Monday, September 26, 2011

HOME REMEDIES - आंवला



आंवला(Indian gooseberry)- वैज्ञानिक नाम Emblica officinalis G. इसे हम आमला, आंवला, आमलकी, आंगला आदि नाम से भी जानते हैं। ये आंवले का मौसम है। और इस मौसम में आंवले का जितना फ़ायदा उठाया जा सके, उठा लीजिए। आंवला हमारे लिए वरदान है इसलिए इसे अमृत फल कहा गया है। आंवला में विटामिन 'सी' पाया जाता है। एक नारंगी के रस से 20 गुना ज़्यादा विटामिन C आंवले में होता है।
औषधीय प्रयोग-
नकसीर- आंवला, जामुन और आम को बारीक पीसकर माथे पर लेप करने से नकसीर का रक्त रुक जाता है।
हिचकी- आंवले का 20 ग्राम रस और 2-3 ग्राम पीपल को चूर्ण को शहद में मिलाकर लेने से हिचकी ठीक होती हैं।
अम्लपित्त- मिश्री और शहद के साथ 1-2 आंवले सुबह शाम खाने से खट्टी डकारें और अम्लपित्त ठीक होता है।
गठिया- 20 ग्राम सूखे आंवले, 20 ग्राम गुड़ को 500 ग्राम पानी में उबालें, आधा हो जाने पर छान लें। इसे सुबह शाम पीने से गठिया में लाभ होता है। इस प्रयोग में नमक नहीं लेना चाहिए।
खुजली- आंवले की गुठली को जला लें और राख को नारियल तेल में मिलाकर खुजली पर लगाने से लाभ होता है।
पित्तरोग- आंवले का मुरब्बा 1-2 नग सुबह खाली पेट खाने से पित्त के रोग मिटते हैं।
घाव- शरीर में अगर चोट लग जाए तो रक्त रोकने के लिए आंवले का रस लगाने से लाभ होता है।
दीर्घायु- आंवले के चूर्ण को रात को घी या शहद के साथ लेने से इंद्रियों का बल बढ़ता है और इंसान दीर्घायु होता है। इससे आंखों की रौशनी भी बढ़ती है।
केश- आंवले के चूर्ण को पानी में मिलाकर बालों में लगाने से बाल काले और लम्बे होते हैं।
मधुमेह- आंवले के रस में शहद मिलाकर लेने से मधुमेह में लाभ होता है।

आंवले को अपनी दिनचर्या में शामिल कीजिए। इसे किसी भी तरह लिया जा सकता है। चाहे वो आंवले का रस हो, आंवले का चूर्ण, चटनी या अचार हो । जो लोग खट्टा खाने से बचते हैं वो आंवले का च्यवनप्राश, आंवले का मुरब्बा और आमला कैण्डी भी ले सकते है।

Friday, September 16, 2011

वो एक दरख़्त..


वो एक दरख्त जो कई सालों से बड़ी मज़बूती से खड़ा था...
जिसे किसी के सहारे की ज़रूरत न थी, 
जिसकी छांव के नीचे सब सुकून पाते थे, 
जिसने हर छोटी और बड़ी बेल को सहारा दिया, 
जिससे लिपटकर कुछ तो ऊंचाइयों को छू गए, 
कुछ आसमान छूने के सपने संजोते रहे, 
बारिश की बूंदों से अपनी प्यास बुझाता था, 
उस दरख़्त को माली भी नसीब न था, 
जो उसकी जड़ों में कुछ प्यार का पानी उड़ेलता 
और अपने हाथों से उसे सींचता 
फिर हवा में लहलहाते हरे पत्तों को देखकर खुश होता। 
पर हर दरख्त अपनी किस्मत लेकर आता है, 
इसकी भी किस्मत कुछ ऐसी थी। 
सबको सहारा दिया..किसी से सहारा न लिया, 
वो सबका अपना था पर कोई भी उसका न था। 
उसे सब प्यारे थे, पर वो किसी का प्यारा न था। 
उसकी छाल पर झुर्रियां उकरने लगी थीं, 
जिन्हें देखकर उम्र का अंदाज़ा लगाना आसान था, 
वो दरख्त अब बूढ़ा हो चला था। 
ऊपर सिकुड़ती छाल थी और अंदर एक कमज़ोर जिस्म।
पीले पत्तों और सिमटती टहनियों को देखकर भी कोई जान न पाया,
कि खड़े रहने के लिए अब उसे ज़रूरत थी..
किसी सहारे की, किसी माली की।
आज एक हवा का झोंका आया 
और वो मज़बूत दरख्त हवा से भी हल्का हो गया, 
हवा की ठोकर लगी और ज़माने से ठोस सा दिखने वाला वो दरख़्त
ज़मीन पर गिर पड़ा।
काश ! कोई होता जो उसे समझ पाता, 
सिर्फ लेने के सिवा..उसे कुछ दे भी पाता। 
उसके अंदर झांककर कर देख पाता, 
उसके दुख-दर्द महसूस कर पाता, 
उसके कमजोर जिस्म को सहारा दे पाता,
मगर ये उस दरख़्त की किस्मत थी...
ये होता तो कुछ दिन और जी जाता। 

  dedicated to my 'amma'

Friday, September 9, 2011

हर बार यही होता है यहां..



हर बार यही होता है यहां, हर बार अंधेरा छाता है
एक धमाका होते ही सब धुआं-धुआं हो जाता है,
मंज़र ही बदल जाता है यहां, वीराना पसर सा जाता है। 

कोई किसी का पति था, तों कोई किसी का पिता,
कोई किसी की माई थी, तो कोई किसा का भाई था,
हर बार किसी का अपना यहां, मौत से क्यों मिल जाता है।

पलभर का ही सब खेल था, पल भर में ही सब ख़त्म हुआ,
जो शख़्स किसी का सबकुछ था, पलभर में उससे दूर हुआ,
हर बार बेकसूरों को ही, क्यों खून बहाना पड़ता है।

देश के ठेकेदारों ज़रा एक बात का मुझको जवाब दो
कुछ कर नहीं सकते तो, झूठे वादे किया क्यों करते हो
हर बार हमारे ज़़ख्मों पर झूठा मरहम रखने क्यों आते हो? 

हर बार यही होता है यहां हर बार अंधेरा छाता है
एक धमाका होते ही सब धुंआं धुंआ हो जाता है।




Thursday, September 8, 2011

वास्तु- सूत्र 3

वास्तु के अनुसार ईशान कोण यानि उत्तर-पूर्व (NORTH-EAST) दिशा हमेशा हल्की होनी चाहिए। इस दिशा में toilet बिल्कुल नहीं होना चाहिए। ईशान कोण को हमेशा स्वच्छ तथा पवित्र रखना चाहिए। जहां तक हो सके इस दिशा को हराभरा रखें।
उपाय- इस दिशा में तुल्सी का पौधा लगाएं और नियमित रूप से दिया जलाना चाहिए।
यदि इस दिशा में toilet हो तो उसे बंद कर दें। वहां हल्के नीले रंग का बल्ब जलाएं, नमक से भरा एक पात्र रखें।
इस दिशा में पानी का घड़ा भरकर भी रखा जा सकता है। इससे जलतत्व में वृद्धि होगी और अच्छे  परिणाम देखने मिलेंगे।

Tuesday, September 6, 2011

HOME REMEDIES - अमरूद


अमरूद (Guava)-वैज्ञानिक नाम picidium guajava L. इसे हम जाम, जामफल, सफरी आदि के नाम से भी जानते हैं। अब अमरूद बाजारों में दिखने लगा है। अमरूद का स्वाद तो सबको भाता है पर स्वाद के साथ साथ इसके औषधीय गुण भी जान लें तो फ़ायदा ही फ़ायदा। अमरूद का गूदा लाल और सफेद दोनों रंगों में मिलता है। अमरूद में विटामिन बी और सी दोनों पाए जाते हैं।


औषधीय प्रयोग-
दंत रोग- 3-4 पत्तों को चबाने या पत्तों के काढ़े में फिटकरी मिलाकर कुल्ला करने से दांत दर्द दूर होता है।
मुंह के छाले- पत्तों में कत्था मिलाकर पान की तरह चबाने से छाले ठीक होते हैं।
ह्रदय- अमरूद के फल के बीज निकालकर शक्कर के साथ धीमी आंच पर बनाई हुई चटनी  ह्रदय के लिए फायदेमंद है। इससे कब्ज़ भी दूर होता है।
जुकाम- एक बड़ा अमरूद बीज निकालकर रोगी को खिलाएं और नाक बंद कर पानी पीने को कहें। 2-3 दिन में जुकाम बहकर निकल जाएगा।
खांसी और कफ- अमरूद के अर्क में शहद मिलाकर पीने से सूखी खांसी ठीक होती है। अमरूद को भूनकर खाने से खांसी जुकाम में फायदा होता है।
वमन (उल्टी आना)- अमरूद के पत्तों का क्वाथ 10 ग्राम पिलाने से वमन बंद हो जाती है।
कब्ज़- नाश्ते में अमरूद को कालीमिर्च, काला नमक, अदरक के साथ खाने से कब्ज़, अजीर्ण, गैस ठीक होगी।
गठिया- अमरूद के कोमल पत्तों को पीसकर गठिया के दर्द वाले हिस्सों पर लगाने से लाभ होता है।

नादान बचपन


काग़ज़ की कश्ती थी, पानी का किनारा था,
खेलने की मस्ती थी, दिल ये आवारा था,
कहां आ गए इस समझदारी के दल-दल में, 
वो नादान बचपन भी कितना प्यारा था।



Friday, September 2, 2011

वास्तु- सूत्र 2

वास्तु के दूसरे सूत्र के अनुसार घर की उत्तर-पूर्व (NORTH-EAST) दिशा यानी ईशान कोण को खाली और साफ सुथरा रखना चाहिए। इस दिशा में सम्भव हो तो हल्की चीजें ही रखें। जितना भार ईशान कोण में हो उसका लगभग डेढ़ गुना वजन नैऋत्य कोण में रखा जाना चाहिए। दक्षिण-पश्चिम (SOUTH-WEST) कोण यानि नैऋत्य कोण भारी होना चाहिए।



वास्तु- सूत्र 1

वास्तु के कुछ नियम हैं, जिनके आधार पर घर का निर्माण किया जाता है, पर निर्माण के वक्त यदि कुछ बातों पर ध्यान दिया जाए तो नतीजे सुखद होंगे। पुराने ज़माने और आज में बहुत फर्क है। आज हमारा रहन-सहन कहीं सीमित हो चुका है। पहले बड़े-बड़े घर हुआ करते थे, जहां बड़ा सा आंगन होता था। पर आजकल के घर भी आंगन जितने बड़े या यूं कहें कि छोटे हो गए हैं। घर की जगह फ्लैटों ने ले ली है..जो हम नहीं बिल्डर के दिमाग़ से बनाए जाते हैं। बड़े ही खुशकिस्मत लोग होते हैं जो खुद की ज़मीन पर अपने सपनों का घर बनाते हैं। पर जो हमारे पास है उसी में बिना तोड़फोड़ किए कुछ बदलाव किए जा सकते हैं ।

सबसे पहले दिशा का ज्ञान होना चाहिए। जो इस प्रकार है।
उत्तर-पूर्व (NORTH-EAST)- ईशान कोण
दक्षिण-पूर्व (SOUTH-EAST)- आग्नेय कोण
उत्तर-पश्चिम (NORTH-WEST)- वायव्य कोण
दक्षिण-पश्चिम (SOUTH-WEST)- नैऋत्य कोण

* रसोईघर आग्नेय कोण में होना चाहिए। आग्नेय कोण यानि दक्षिण-पूर्व (SOUTH-EAST) का कोना।  खाना पूर्व में मुख कर बनाना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर अग्नि तत्व में वृद्धि नहीं हो पाती।

उपाय- दक्षिण-पूर्व (SOUTH-EAST) कोने खाली नहीं होना चाहिए। घर की इलैक्ट्रौनिक वस्तुएं जैसे फ्रीज़. टीवी इत्यादि को इस कोने में रखकर इसे समृद्ध बनाया जा सकता है। इस कोने में लाल रंग का बल्ब जलाना चाहिए।




Thursday, September 1, 2011

" गणपति बप्पा मोरया "



 ऊॅं नमो भगवते गजाननाय। 


वास्तु


वास्तु के बारे में मुझे जानकारी तो थी लेकिन मुझे इसका ज्ञान नहीं था। वास्तुशास्त्र में रुचि थी इसलिए काफ़ी समय से इसे समझने का प्रयास कर रही हूं। पर यह विषय मेरे लिए सिर्फ ज्ञान नहीं है, जब से मैंने वास्तु के नियमों का पालन करना शुरू किया है, मेरा विश्वास इससे जुड़ गया है। मैंने अपने जीवन को पूरी तरह से तो वास्तु  के अनुसार नहीं बदला, क्योंकि वो तो किसी के लिए भी संभव नहीं है, पर जितना बदल पाई हूं उससे मुझे अच्छे और आशचर्यजनक परिणाम देखने मिले हैं। आज से मैं अपने अनुभव इस ब्लॉग पर साझा करूंगी।