Sunday, February 5, 2012

सपने..


ठहरी हुई झील है या बरसता झरना
डूब सी जाती हूं उसकी चमकती आंखों में
ये चमक मेरी आंखों में भी घुल जाती है
और पानी की तरह बस.. बह जाती है
ये बहता पानी सिर्फ पानी नहीं
बहुत सारे अरमानों और सपनों की जुंबानी है
वो सपने जो तैरते हैं उसकी आंखों में
और पूछते हैं मुझसे..
क्या पूरे होंगे कभी..?
उन सपनों में जाती हूं 
उन्हें चुन चुन कर लाती हूं
संजोकर अपनी आंखों में  
उनको अपना बना लेती हूं...
पर सपने है..फिर पूछते हैं मुझसे.. 
क्या पूरे होंगे कभी..?
और मैं एक मां.. उन सपनों से कहती हूं
थोड़ा सब्र करो..कुछ और बढ़ो..
मैं संवारूंगी तुम्हें.. अब तुम मेरे हो...

7 comments:

  1. Awesome creation....No words to describe...Sapne jaldi hi poore honge....

    ReplyDelete
  2. again a touching one.....
    hmmm sapne poore honge jald hi.. :)

    ReplyDelete
  3. Raat kitni bhi kaali sahi,chali jaati hai..
    tabhi toh Oos ki boondon ke saath sunehari subah aati hai..
    yahi niyam hai prakriti kaa, mere "Sher",
    ki dukhon ke baad sukh ki ghadi aati hai..

    ReplyDelete
  4. कुछ लाइने दिल के बडे करीब से गुज़र गई....

    ReplyDelete

आपके कमेंट्स बेहद अनमोल हैं मेरे लिए...मेरा हौसला बढ़ाते हैं...मुझे प्रेरणा देते हैं..मुझे जोड़े रखते आप लोगों से...तो कमेंट ज़रूर कीजिए।