Wednesday, December 25, 2013

हम फिर साथ होंगे..


कई बार आवाज़ दी होगी मुझको,
मैं फिर भी न आई होंगी,
उसी वक़्त वो बह आये होंगे,
जिन्हें कितना सहेज कर रखते हो तुम..

वो जिनको हथेलियों में छुपाने का मन करता है,
उसकी नमी से दिल अपना भिगोने का मन करता है,
वो आ जायें तो आंखें सुर्ख हो जाती हैं तुम्हारी..

तनहाइयों में कई बार छुपा लिए होंगे,
मुझे याद करके न जाने कितने खो दिये होंगे,
वो जो स़बसे अज़ीज़ हैं मुझको,
     जिन्हें देखकर मेरी बेचैनियां बढ़ जाती हैं..

तुमने भी जिन्हें बार-बार संभाला होगा,
रोकना चाहा होगा बहुत, फिर भी वो बह आये होंगे,
कितने तनहा थे तुम, इस बात की गवाहीं देंगे,
घर के तकियों पर भी वो दिखाई देंगे..

हां बहुत अज़ीज़ हैं मुझको...जो तुमसे बिखर गये हैं
ये अनमोल मोती...तेरी मेरी यादों के 
हम मिलकर समेट लेंगे 
अब और सुर्ख न करना मेरे आइने को
हम फिर साथ होंगे..हम फिर साथ होंगे..
                                                                                                       Missing you..hubby!
                                                                                                

Tuesday, December 24, 2013

उलझी ऊन..



ऊन ले आई थी एक दिन
सोचा कि समय मिलते ही इसे व्यवस्थित करूंगी..
पर ध्यान नहीं दिया 
और रखे-रखे ऊन की डोरियां आपस में उलझने लगीं
जब समय मिला तो पाया 
कि अब बहुत देर हो गई
शायद ये ऊन अब सुलझ नहीं पायेगी मुझसे
उलझनें सुलझाने का प्रयास कर रही हूं
एक ठीक होती है तो दूसरी उलझ जाती है
कैसा अजीब सा ताना बाना बन गया है
इन उलझनों में मैं खुद ही उलझ जाती हूं
हल्के से खुद को बचाती हूं, फिर जुट जाती हूं 
कुछ उलझनें सुलझती तो हैं 
पर जगह-जगह गांठें पड़ जाती हैं
गांठें खोल रही हूं...
कुछ खुल गई हैं,
कुछ बाक़ी हैं,
थोड़ा मुशकिल है..असंभव नहीं..
जीवन भी तो ऐसा ही है न 
कभी कभी उलझी सी ऊन जैसा..
पर यकीनन 
बहुत सुखद है..
जीवन की उलझनों को सुलझा लेना
रिश्तों में पड़ी गांठों को 
खोल लेना..

Monday, December 16, 2013

चुप हूं जब तक.. चुप हूं....



चुप हूं जब तक 
चुप हूं..
बेज़बान समझने की अब
कोशिश न करना

क्रोध की अग्नि जली
आग बहुत है भीतर भरी
अब और उलझने की 
कोशिश न करना

जल जाओगे एक दिन
खुद ही के गुनाहों में
मुझको ग़लत समझने की अब
कोशिश न करना

मेरी नियति में नहीं है
गिरना और बिखर जाना
कांच का टुकड़ा समझने की अब 
कोशिश न करना

चेहरे की मुस्कान 
निश्छल है हमारी
पर नादान समझने की अब
कोशिश न करना

मन में भाव कोमल हैं
नाज़ुक ही बदन मेरा
पर फूल सा मसलने की अब
कोशिश न करना

सह लिया बहुत तुमको 
और तुम्हारे ज़ुल्मों को 
एक और निर्भया बनाने की अब
कोशिश न करना

चुप हूं जब तक 
चुप हूं..

Saturday, December 14, 2013

कल रात बहुत याद आए तुम..



कल रात बहुत याद आए तुम..
सर्द रात में ठण्डी हवा का झोंका बन..
मेरी राहतों का खलल बन..चले आये तुम।
मेरी तनहाइयां तेरी यादों से महकती रहीं,
क़तरा-क़तरा कर रूह में उतर आये तुम।

तेरी यादों के शहर में जाके हम,  
तेरी गोद में सर रख के सोने की ज़िद करते रहे
शिकवे-शिकायतें करते-करते, सिसकियां हज़ार भरते रहे।

तुम प्यारी सी मुस्कान लिए, मेरी सारी बातें सुनते रहे..
बालों में हाथ फेरकर, दर्द मेरे सोखते रहे,
मासूम सी नींद देके मुझे, एक बच्चा सा मुझमें खोजते रहे।

मैं चुप हो गयी कह कर..सिसकियां रुक गईं थक कर
फिर आंखें खोलने की ज़हमत न की मैंने,
और तुमने भी तो नहीं जगाया मुझको,
आंखें खोलीं तो बहुत ढूंढा तुमको,
फिर आंख का आंसू बन.. बह आये तुम
उफ्फ...कल रात बहुत याद आए तुम..!!

Sunday, December 8, 2013

क्योंकि गहनों का मुझे शौक नहीं...

कितने ही गहने हैं पास..पर और चाहिए...
ऐसा कभी चाहा नहीं..
क्योंकि गहनों का मुझे शौक नहीं... 
शायद प्यार है..जो धीरे-धीरे संचित हो रहा है
बचपन में नानी ने दी थीं मुझे सोने की बालियां
फिर मां पापा का प्यार जो अकसर बरसता था
कभी कानों के बुंदों में, पांव की पायल में,
तो कभी गले की चेन में,
और शादी पर तो भावनाओं का सैलाब ही आ गया
कितने सारे रिश्तेदारों का प्यार मिला
सास-ससुर ने भी प्यार देने में कोई कमी न रखी
पति ने भी प्यार जताने के लिए गहने दिलवाये
सुर्ख सोने की चमक से सूरत तो दमकी
सुनहरी रौशनी इसकी..पर आंखें न चमकीं
क्योंकि गहनों का मुझे शौक नहीं...
क्योंकि अकसर सोच में पड़ जाती हूं मैं 
कि ये वाकई प्यार है..या कुछ और
समाज में प्रतिष्ठा दिलाने का महंगा सा सामान
या फिर प्रभाव जमाने का सस्ता सा साधन
क्योंकि सोना प्यारा है अगर र्निमल भावों में गढ़ा हो
क्योंकि सोना क़ीमती है अगर किसी ईमानदार का तोहफ़ा हो
क्योंकि सोना सुन्दर है अगर सिर्फ सौन्दर्य बढ़ाये
क्योंकि सोना बहुत महंगा है.. अगर दिमाग पर चढ़ जाये
क्योंकि गहनों का मुझे शौक नहीं... 
इसीलिए बस...प्यार सहेज रही हूं...सोना नहीं !

Saturday, December 7, 2013

वो बिखरी पंखुड़ियां और...एक सोच


आज शाम अपने घर की छत पर बेटे के साथ टहल रही थी...बहुत सारे गमले फूलों से सजे थे...रंग बिरंगे फूलों को देखकर मेरा बेटा बहुत उत्साहित था। अचानक उसकी निगाह एक गुलाब पर पड़ी..जो मुरझाने की कगार पर था, उसकी कुछ पंखुड़ियां झड़ कर नीचे गिर गयी थीं और फूल पर दो चार ही बाकी थीं। उसने तुरंत वो सारी पंखुड़ियां इकट्ठा कीं और मुझे दे दीं...और मुझे इशारा कर कहने लगा कि इन्हें वापस उस फूल से जोड़ दो ...फिर से फूल बना दो..मैंने उसे समझाया कि अब ये संभव नहीं है, तो वो खुद प्रयास करने लगा। मेरे लाख समझाने पर भी वो कोशिश करता रहा उन पंखुड़ियों को उस फूल से जोड़ने की...और अंत में हार मान गया। मैं उसकी समझ और नासमझी को एक साथ देख रही थी.. और उसकी आंखों में तैरते उन अनगिनत सवालों को भी...जिनके जवाब मैं चाहकर भी उसे दे न सकी। एक कोमल मन, जो एक फूल को भी बिखरा नहीं देख सकता..मैं उसे सृष्टि के नियम समझा न सकी..आदि और अंत के बारे में बता न सकी..उसकी सकारात्मक सोच और कोशिशों के आगे मैं हार गयी...और मैं खुद ये सोचने लगी कि अगर इरादे बुलंद हों तो बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो बिखरने के बाद भी जोड़ी जा सकती हैं...दुनिया के सही ग़लत समझने के लिए मेरा बेटा अभी छोटा सही..पर हां उसकी सोच ने मुझे और मेरे मन को आज गर्व और सुकून से भर दिया।

चित्र: गूगल से साभार

Wednesday, December 4, 2013

Cell का मायाजाल..


तेरा मेरा हम सबका cell phone is कचरे का डब्बा,
पीटो मारो उड़ा दो उसको जिसने बनाया इसे हायो रब्बा।

जितने advantages हैं उससे ज़्यादा तो इसके नुकसान हैं
Cell के मोह जाल में deep तक फंस चुका अब इंसान है।

चलो cell बनाया तो बनाया
but ये sms pack क्यों Invent किया,
Youth ने तो खुद को fully इसपे depend किया।

कभी कभी तो लग जाती है झड़ी sms की,
और कभी एक beep सुनने को कान तरस जाते हैं,
Sms addiction  से अब बड़े-बूढ़े भी न बच पाते हैं।

हर month pack डलवा डलवा के हमने कितना पैसा बर्बाद किया,
Typing कर कर के अपने nails and fingers को ख़राब किया।

कितनी misunderstandings.. कितने झगड़ों का ये औज़ार है,
Time waste करने का तो ये prime हथियार है।

पर love birds के लिए तो ये एक blessing है,
Sms कर कर के हो जाती कितनों की setting है।

और तो और मेरी तो poems भी cell में ही type की जाती है,
pen से टूटा नाता अब तो cell  में ही diary नज़र आती है।
समय की गति कैसी होती है इसके बारे में सबकी अपनी अलग राय है। 
पर मेरी समझ से तो समय के पंख होते हैं..फुर्र से उड़ जाता है...
आज भी समय ने अहसास कराया कि वो कितनी जल्दी कितनी लम्बी दूरी तय कर लेता है..
मेरी सबसे छोटी बहन जिसे हम अभी तक बहुत छोटा समझते थे, अचानक बड़ी सी लगने लगी।
कोर्स की किताबों में उसे हमेशा व्यस्त देखा था, कभी उसने नहीं बताया कि वो लिखती भी है...
मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं थी जब मैंने उसकी डायरी पढ़ी.. 
न जाने कब से लिख रही थी अपनी डायरी,
मैंने उसे मेरे ब्लॉग पर लिखने को कहा है... कभी-कभी वो भी अपने ख़याल सबसे साझा करेगी। 
जो स्नेह मुझे मिला उसे भी मिले...ऐसी आशा है।


                           




Monday, November 25, 2013

एक गुड़िया सयानी..


बचपन की बातें कितनी सुहानी 
एक था राजा एक थी रानी
राजा-रानी की थी एक गुड़िया सयानी

गुड़ियों की दुनिया मेरी भी थी, गुड़िया एक प्यारी मेरी भी थी
हंसती थी साथ, रोती थी साथ
खेलती साथ, सोती साथ, हर पल रहती थी साथ-साथ

बचपन के खेल ख़त्म हुए, मैं धीरे-धीरे बढ़ती गई
मुझे दोस्त और भी मिले कई, मेरी गुड़िया मगर..
मेरी गुड़िया रही

दिल के भाव मेरे कुछ बदलने लगे, गुड़िया के दर्द भी अब दिखने लगे
उससे रिश्ता मेरा और जुड़ता गया, वो बच्ची थी, 
दिल मां सा लगने लगा

टॉफी-चॉक्लेट बांट-बांट कर, दर्द भी साथ बंटने लगे
बचपन के रिश्ते से जुड़े ये दिल, आज भी 
एक रिश्ते में बंधे हुए

इंसान का इंसान से रिश्ता भी काश ऐसा होता
चोट मुझके लगती तो दर्द उसको होता..
फिर गुड़ियों से खेलने की ज़रूरत न होती
इंसानी रिश्तों में जो बात इतनी होती..






Thursday, November 21, 2013

Thanks all !


जब लिखना शुरू किया 
तब सोचा नहीं था कि कोई मुझे भी पढ़ेगा,
अपनी लेखनी पर तब इतना भरोसा नहीं था..
लिखते-लिखते, लोग जुड़ते गए 
सही ग़लत बताते गए
मेरे ख़यालों को पढ़ते गये..सराहते गये
और मुझे इस पायेदान तक ले आए
आप सभी का शुक्रिया... 

Wednesday, November 20, 2013

जीने की राहें



तेरे प्यार से पाईं है मैंने जीने की राहें
परेशां होती हूं जब 
पत्थर सी हुई जाती हूं
बिखर जाती हूं ज़मीं पर 
राहें मुश्किल बनाती हूं 
तभी तुम फूल से बनकर बिखरते हो
मेरे पत्थराए रस्तों को 
मखमल सा करते हो
हां तेरे प्यार से पाईं हैं मैंने जीने की राहें
हां तेरे प्यार में खोकर मैं मंज़िल को भी पा लूंगी...

Tuesday, November 19, 2013

अमानत..


बहुत संभाल के रखा है किसी ने 
उस अमानत को
हम तो ज़ाया ही परेशां थे 
के खो गये हमसे
चलो अब बेफ़िक्र सोएंगे
 कि सलामत हैं वो
कुछ ख़्वाब थे.. 
शायद वहीं छोड़ आए थे...

Sunday, November 17, 2013

एक प्याली चाय आम नहीं होती..


कल बहन से बात हुई..तो अमरीका के मौसम का पता चला, आजकल बर्फ पड़ रही है वहां। यहां आज हवा तेज़ थी, शाम को चाय पीते-पीते उसकी बहुत याद आई.. 



एक प्याली चाय.. आम नहीं होती 
न हो तो सर्द रातें आसान नहीं होती
हल्की ठण्डक है यहां..और हम परेशान हुए जाते हैं
कभी शौल ओढ़ते हैं तो कभी चाय-कॉफी का सहारा लेते हैं 
सोचती हूं कि दिसम्बर की सर्दियां कैसे बिताएंगे,
हाय.. हम तो ठण्ड में जम ही जायेंगे
सोचते सोचते बस उसका ख़याल आ गया
इतनी ठण्ड में माथे से पसीना आ गया
हम तो बस यूं ही परेशान हुए जाते हैं
एक वो हैं जो बर्फ में भी जीवन बिताते हैं
हल्की सी सर्द जो हवाएं हुईं
ख़राशें-छींके तो अब आम हुईं
चल रही है वो सफेद हुई सड़कों पर
संभाल रही है खुद को बर्फीली हवाओं में
और हरा रही है ठण्ड को 
बर्फ के गोले बनाकर
पूछा उससे कि कैसे रहती है वो इतनी ठण्ड में
जवाब बस वही..
एक प्याली चाय आम नहीं होती..

                                                                                           Missing you Payal...

Saturday, November 9, 2013

वो भरकता मफ़लर..

सर्दियों ने दस्तक दी
और मैं फिर से अपनी ऊन और सलाई
पुराने संदूक से निकाल लाई..
इस बार भी हवाएं चेता रही हैं 
कि कुछ बना लूं गर्म सा
जो उनको थोड़ी राहत देगा..
सर्द हवाओं में
मैं फिर सोच में पड़ गई कि कहां से शुरू करूं
कुछ फंदे सलाई में डाले और कुछ उतार दिये
थोड़े फंदे उठाये और थोड़े गिरा दिये
सोचा बूटियां बनाउंगी..या फिर
बगैर किसी डिज़ाइन का..मेरी तरह सादा सा
पर जैसा भी हो मेरे प्यार से महका होगा
उसका मीठा सा सेक हर पल उसे मुझसे जोड़े रखेगा
पर देखो न..
मैं फिर से इस ऊन में उलझ के रह गई
हर साल की तरह
बस सोचती ही रह गई
क्यों न दे पाई मैं अपने सपने को वो रूप
सृजन कर न सकी उस फिक्र का.. 
अपने मन के भावों का 
हर साल की तरह.. इस साल भी न बुन पाई मैं
मेरे सपनों का वो भरकता मफ़लर..


Tuesday, November 5, 2013

चलो करें नयी शुरुआत..

आज भाई दूज पर सब अपने भाइयों के साथ होते हैं। जो साथ नहीं होते वो बात ज़रूर करते हैं और जो बात न कर सकें तो याद बहुत करते हैं.. मैं भी आज अपनी तीनों बहनों को याद कर रही हूं.. और मेरे ह्रदय के ये भाव उन्हीं को समर्पित हैं.. 



चलो कुछ नया करें, कुछ ऐसा जो थोड़ा अलग हो
समाज के रीति रिवाज़ों से परे कुछ 
जिसे करके मन को सुकून मिले

दो त्यौहार जब आते हैं, उत्साह सारा ले जाते हैं
रक्षाबंधन और भाई दूज, कुछ कम है..ये कह जाते हैं

जिन बहनों के भाई नहीं, वो बहनें क्यों रहें उदास
क्यों न बन जातीं वो एक दूसरे की आस

चलो अब कुछ नया करें, हम चारों करें नयी शुरुआत
एक दूजे को बांधें राखी, और दूज पर करें तिलक

चलो भर दें उस रिक्तता को और लें वचन आज
बहनों को ही मानेंगे सबकुछ, देंगे हमेशा साथ
रक्षा करेंगे एकदूसरे की, न होंगे कभी उदास

ह़क रखेंगे एक दूसरे पर, प्रेम से रहेंगे साथ
  खुशियों में होंगे पास,  दुख-दर्द भी बांटेंगे साथ 
 चलो करते हैं ये नयी शुरुआत..


Love you all my lovely sisters !

Wednesday, October 30, 2013

मुझे सताने के तरीक़े..




मुझे सताने के तरीक़े
तुम्हें अच्छे से आते हैं..
मैं जानकर नाराज़ होती हूं तुमसे 
और तुम जानकर 
मनाते नहीं मुझको

कभी-कभी की बात न रही अब ये
हर रोज़ अनजाने बन जाते हो तुम
रोज़ाना तेरी आंखों में प्यार खोजती हूं
रोज़ाना मेरी आंखों से बह जाते हो तुम

तेरी बेरुखी से बढ़कर
कोई सज़ा न होगी मेरे लिए
खुद ब खुद मर जाऊंगी एक दिन
दो चार बार और
बस मुंह फेर लेना मुझसे..


Sunday, October 13, 2013

विजयदशमी


किसी की जीत किसी की हार बन गई।
वो विजय आज त्यौहार बन गई,
मुझे भी लड़ना है, 
और जीतना है, 
मेरे अंदर के रावण से 
बाहर के अनेकों रावणों पर विजय पानी है,
मुझे भी विजयदशमी मनानी है।

Saturday, October 12, 2013

तुम बिन अधूरी हूं..


कितना भी दूर रहूं उससे 
वो अपने होने का अहसास कुछ इस तरह करा देता है 
मानो उसके बिना जीना मेरे लिए संभव नहीं
अपने रक्त में घुला महसूस करती थी जिसे 
उससे दूर होने की कल्पना भी न की थी कभी 
फिर भी खुद से दूर कर देना चाहती थी मैं
पर देखो न..
कितना खिंचाव है इन सात सुरों की सरगम में
साज और आवाज़ के मधुर मिलन में
ताल की गमक और अलफाज़ की रूमानियत में
रोम-रोम को आनंदित करते इस संगीत में 
कि मेरे अस्तित्व पर ही कब्ज़ा किये बैठे हैं
ये न हो तो मैं खुद जैसी नहीं लगती मुझको
लोग पहचान नहीं पाते इनके बगैर मुझको
और ये संगीत ..
रूह जैसे खींचता रहता हो अपनी तरफ
अजीब सा खिंचाव है जो 
जीवन में होकर भी मुझे गुम कर देता है 
और न होकर मुझे रिक्त 
इस कदर घुल गया है मुझमें कि 
अब आंखों से आंसू बनकर बहता है।
हां मान लेती हूं कि तुम जीत गये मुझसे 
और हार गयी मैं खुद से..
अब तुम ही हो 
जो मुझे सुकून दे पाओगे
तुम बिन अधूरी हूं..
तुम ही पूर्ण कर पाओगे।

Wednesday, October 9, 2013

क्यों संवेदनाक्षीण हो गई मैं..?


तब कुछ भी नहीं होता जब अहसास नहीं होता, 
और जब अहसास हो जाता है तो 
कभी पीड़ा देता है
तो कभी मन ग्लानि से भर देता है..
मुझे भी हुआ आज अहसास और
अपने किये पर पछतावा..
उपवास के ये नौ दिन
घर में बनते हैं दो प्रकार के भोजन 
फलाहार और साधारण भोजन
और ढ़ेर सारे बर्तन उन्हें बनाने में प्रयुक्त होते
मेरी बाई ने कहा-
'भाभी मैं दिन भर घर-घर काम करती हूं 
शाम को पूजा-अर्चना के बाद 
सिर्फ एक ही बार कुछ खाती हूं
आप बर्तन थोड़े कम निकालने का प्रयास करो
मैं भी नवरात्रे कर रही हूं न..
आजकल थक जाती हूं'
सुनकर ही मन व्यथित हो उठा
और सिर्फ एक सवाल
क्यों संवेदनाक्षीण हो गई मैं
जो इतना भी न सोचा मैंने?

Tuesday, October 8, 2013

बहुत श्रद्धा है लोगों की देवी के प्रति


बहुत श्रद्धा है लोगों की देवी के प्रति
कितने प्रेम भाव से लगे रहते हैं दिन रात
उस मां को सजाने संवारने में..
फूल चुन चुनकर उसके चरणों में अर्पण करते हैं  
उसकी पूजा में कोई कमी भी नहीं रखना चाहते
कोई नौ दिन अन्न त्याग देता है
तो कोई मौन ग्रहण करता है
कुछ भी करके बस मां को प्रसन्न करना चाहते हैं।
न गरबा करते करते इनके पांव थकते हैं और 
न भजन-कीर्तन करते इनके गले में खराशें आती हैं
घर के मंदिर में विराजमान देवी मां
और बाहर पंडालों में सजी-धजी मां के प्रति 
प्रेम और श्रद्धा इन नौ दिनों में और भी उमड़ आती है
वहीं घर में बैठी एक जननी 'मैं' सोच रही हूं
क्यों इन लोगों को हर जगह मां नहीं दिखती
वो तो हर घर में विराजमान है
किसी की मां में, किसी की बेटी में 
किसी की बहन तो किसी की बहु में..
क्या हाथों में शस्त्र और सिंह की सवारी ही शक्ति का प्रतीक है
वो स्त्री जिसके हाथों में बेलन और तन पर सादे वस्त्र हैं
उसमें देवी क्यों नहीं ढूंढता कोई
उसके प्रति सम्मान में सर क्यों नहीं झुकाता कोई
क्यों देवी को पूजने वाली इस धरती पर 
औरत को शक्तिविहीन और भोगने की वस्तु समझा जाता है
क्यों हर रोज़ किसी बेटी के बलात्कार की खबर से अखबार सना रहता है..

बहुत श्रद्धा है लोगों की देवी के प्रति..


Friday, October 4, 2013

हां..सिर्फ अपने आप से मतलब रखूंगी


हां..सिर्फ अपने आप से मतलब रखूंगी
तुमको अब न सताऊंगी, 
तुम्हारी ज़िन्दगी तुम्हारी है..
ह़क अपना न कभी जताऊंगी।

नहीं देखूंगी तुम्हारे चेहरे की उदासी कभी
समझ के भी नासमझ सी बन जाऊंगी
जब खामोश भी रहोगे न तुम
कुछ भी कहने को न कह पाऊंगी।

जो खो जाओगे उलझनों के भंवर में तुम
हाथ तुम तक न अपना बढ़ाऊंगी
पुकार लेना मुझे चाहे कितनी दफ़ा
मैं चेहरे पर अपने शिकन न लाऊंगी

जब कुछ अच्छा न लगे तुमको कभी
मैं न गीत अपने गुनगुनाऊंगी
बातों से कभी अपनी न मन तुम्हारा बहलाऊंगी 
होंठ सी लूंगी अपने, बस..खामोश रह जाऊंगी 

तुम्हारी ज़िन्दगी तुम्हारी है..
ह़क अपना न कभी जताऊंगी।

जो खोज न पाओ मुझे कहीं भी अगर
एक नज़र देख लेना दिल में मगर
जो कोना वीरान सा दिखे अगर
समझ लेना मैं हूं खड़ी उधर
तेरे प्यार से बंधी हुई, 
मैं और कहां जा पाऊंगी
तेरी होकर जो तेरे साथ नहीं
तुझसे दूर मैं क्या जी पाऊंगी..

हां..सिर्फ अपने आप से मतलब रखूंगी
तुमको अब न सताऊंगी.. 

Wednesday, October 2, 2013

प्लास्टिक के फूल..



आज भी संभाल रखे हैं मैंने 
वो प्लास्टिक के फूल
जिन्हें देकर तुमने कहा था कभी
कि असली फूलों की उम्र ज़रा कम होती है
वो खुशबू तो देते हैं मगर
मुरझा कर बदरंग हो जाते हैं दो-चार दिन में..
ये प्लास्टिक के फूल कभी ख़राब न होंगे
खुशबू नहीं है इनमें लेकिन
हमेशा खिले रहेंगे..
उनकी पत्तियों पर तुमने नाम भी मेरा लिख डाला था
या यूं कहूं कि प्यार से एक गुलदस्ता सजाया था
हां आज भी खिले हुए हैं 
वो प्लास्टिक के फूल 
पर सोचती हूं...
.
.
.
काश ! प्यार भी प्लास्टिक का बना होता..





Saturday, September 21, 2013

ये कैसा विसर्जन..?


        मन में कई सारे सवाल उठ रहे थे। बहुत असमंजस में थी कि क्या ये बात वाकई ब्लॉग जगत में पोस्ट करने लायक है। उसी उलझन में दो दिन ऐसे ही बीत गये, पर आज सोचा शायद लिखकर भारी मन कुछ हल्का हो जाये ।
        गणेशोत्सव बीत गया.. गणेश जी अगले बरस आने का वादा करके चले गये। और उनकी विदाई बहुत धूम धाम से होती है। गणपति विसर्जन कितने उत्साह से किया जाता है उससे सब अच्छी तरह से परिचित हैं। महाराष्ट्र और उससे सटे राज्यों में तो ये पर्व देखते ही बनता है। मेरा जन्म यूपी में हुआ और वहां गणेशोत्सव पर इतना उल्लास मैंने कभी नहीं देखा। इस साल पहली बार मुझे इस उत्सव का आनंद लेने का अवसर मिला.. मैं उत्साहित थी। यहां गली-गली में गणपति जी की स्थापना की जाती है। ढेर सारा धन उनकी सुन्दर और विशाल प्रतिमाओं के निर्माण में लगाया जाता है। साज-सज्जा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। बड़ी श्रद्धा से उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। ये दस दिन बड़े ही पवित्र होते हैं..घर में सुबह शाम भजन-आरती, घर क्या गली-मोहल्लों का माहौल एकदम बदल जाता है..हर तरफ श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई देती है। इन दिनों मोहल्ले किसी तीर्थ स्थल में तबदील हुए दिखाई देते हैं। ख़ैर विसर्जन पर जो कुछ मैंने देखा वो सबसे बांट रही हूं। हो सकता है मेरे शब्द किसी की भावनाओं को आहत कर दें, इसलिए पहले से क्षमाप्रार्थी हूं।
          गणेशजी को विसर्जन के लिए ले जाया जा रहा था। एक ट्राली सबसे आगे चल रही थी जिसपर तेज़ साउंड वाले स्पीकर और म्यूज़िक सिस्टम लगे हुए थे। बहरा कर देने वाली अतितीव्र ध्वनि उनके उत्साह के आगे मानों दबी जा रही थी... पर हां मेरे घर की कांच की खिड़कियों में कंपन ज़रूर था। इस ट्राली के पीछे ढेर सारे लोग नाचते हुए, एक दूसरे पर गुलाल डालते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे...और सबसे पीछे थी हमारे गणेश जी की ट्रॉली, जिसके आसपास कुछ बच्चे बैठे थे हाथों में भोग-प्रसाद लेकर जिसे वो सबको बांटते जा रहे थे। इसमें नया क्या है...यही तो होता है विसर्जन पर। पर एक बात जो मुझे कुछ चुभ रही थी, वो ये कि गणेश जी के विसर्जन पर कोई "गणपति बप्पा मोरया" नहीं बोल रहा... बल्कि सब गानों पर बेसुध होकर नाचने में लगे थे... और यहां पर में उन विशेष गानों का ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगी। एक-एक गाना जैसे चुन-चुनकर बजाया जा रहा था... जितने संभव आइटम नंबर हो सकते हैं सारे ही गणेश जी के सामने प्रस्तुत थे...मुन्नी बदनाम हुई...पिंकी तो है दिलवालों की... घाघरा... चोली और पता नहीं क्या क्या। ऐसे मौके पर ये गाने फूहड़ और अश्लील लग रहे थे। यहां तक कि जो लोग नाच रहे थे ..वो नशे में थे... और शराब के नशे में वो जो हरकतें कर रहे थे वो शर्मिंदा कर देने वाली थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बारात जा रही हो.. । ये हालात सिर्फ एक जगह नहीं बल्कि हर दूसरी टोली के थे। एक टोली में तो लड़के कपड़े उतारकर नाच रहे थे। कुछ लड़कियां भी थीं वहां, पर वो जिस तरह खुद को संभाल कर चल रही थीं..उससे साफ पता चल रहा था कि वो असहज थीं।
         मेरे मन में यही विचार आया कि क्या ये वही गणपति विसर्जन है जिसके लिए मैं इतनी उत्साहित थी .. पहली बार जो दृश्य मैंने देखे वो मेरा उत्साह भंग करने के लिए काफी थे। मन तो पहले से ही खिन्न था और दोपहर को रही सही कसर एक खबर ने पूरी कर दी.. मुंबई में गणेश विसर्जन के दौरान एक लड़की के साथ बदसलूकी...यकीनन मैं बहुत आहत हूं (http://timesofindia.indiatimes.com/videos/news/Woman-molested-at-Lalbaugcha-Rajas-visarjan-procession/videoshow/22807295.cms?utm_source=facebook.com&utm_medium=referral)

        अब मन में एक ही सवाल ... क्या मज़ाक है विसर्जन? कैसी होती जा रही है ये आज की पीढी.. जो भक्ति में भी मस्ती करने से पीछे नहीं हटती। धार्मिक भावनाओं का मज़ाक बन गया ये विसर्जन। लड़कियों पर छींटाकशी तो आम बात है, पर उनसे छेड़छाड़ और अश्लील हरकतें करना अशोभनीय, निंदनीय है। भीड़भाड़ का सहारा लेकर अपने गंदे उद्देश्यों को अंजाम देना आजकल के कुछ लड़कों के लिए संतुष्टि का एक बहुत सस्ता सा तरीका है। जिसे वो लोग बड़े ही गर्व के साथ करते हैं।
     
        सोचती हूं कि शायद स्वयं गणपति जी भी ये सोचने पर मजबूर हो जाते होंगे कि अगले बरस भी जब यही सब देखना होगा..तो पृथ्वी पर जाऊं कि नहीं.. पर वो तो ईश्वर हैं.. मनुष्य नीचता के चरम पर ही क्यों न पहुंच जाये ...पर गणपति उनकी बुराइयों और दिल के मैल को अपने साथ लेकर पानी में लीन हो ही जाते हैं...और मनुष्य फिर वहीं का वहीं...

Friday, September 13, 2013

नौकरी...


किसी की रोजी तो किसी की रोटी है नौकरी
कोशिशें हज़ार करके भी नहीं मिलती नौकरी
किस्मत में नहीं..तो कहीं किस्मत चमकाती है नौकरी
किसी का गौरव है ऊंचे औहदे की नौकरी
तो किसी भूखे बच्चे के हाथों की रोटी है नौकरी
पैसे वालों को भले भाती नहीं ये नौकरी
छोटी-बड़ी.. कैसी भी.. पर मिले तो ये नौकरी
हज़ारों की भीड़ से किसी एक को मिलती है नौकरी
मिन्नतें किसी की, किसी की शिक्षा का फल है नौकरी
किसी के लिए आज़ादी होती है नौकरी
एक परिवार का भविष्य होती है नौकरी
मिल जाये तो छोड़ी न जाये नौकरी
पर जब अहम टकरायें, तो काहे की नौकरी
क्या औरत और मर्द की क़ाबिलियत में फ़र्क करती है नौकरी
नौकरी छूट जाये तो क्या दर्द में फ़र्क करती है नौकरी
फिर क्यों बहुओं की छुड़वाई जाती है नौकरी..
कोई क्यों समझता नहीं है मुझे..
मैं औरत हूं तो क्या.. मेहनत से मैंने भी कमाई थी नौकरी 
मुझे भी बहुत प्यारी थी ये नौकरी 
मेरे बाबा की मेहनत...मेरी मां का ख्वाब थी ये नौकरी ।


Monday, September 9, 2013

अम्मा.. !


कई बार अहसास होता है कि 
मेरे पास कहीं..तुम हो
दोपहर की चिलचिलाती धूप में
चेहरे से जब ठंड़ी हवा छू जाती है
तो लगता है...तुम साथ हो कहीं
यूं ही कई बार तुम्हें अपने आस-पास महसूस किया मैंने..
पर क्या ये वाकई तुम हो.. या फिर तुम्हारे साथ न होने का अहसास है..
जो कहीं न कहीं मुझे बता जाता है कि 
तुम होतीं..तो ये होता..तुम होतीं तो कुछ और भी अच्छा हो सकता था
हां वाकई...
तुम जो थीं वो कोई और नहीं हो सकता था
तुमने जो संभाला कोई और संभाल नहीं सकता था
तुम मेरे घर की नींव थीं... 
अब तुम नहीं तो वो घर घर नहीं लगता
दीवारें हैं खड़ी बस..खण्डहर नहीं लगता
तुम नहीं तो 'अम्मा' कुछ अच्छा नहीं लगता..


                                                                On the 2nd death anniversary of 
                                                                dadi 'Amma'

Saturday, September 7, 2013

मुझे मेरा स्पेस चाहिये !


अतीत की किताब के कुछ पन्ने आज उलटने बैठी हूं
छोटी-छोटी कितनी ही बातों पे तुम मुझ पर निर्भर रहते
'सुनो ज़रा पानी देना... सुनो ये काम कर देना'
'मेरा मोबाइल तो चार्जिंग पर लगा दो प्लीज़'
'यार वो पेपर ढूंढ़ दो न प्लीज़...'
'जब देखो कुछ न कुछ करती रहती हो...मैं जब घर आऊं तब कुछ न किया करो
मेरे पास बैठो...मुझसे बात करो... फालतू के काम मत करो न..'।
मेरे वक़्त पर भी तुम हक़ जताकर बैठे थे... 
मुझे मेरे लिये सिर्फ उतना ही समय मिलता जब तक तुम बाहर रहा करते...
और उस समय को मैं बड़ी ही किफ़ायत से खर्च करती।
कभी-कभी खीज होती.. और चिल्ला कर कह देती थी मैं... मुझे 'मेरा' समय चाहिये... 
थोड़ा सा स्पेस दे दो प्लीज़। 
अरे ये क्या... आंखों की नमी बढ़ क्यों गई... 
क्यों आज इतनी पुरानी बातें सोचने लगी
क्यों आज से पहले बीता वक़्त याद नहीं आया...
.
.
.
.
अब स्पेस मिल गया है...
जिसमें गुमी मैं... खुद ही को खोज रही हूं ।



Monday, September 2, 2013

कहां हो तुम...?


कहां हो तुम...?
ये तुम.. जो मेरे सामने हो
या कि वो.. जो बसा है मेरे मन के एक कोने में..
जिसने सुनहरे पलों को थामे रखा है अपने हाथों में ...
फूल की कोमल पंखुड़ियों की तरह।
वही पल जिन्हें साथ मिलकर जोड़ा था
वही पल जिसका हर रंग प्रेम से भीगा था  
सुखद, सुंदर वो गुलाबी पल..

ये तुम जो मेरे सामने हो..बड़े ही मतलबी से लगते हो 
चेहरा तो जाना पहचाना सा है..पर अजनबी से लगते हो।
मेरे कांधे.. तेरे हाथों की गर्मी को तरसते हैं
और आंसू.. तेरे हाथों की नर्मी का इन्तज़ार करते हैं

कई बार कोशिश की
के खेंच कर बाहर ले आऊं तुम्हें.. मन के उस कोने से
पर मेरी कोशिशें नाकाम थीं..तेरी व्यस्तताएं अब आम थीं..

काश के तुम.. वही तुम बन जाओ
मन के कोने से निकलकर सामने आ जाओ
और वो पंखुडियां जो तुमने संभाल रखी हैं
मेरे व्याकुल से मन पर बिखेर जाओ
फिर से तुम.. तुम बन जाओ !

Thursday, August 15, 2013

कैसे कह दूं कि.. मेरा देश महान !



भूख और बेरोज़गारी चौराहों पर रोज़ खड़ी मिलती है,
फबतियां कसती तो कहीं चैन खिंचती दिखती है,
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..

देश को मां कहने वाले, बेटियां पैदा होने पर डरते हैं..
क्योंकि बेटियां बेआबरू कर कहीं भी फेंक दी जाती हैं
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..

खून से लिपटे हाथ कानून के पानी से अकसर धुल जाते हैं
न्याय का इंतज़ार तकते, आंखें अकसर बंद हो जाया करती हैं
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..

देश की हिफाज़त करते सिपाहियों के सर नहीं मिलते
सच्चे अफ़सरों की ईमानदारी यहां मज़ाक बन जाती है
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..

देश चलाने वाले जब अपनी जेबें भरते हैं
देश में रहनेवाले तब महंगाई के आंसू रोते हैं
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..

बेईमानी और भ्रष्टता जब हाहाकार मचाती है
बच्चों के खाने में कीड़े पड़ जाया करते हैं
मैं कैसे कह दूं कि मेरा देश महान..  




Monday, August 12, 2013

सब ठीक है ?



        कुछ सवालों के जवाब जानते हुए भी हम अकसर पूछते ही हैं, और जब वही जवाब सुनने मिलता है तो कितनी खीज होती है न ..जैसे अपने मां-बाप का हाल जानने के लिए जब फोन लगाओ तो पहले से ही पता होता है कि वो जवाब क्या देंगे..यहां सब ठीक है बेटा..तुम सुनाओ...तुम कैसे हो? 
        ऐसे कह देते हैं सब ठीक है..जैसे दुनिया के सबसे सुखी व्यक्ति से बात हो रही हो।
कभी कभी सोचती हूं कि कैसे ठीक रहते होते होंगे वो मां-बाप जिनके बच्चे उनके पास नहीं होते।
और आजकल तो ज़्यादातर मां-बाप चाहे वो लड़की के हों या फिर लड़के के, अकेले ही दिखते हैं। लड़कियां ब्याह करके दूर होती हैं तो लड़के पढ़ाई और फिर नौकरी के चलते। और मां-बाप अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के सपने संजोये... बस उनके फोन और उनके आने के इंतज़ार में जीवन बिता देते हैं। वो एक फोन उनके लिए कितना महत्वपूर्ण होता है.. कभी किसी ने सोचा है? एक दिन अगर फोन न कर सके तो मां के दिल की धड़कने और पिताजी का बीपी दोनों तेज़ हो जाते हैं... सिर्फ एक फोन के कारण...और बच्चे इस बात से बेखबर अपनी ही दुनिया में व्यस्त कहीं.. सोच भी नहीं पाते मां-बाप की फ़िक्र। बच्चे तो फिर भी उड़ा देते हैं..पर मां-बाप हर फिक्र को धुएं में नहीं उड़ाते...अपने अंदर समेटकर रख लेते हैं...उनके लिए ये फ़िक्र भी बहुत क़ीमती है... क्योंकि ये उनके बच्चों से जुड़ी है। 
        सुख सुविधाएं देकर हम अपने माता-पिता के कष्ट कुछ कम भले ही कर सकें..लेकिन दूर रहकर हम न जाने कितनी चिंताएं उनको दे देते हैं... और अनजाने में उन चिंताओं के साथ कुछ बीमारियां भी। हम साथ भले ही नहीं रहते पर हमारी जगह ये बीमारियां हमेशा उनके साथ रहती हैं। और उनके साथ वो हमेशा ठीक ही होते हैं....फिर भी सोचती हूं कि कैसे ठीक रहते होंगे वो मां-बाप जिनके बच्चे उनके पास नहीं होते। 
         सबकुछ जानकर भी कितने अनजाने हैं न हम... 

                                                                                                 to be continued....




Saturday, August 3, 2013

मेरी मां



क्या क्या न सोचा होगा 
जब नन्हे नन्हे मोज़े बनाये होंगे..
मेरे आने से पहले मुझसे न जाने कितनी बातें की होंगी
और मेरे आने के बाद... न जाने कितनी रातें तुमने जागकर काटी होंगी
मेरे बोलना सीखने से पहले कैसे मेरी बातों को समझा होगा
बचपन की शरारतों को भी कहीं सहेजकर रखा होगा
जैसे तुम सारी पुरानी चीजों को संभालकर रखा करती हो
सामने आते ही ...तुम्हारे होंठों पर मुस्कान ले आती होंगी
मेरे बचपन की यादें...

मेरे बड़े होने से पहले न जाने क्या क्या सोचा होगा 
कितनी ही उम्मीदें और कितने ही सपने देखे होंगे
और फिर जब मैंने उन्हें तोड़ा होगा
तो कैसे चुपचाप उन्हें फिर समेट कर रख लिया होगा
अपने अंदर... जहां उन बिखरे टुकड़ों को कोई देख नहीं पाया होगा

मेरी शादी के सपने भी तुमने शायद मेरे बचपन से देखे होंगे
रोज़ थोड़े-थोड़े जोड़े होंगे..और जब वो जुड़ गये होंगे तो
कैसे तुमने उन्हें सिलकर मेरे लिए वो ओढना बनाया होगा
वो ओढ़ना जिसमें तुमने अपने सारे सपने..अपना सारा प्यार 
सितारों में भरकर टांका होगा ..
जिसकी झिलमिल तुम्हारी आंखों की चमक से बहुत मिलती है 
जिसे मैं ओढ़कर खुद को तुम्हारी गोद में महसूस करती हूं

आज भी न जाने क्या क्या सोचती होगी..क्या क्या सहेजती होगी..
क्या क्या जोड़ती होगी... मेरी मां !

Wednesday, July 24, 2013

बदलाव..



कभी अच्छे,  तो कभी बुरे होते हैं
बदलाव.. जीवन का सत्य होते हैं
खुशियां देकर आंखों की चमक बढ़ाते 
कभी दर्द देकर उन्हीं आंखों को रुला देते हैं
अपने मन माफ़िक उलट लेने की इजाज़त नहीं देते
ये बहुतों को यूं भी परेशां किया करते हैं
बदलाव.. जीवन का सत्य होते हैं
वक़्त के हाथों में है इनकी डोर.. और ये
पूरी दुनिया को बदलने की ताकत रखते हैं
मन को समझाकर अपना लेना अच्छा
बदलाव.. उम्मीद की किरण होते हैं
बदलाव.. ज़रूरी होते हैं।

Saturday, July 20, 2013

देख रही हूं..



तेरी मासूम सी हस्ती है... 
और मेरी अथाह उम्मीदें
तुझे ठोकरों से संभलते देख रही हूं

अपने ही डर से लड़ते तुम, 
तुम्हें निर्भय बनते देख रही हूं..

अपनी अक्षमताओं को हराते तुम,
तुम्हें योग्यताओं में ढ़लते देख रही हूं..

तेरे उत्साह तेरे जीव से विशाल,
नाकामियों को पिघलते देख रही हूं..

फक़्र है तुमपर.. तुम्हारी कोशिशों पर,
अंधेरी धुंध छंटते देख रही हूं...     

मेरी आंखों से जन्मे हज़ारों सपने,
तेरी आंखों में पलते देख रही हूं...

मेरी कोशिशों को साकार करते तुम, 
मैं खुद को मां बनते देख रही हूं..

                                              I am so proud of you son !

Tuesday, July 9, 2013

तेरे रंग..



तेरे ही रंग, रंग रंग गए
रग रग मेरे.. अंग अंग मेरे,
रग रग में रंग...रंग रंग में तुम
तुम तुम में मैं, मुझ मुझ में तुम
मुझ में घुले.. हर रंग तेरे ...
ओस से धुले..खुशबू मिले..
भीगता मन..तेरे प्यार में हरदम 
तुझसे ही महकती.. 
तुझमें ही रंगी.. मैं..!

Monday, July 8, 2013

अभी और भी जीना है..

                                 
कभी थकान दामन थामती है.. और उदासियों की गर्त में मन गिरने जाता है ..मैं खुद को थाम लेती हूं। ये कविता पढ़ती हूं और गहरी सांस भरकर फिर से जुट जाती हूं....

                                     

उगते सूरज ने आज मुझसे कहा
चलो, कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी चलना है
अभी और भी जीना है

ये बाल अब पकने लगे, 
माथे के बल भी बढ़ने लगे
आंखों की चमक खो रही 
होंठों की हंसी को बनाए रखना है 
कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी जीना है

मुश्किलों का क्या है, 
आएंगी जाएंगी
अभी और लड़ना है
अभी और जीतना है
कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी जीना है

जीवन के हर मोड़ पर 
तुम्हें पत्थर कई मिलेंगे
उनको संजोना है और
नाम अपना लिखना है
कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी जीना है

ड़ालियों के फूल मुरझा न जाएं
उन्हें बागीचे में सजाए रखना हैं
हर सुबह सींचना है 
हर रात देखना है
कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी जीना है

आंधियां तो आएंगी और सताएंगी
हवा ही तो हैं...हवा हो जाएंगी
बस चरागों की लौ को थामे रखना है
कुछ देर आराम कर लो
अभी और भी जीना है


Wednesday, July 3, 2013

मेरा घर..


मैंने बहुत से मकान बदले हैं..
कुछ छोटे तो कुछ बड़े ..कीमती पत्थरों से जड़े 
चमचमाते फर्श और बड़े से बागीचे वाले भी
कुछ ऐसे भी थे जिनमें हवा आने की जगह न थी
और कुछ जिनमें सामान सजाने की जगह कम थी
कई ऐसे थे जो शुरू होकर ख़त्म ही हो जाते
और कई ऐसे भी कि रसोई तक जाने में पैर अलसाते 
कहीं बालकनी में चाय पीने का लुत्फ़ लिया
तो कहीं नंगे पांव ज़मीन पर चलने को तरस गये

महीने की पहली तारीख ने हर बार ये याद दिलाया
कि ये मेरा घर नहीं.. इसमें रहने का लगता है किराया
जानती थी कि एक घर का सपना जितना मेरा है उतना तुम्हारा भी था..
फिर भी नाराज़ होकर कई बार तुम्हारा दिल दुखाया..
तुमने मेरी कड़वी बातों को सुना नहीं 
और जो नहीं कहा उसे सहेज लिया..

सुकून तो हर जगह मेरे पास था
तुम्हारा और प्यारे से बेटे का जो साथ था
पर जो कमी थी वो तुमने आज पूरी कर दी
जिसे करने के लिए एक उम्र बीत जाती है
मेहनत इतनी कि चेहरे पे नज़र आती है
शायद ही कोई किसी को तोहफ़े में देता होगा
जो तुमने आज मुझको दे दिया
मेरा घर.. मेरा आंगन ..मेरा संसार
जिसका किराया अब मुझे नहीं देना होगा..

                                                         Thanks to you love !

Wednesday, May 29, 2013

बहुत दिनों के बाद घर आई हूं..




आज बहुत दिनों के बाद घर आई हूं
वहां जहां...अपना बचपन कहीं छोड़ आई थी
आज लौटी तो पाया मैंने... कि कितनी दूर चली आई हूं

नये सपने आंखों में बसते गए..
और जो छोटे थे.. वो कहीं धंसते गए
कुछ पूरे तो कुछ अधूरे हुए...
और जो बिखरे.. उन्हें आज बटोर लाईं हूं
आज बहुत दिनों के बाद घर आई हूं

कुछ वादे भी थे कच्चे-पक्के
बचपन की तरह एकदम सच्चे
वो भी टूट गए हैं.. उन्हें भी साथ लाई हूं
आज बहुत दिनों के बाद घर आई हूं

एक वादा किया था मैंने कभी 
कि ब्याह करके न जाऊंगी 
साथ रही हूं अब तक तुम्हारे
आगे भी साथ निभाऊंगी
पर मां-बाबा का सपना जीता
मेरा वादा टूट गया..

इन सपनों का बोझ हक़ीकत से बहुत भारी है
अनमोल हैं..मेरे बचपन की तरह निस्वार्थ हैं
ये वो हैं.. जो मैंने देखे थे कभी अपने अपनों के लिए
निर्मल हैं..निश्छल हैं..
तो क्या ..कि ये पूरे न हो पाये..पर हमेशा थे और हमेशा रहेंगे तुम्हारे लिए...
आज बहुत दिनों के बाद घर आई हूं...
आज लौटी तो पाया मैंने... कि कितनी दूर चली आई हूं !

Friday, May 24, 2013

तेरे बिना...


तेरे बिना ....कैसे कहूं, 
ये जीवन कितना सूना है..
सबकुछ पास है मेरे यहां,
पर लगता कुछ छूट गया
चेहरे पर तो हंसी है लेकिन 
अंदर कहीं कुछ टूट गया
याद है मुझे मैंने कहा था..
ये कठिन पल ढल जाएंगे
पर मुझे कहां मालूम था कि 
ये पल इतना रुलाएंगे 
एक पल बीते दिन दिन जैसा, 
और दिन मेरे साल हुए
ये कैसा बदलाव है आया, 
तुम बिन हम बेहाल हुए
आधा आधा बांट के हमने 
पूरा हर एक काम किया
तुम संग होते तो ये पल भी 
बांट के आधे हो जाते
तेरे बिना कैसे कहूं...
ये जीवन कितना अधूरा है
आज कहीं अहसास हुआ कि 
तुमसे सब कुछ पूरा है ..

                                                      Missing you !

Wednesday, March 27, 2013

देखो..ये रंग न खोने पायें




आज तुम्हें कुछ रंग दे रही हूं मैं..
आज होली है न..
ये रंग बहुत अनमोल हैं ..बहुत कुछ देंगे तुम्हें
जीवन जीना सिखाएंगे..
देखो ये रंग न खोने पायें

वो जो फूलों का भी होता है न और उसे प्यार का रंग भी कहते हैं, लाल रंग...
उससे थोडी सुर्खी लेना, थोड़ा सा जुनून और ढेर सारी ऊर्जा
ये रंग ड़र भी देता है और क्रोध भी ... ड़रना मत
प्यार का रंग हैं ये
देखो ये रंग न खोने पायें

वो जो सूरज का होता है न..सबसे उज्जवल सबसे चमकदार, पीला रंग..
उससे थोड़ी चंचलता लेना...
थोड़ी सी खुशी और थोड़ी सी हंसी भी
ऊर्जा से भरे इस रंग को हमेशा अपनी आंखो में रखना
चमकता...
देखो ये रंग न खोने पायें

वो जो प्रकृति का होता है न.. आंखों को सुकून देने वाला, हरा रंग..
उससे तुम्हें अच्छी सेहत और आगे बढ़ने की शक्ति मिलेगी
प्रकृति का रंग ही विकास और प्रगति का रंग है
देखो ये रंग न खोने पायें

वो जो आसमान और समन्दर में घुला होता है न
आंखों को बहुत सुकून देता है.. नीला रंग
उससे तुम्हें मन की शांति मिलेगी और
साथ में कुछ रचने की लगन भी ले लेना
निष्ठा, शक्ति, ज्ञान और विश्वास का एक रंग है ये
देखो ये रंग न खोने पायें

वो जो लाल और पीले को मिलाकर बनता है न.. नारंगी रंग
तुम्हें मिलनसार बनाएगा संयोजित रहना सिखाएगा
तुम्हारे मस्तिष्क को हमेशा सक्रीय रखेगा 
हां इससे थोड़ी आग्नि ले लेना.. काम आएगी
देखो ये रंग न खोने पायें 

वो जो तुम्हें पसन्द नहीं है न बैंगन उससे मिलता है.. बैंगनी रंग 
नीले रंग की स्थिरता और लाल रंग की ऊर्जा है इसमें 
इस रंग से ढ़ेर सारी नेकी और उदारता ले लेना 
प्रतिष्ठा का रंग है ये
देखो ये रंग न खोने पायें 

वो जो सबसे शुद्ध और स्वच्छ  होता है न, सफेद रंग..
उससे तुम थोड़ी ताज़गी ले लेना
सकारात्मक व्यक्तित्व और शांति का रंग है ये 
देखो ये रंग न खोने पायें 

आज तुम्हें कुछ रंग दे रही हूं मैं..
आज होली है न..
शायद कोई और न दे पाये...तुम्हारी मां हूं न। 


                                                                                        Happy Holi Son !

Monday, March 11, 2013

कितने अजीब होते हैं रिश्ते..


     जब हमें जीवन मिलता है ... रिश्तों में बंधने का सिलसिला शुरू होता है। मां मिलती है पिता मिलते हैं...भाई और बहन भी। हम किसी न किसी से रिशतों में बंधे ही रहते हैं। और बड़े होते हैं..तो दोस्त भी मिलते हैं, पर दोस्ती का रिश्ता थोड़ा अलग होता है, क्योंकि दोस्त हमें विरासत में नहीं मिलते..हम उन्हें खुद चुनते हैं..और ये विरासत के रिश्ते जो हमें मिलते हैं बड़े ही अजीब होते हैं...
       मां और पिता तो दो अलग अलग जगह से आए.. और जन्म दिये दो रिश्ते.. बेटा बेटी..
पर ये लोग जो एक ही कोख से जन्मे..उन्होंने कितने रिशते बना लिए...भाई-बहन, भाई-भाई, बहन-बहन
गहराई से सोचो तो लगता है कि ये रिशते तो स्वयं भगवान ने ही बनाए हैं...शायद यही वो अनमोल तोहफ़ा है जो ईश्वर ने सिर्फ हमें दिया है..जिसके बारे में हमें पता नहीं होता..जिसे हमने खुद नहीं चुना। जैसे हम अपने माता -पिता को नहीं चुनते ठीक वैसे ही अपने भाई और बहनों को भी..ये काम तो स्वयं ईश्वर करते हैं।
        पर सोचा है बाद में क्या होता है..इन बहन और भाइयों के साथ अपना आधा जीवन बिताने के बाद
हम अपने जीवन की नई शुरुआत करते हैं। एक साथी ढ़ूढते हैं...शादी करते हैं और एक नये व्यक्ति के साथ जीना शुरू करते है.. अपने छोटे से संसार में खुश रहने लगते हैं। हमारे भाई और बहन..वो भी अपना-अपना जीवन कुछ ऐसे ही बिताते हैं, कोई जल्दी तो कोई देर से..अब सबके पास अपने अपने साथी हैं...खुद चुने हुए या फिर मां बाप के द्वारा चुने गए। सब अपना-अपना जीवन ऐेसे ही बिताते हैं, सबके अपने अलग-अलग, छोटे-छोटे संसार।
        अब फिर सिलसिला चलता है नये रिश्तों के जन्म लेने का..कुछ नन्हे नन्हे रिश्ते आते हैं और किसी को बुआ,ताउ, किसी को चाचा,  मौसी ..मामा बनाते हैं। जीवन चक्र ऐसा ही है..सुन्दर..बहुत सुन्दर, पर कहीं न कहीं वो तोहफ़े पीछे ही छूट जाते हैं...हमें पता ही नहीं चलता कि कब नये रिशते मज़बूत हो गए और कब उन अनमोल रिशतों की डोर ढ़ीली हो गई। याद ही नहीं आता कि कब हमने अपनी मां का आंचल छोड़ दिया..कब
अपने पिता के साथ आखिरी बार अपने मन की बात कही..कब अपनी बहन के साथ खिलखिलाये और प्यार से कब से नहीं पूछा कि 'तू कैसी है', कब आखिरी बार अपने भाई के गले लगे थे..याद ही नहीं आता। माता पिता तो फिर भी हमारा संबल बने रहते हैं...लेकिन वो छोटे और बड़े तोहफ़े...उनकी चमक तो धुंधला ही जाती है। आज कुछ रिश्ते रियल और कज़िन..फर्स्ट कज़िन..सैकण्ड कज़िन के नाम से जाने जाते हैं। कितने अजीब हैं न ये रिशते ... अंदाजा लगाएं कि दो सगे भाइयों के बच्चे कभी भी सगे नहीं कहलाये जाते..तो प्यार भी तो वैसा नहीं होगा जो उनके पिता के बीच था... ख़़ैर।
       आज हम अहसास भी करते हैं तो ये कहकर अपने दिल को समझा लेते हैं कि वो अपने संसार में खुश हैं और हम अपने। फिर कभी अपने ही भाई-बहनों की छोटी-छोटी बातें हम अपने मन पर इस कदर लेते हैं कि उनके साथ बिताया बचपन, वो प्यार भरे पल भी याद नहीं आते। क्योंकि सच्चाई तो यही है कि हम हमेशा बुरी बातें ही याद रखते हैं और अच्छी बातें भूल जाते हैं। अब नतीजा तो यही आता है कि सब अपने-अपने में मस्त हैं..किसी को किसी से क्या...कभी कुछ बातें दूरियां बढ़ा देती हैं और कभी-कभी दूरियां ही इतनी ज़्यादा होती हैं कि वो बढ़ती जाती हैं..जब तक की कोई सार्थक प्रयास न किया जाये। हांलाकि हमारे त्यौहार एक हद तक पूरी कोशिश करते हैं इन रिश्तों को मज़बूती देने की। पर आजकल तो राखी भी भाई-बहन के मिले बिना  ही मन जाती हैं..व्यस्तताएं ज़्यादा हैं...ख़ैर
       पाश्चात्य संसकृति कितनी ही हावी हो जाये पर क्या हम अपने संस्कार भूल सकते हैं? शायद नहीं, फिर क्यों हम इन रिश्तों की कद्र नहीं कर पाते ...अरे ये रिश्ते नहीं हैं ...तोहफ़े हैं..जो हमें विरासत में मिले है...हमारी संस्कृति हैं..हमारी जड़ें हैं। प्यार, सम्मान और विश्वास के साथ बोये गए वो बीज हैं जिनके फल हमारी आने वाली पुश्तें चखेंगी।
       वैज्ञानिक युग है भाई..हर कोई भावुक नहीं होता और आध्यात्म पर भी तर्क किये जाते हैं...तो ये सब बातें
मानने और न मानने वाले भी बहुत होंगें। पर इस बात पर तो सभी लोग सहमत होंगे कि जब कभी हमारी आंखों के सामने हमारे भाई-बहन के साथ खींचा गया बचपन का कोई फोटो आ जाता है तो हमारे चेहरों पर हमेशा मुस्हकुराहट होती है।
       शुरुआत की गुंजाइश हमेशा होती है। और ये मुस्कुराहट उसी गुंजाइश का सुबूत है..तो फिर क्यों न फिर से  उन तोहफ़ों की चमक बढ़ाई जाये..और अहसास कराया जाये कि वो कितने अनमोल हैं...जिन्हें हमने नहीं चुना..तोहफ़े हैं.. विरासत में मिले हैं।



Wednesday, February 13, 2013

ये चाय कुछ ख़ास है..


चाय... रोज़ाना की ही तो बात है..पर आज की चाय कुछ ख़ास है..
थोड़ी मीठी है...
बीते सालों की मीठी यादों की तरह
महक ऐसी कि...
अब तक सहेजे प्यार की खुशबू हो जैसे
संजीदा भी है..
साथ बांटे छोटे-बड़े अनुभवों की तरह
ताज़ा इतनी..
कि जैसे कल ही की तो बात है
जब तुम आए थे मेरे जीवन को नया करने
थामा था मेरा हाथ.. हमेशा साथ चलने
चाहती हूं कि सफर ऐसे ही कटता जाये
और हम बूढ़े हो जायें...
थोड़े और अनुभव, थोड़ा और प्यार ..थोड़ी और यादें मिलें...
और ये चाय हर साल और भी मीठी होती जाए... !

                                                               Happy Anniversary love !