Wednesday, December 21, 2011

कुछ कहना है...


कुछ कहना है, जो आज तक कभी कहा नहीं,
जो सालों से मन में था पर कभी दिखाया नहीं,
मुझे मौका तो दो...

अपनी दुनिया मुझे कहते हो, हर पल साथ रहते हो,
कहीं जाते ही नहीं, इंतज़ार करवाते ही नहीं
मुझे शिक़ायत का मौका तो दो...
कि तुम देर से घर क्यों आते हो?

मेरी ग़लतियों को क्यों हवा में उड़ाते हो,
उनपर हमेशा मुसकुराते हो
मुझे शिक़ायत का मौका तो दो...
कि तुम हमेशा मुझे ड़ांटते क्यों हो?

जब मैं खाने में नमक ज़्यादा डालती हूं
तुम कहते हो कि खाना अच्छा है,
खुश होकर वो भी खा लेते हो
मुझे शिक़ायत का मौका तो दो...
कि तुम मेरे खाने में कमियां क्यों निकालते हो?

मेरी इजाज़त के बग़ैर मेरी आंखें पढ़ लेते हो,
मेरे कहने से पहले मेरी बातें समझ लेते हो
मुझे शिकायत का मौका तो दो...
कि तुम मुझे समझते क्यों नहीं हो?

कभी जब कुछ करने का मन नहीं होता
तुम कैसे मेरे आलस्य को जान लेते हो
कहते हो आज बाहर खाने का मन है,
मुझे शिक़ायत का मौका तो दो...
कि तुम कभी मेरे बारे में क्यों नहीं सोचते?

सजना संवरना मुझसे नहीं होता
सोने चांदी का भी शौक़ नहीं है,
फिर भी मुझे हीरा तोहफ़े में देते हो
मुझे शिक़ायत का मौका तो दो...
कि तुम कभी मेरे लिए कुछ लाते क्यों नहीं?

रंग रूप, चमक-दमक, शक्लो सूरत में नहीं
तुम्हारी सोच के दर्पण में मैं कुछ और हूं कहीं 
कहते हो कि तुम सच्ची हो,
सबसे अलग और अच्छी हो
मुझे शिक़ायत का मौका तो दो...
कि तुम मेरी तारीफ़ क्यों नहीं करते?

सपने हमेशा मेरी आंखों में तैरते हैं
ढ़ेरों आकांक्षाएं साथ लिए चलती हूं,
तुमसे तुम्हारे सपने पूछे तो कहा,
तुम्हारे सपनों को सच करना ही सपना है मेरा
मुझे शिक़ायत का मौका तो दो...
कि तुम मेरे लिए कुछ करते क्यों नहीं?

कोई उम्मीद अब बाक़ी नहीं,
तुम मिले तो सबकुछ पा लिया,
मेरे अच्छे कर्मों का फल हो शायद
जो ईश्वर ने बिन मांगे दिया
और क्या अब मांगू उससे
उसने किस्मत में तुम्हें लिख दिया।



4 comments:

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