Wednesday, August 17, 2011

एक सवाल...

अन्ना का अनशन क्यों रोकना चाहती है सरकार..? ये एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है.. सवाल ये भी है कि अन्ना क्यों अनशन करना चाहते हैं..?  पर यदि सारे देश का इस सवाल से सरोकार है तो सरकार क्यों इसे रोकना चाहती है.. अब सरकार इस बात का जवाब दे..
कांग्रेस को देश में आंदोलनों का सबसे ज्यादा अनुभव है.. आखिर इसकी स्थापना हुए एक सदी से ज्यादा समय बीत चुका है.. तो फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार क्यों देश को किसी भी तरह के आंदोलन से रोकने का प्रयास कर रही है.. आंदोलन यानी किसी भी मसले पर असहमत होने का अधिकार.. और उस असहमति को जताने का अधिकार.. फिर क्यों उसे सीमाओं में बांधने का प्रयास किया जा रहा है.. सिर्फ 3 दिनों के लिए अनुमति.. सिर्फ कुछ हज़ार लोगों को इसमें शामिल होने का अधिकार.. सिर्फ कुछ गाड़ियों की पार्किंग.. अब इस सरकार की मनोदशा तो साफ है.. लेकिन इसमें माद्दा कितना है.. ये तो अब आने वाला समय ही बताएगा..
अब अन्ना को रोकने का मतलब है सरकार अगले चुनाव का इंतज़ार भी नहीं करना चाहती.. ये एक ऐसा सत्य है जो शायद इस सरकार में बैठे लोग भी जानते हैं.. इनके सलाहकार या थिंक टैंक.. इनके फायनेंसर मतलब सभी लोग इस बात को बड़ी आसानी से समझ सकते हैं.. वैसे भी करप्शन के इतने आरोप और महंगाई को इस स्तर तक ले जाने के बाद सरकार का ये कदम यकीनन उसे परेशानी में डाल सकता है।
पर यदि अन्ना के आंदोलन के साथ सारा देश है तो फिर जनलोकपाल कानून के बनने में क्या परेशानी है.. यदि सभी दूसरे दल तय कर लें तो कांग्रेस क्या कोई भी इस कानून को बनने से नहीं रोक सकता.. लेकिन ऐसा नहीं है.. क्योंकि दसरे दल इस आंदोलन को ऊपरी समर्थन दे रहे हैं.. भाजपा, बसपा, सपा, कम्यूनिस्ट अब तक इस आंदोलन से सुरक्षित दूरी बनाए हुए हैं। केवल संसद में थोड़ी बहुत जुगाली.. हंगामा.. प्रधानमंत्री को जवाब देने के लिए मजबूर करना क्या इतना पर्याप्त है.. देश और अन्ना के आंदोलन को  इन दलों के एक-दो दिन के आंदोलन से कोई फायदा नहीं होने वाला है..
समय आ गया है कि भगवान सरकार को सदबुद्धि.. दूसरे दलों को इमानदारी, जनता को लड़ने की हिम्मत और पूरे देश को एक नए संघर्ष का माद्दा दे.. शायद तभी कुछ हो पाएगा..  नहीं तो जनता की याददाश्त बहुत कमज़ोर होती है.. और मुर्दा कौमें केवल इतिहास में ज़िंदा रहती हैं..  और देश को मिल जाती है कुछ महापुरूषों की मूर्तियां, कुछ चौक और कुछ जयंतियां-पुण्यतिथियां.. लेकिन अभी भी ज्यादा देर नहीं हुई है.. ज़रुरत है लड़ने की.. कुछ कर गुज़रने की.. समय एक बार फिर हमें खुद को साबित करने की चुनौती दे रहा है.. हमने आज़ादी हासिल की.. अपना संविधान बनाया.. इमरजेंसी थोपने वालों को सत्ता से उतार फेंका..  खुद को एक ताकतवर देश के रूप में स्थापित किया.. अपनी मेधा का लोहा मनवाया.. और अब हम अपना जन लोकपाल भी बनवाएंगे.... जयहिंद..।।

'' उसूलों पे जहां आंच आए, टकराना ज़रूरी है,
जो ज़िन्दा हो तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।''

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