Friday, September 9, 2011

हर बार यही होता है यहां..



हर बार यही होता है यहां, हर बार अंधेरा छाता है
एक धमाका होते ही सब धुआं-धुआं हो जाता है,
मंज़र ही बदल जाता है यहां, वीराना पसर सा जाता है। 

कोई किसी का पति था, तों कोई किसी का पिता,
कोई किसी की माई थी, तो कोई किसा का भाई था,
हर बार किसी का अपना यहां, मौत से क्यों मिल जाता है।

पलभर का ही सब खेल था, पल भर में ही सब ख़त्म हुआ,
जो शख़्स किसी का सबकुछ था, पलभर में उससे दूर हुआ,
हर बार बेकसूरों को ही, क्यों खून बहाना पड़ता है।

देश के ठेकेदारों ज़रा एक बात का मुझको जवाब दो
कुछ कर नहीं सकते तो, झूठे वादे किया क्यों करते हो
हर बार हमारे ज़़ख्मों पर झूठा मरहम रखने क्यों आते हो? 

हर बार यही होता है यहां हर बार अंधेरा छाता है
एक धमाका होते ही सब धुंआं धुंआ हो जाता है।




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