क्यों छीन लीं वो शरारतें..वो दोस्त और वो मस्तियां।

नंबर कम आने पर जब पापा डांटा करते थे,
अपने आंचल की छांव में वो मुझे छुपाया करती थी, 
मेरे हिस्से की थोड़ी डांट वो खुद भी खाया करती थी,
क्यों छीन लीं वो प्यारी थीं ...वो झिड़कियां ..दुलारियां । 

वक़्त ने हंसकर जवाब दिया, मुझे कितना भी चाहे कोस लो,
रुकता नहीं मैं किसी के लिए, मुझे कितना भी चाहे रोक लो,
छीना नहीं तुमसे कुछ भी, ये सब तो तुम्हारे पास है,
तो क्या हुआ कि साथ नहीं, पर यादें हैं...ऐहसास हैं।।

2 comments:

  1. शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह कविता रची है आपने।

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  2. finally aapki sari posts padh li..........wow.......behad hi achchi lagi......
    aapke bare me bahut kuch bata b diya in posts......amazing.......:-)

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